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‘‘अब का लउटि के ना अइबे का रे बाबू’’ (शेष स्मृति प्रो. तुलसीराम)

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जितेन्द्र बिसारिया 


ओह ! तुलसीसरतोआपचलेगए।एकदिनपहलेहीतोज्ञानपीठसेमेराकहानीसंग्रहअनुशंसितहुआथा।सोचाथाप्रकाशितहोनेपरसबसेपहलेआपकोहीअपनापहलासंग्रहभेंटकरूँगा। ‘समानधर्माकौनहोताहैयहभवभूतिकोपढ़करजानाथाऔर ‘मुर्दहियापढ़करपायाकिहमारेसमानधर्माआपहैं। ...चंबलकेबीहड़