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सोमवार, 2 मार्च 2015

संजय जोठे की कविताएँ

संजय जोठे युवा और सक्रिय साथी हैं. अभी उन्होंने ज्योति बा फुले पर एक किताब लिखी है और एक महत्त्वपूर्ण फेलोशिप भी उन्हें मिली है. ये कविताएँ उन्होंने मुझे काफी पहले भेजी थीं. इधर की व्यस्तता के चलते इन्हें काफी देर से पोस्ट कर पा रहा हूँ. 
इन कविताओं से गुज़रते हमें एक चेतन दलित युवा की विचारसंपन्न विद्रोही चेतना को देख सकते हैं. यह कथित मुख्यधारा से बहिष्कृत काव्य भाषा है, जिसमें एक सतत नकार का स्वाभाविक भाव है. यहाँ इतिहास और परम्परा का उत्खनन है और एक जिद भी अपनी पहचान को असर्ट करने की. असुविधा पर संजय का स्वागत.. 



(एक)

मैं दलित हूँ
हरिजन नहीं

तुम्हारे हरि के
उस सनातन हरण कर्म को
जिसने समय के गर्भ से
मेरे अतीत, वर्तमान और भविष्य
तीनों को हर लिया
मैं उसे क्यूं मानूं ?

उस सनातन हरण के अधीश्वर
हरि का मैं जन नहीं होना चाहता

मैं दलित हूँ
क्योंकि मेरा सीधा नाता
अपने दलन से है
तुम्हारे हरण से नहीं

मैं दलित ही रहूँगा
ताकि मेरे मन
और देह के दलन से उपजी
वह गाढ़ी सुर्ख स्याही
जो मेरा भविष्य लिख सकती है
फिर से तुम्हारी पुराण कथाओं का
श्रृंगार बनकर न रह जाए

(दो)

मुझे परिवर्तन चाहिए
सुधार नहीं

सदियों से तुम्हारे शास्त्रों, शस्त्रों और बहियों का बोझ
मेरी जर्जर देह ने ही उठाया है
बैलगाड़ी में जुते बीमार बैल की तरह
मैं ही वाहक रहा हूँ तुम्हारी सब कामनाओं का
अब तुम्हारा बैल मर ही न जाए
गिर कर चूर ही न हो जाए
इसलिए तुम देते आये हो उसे कुछ टुकड़े
जिन्दा भर रहने को

अब जब तुम्हारी कामनाएं और लक्ष्य
अधिक विशाल हुए जा रहे हैं
तुम्हें चाहिए एक मजबूत बैल
इसलिए अब तुम उछाले जा रहे
उन टुकड़ों का आकार बढ़ा रहे हो
यही तुम्हारा सुधार है
मुझे परिवर्तन चाहिए

मैं बैलगाड़ी के जुए से आजाद हो
तुमसे नजरे मिलाकर चलना चाहता हूँ
तुम्हारे शास्त्रों, शस्त्रों का बोझ फेंककर
अपने शास्त्र और शस्त्र रचना चाहता हूँ
मैं तुम्हारी यात्रा का साधन नहीं
बल्कि अपने लक्ष्य का साधक बनना चाहता हूँ
अपन गंतव्य और मार्ग
स्वयं बुनना चाहता हूँ

(तीन)

मुझ पर आरोप है
अलगाव का
लेकिन सदियों से मैंने
तुमसे अलगाव नहीं
लगाव ही चाहा है

मैं जब भी तुमसे मिलने
तुम्हारे घर आया
मेरा स्वागत करने को
सदा ही तुम्हारे आँगन में
कोई मरी गाय मिली
संडास का पखाना मिला
धिक्कार और गालियाँ मिलीं
या गए दिन की जूठन मिली
तुम नहीं मिले

मेरे लगाव के आग्रह को
मेरे नेह निमंत्रण को
तुम्हीं ने सदा ठुकराया
इसलिए ये अलगाव
तुम्हारी रचना है
मेरी नहीं

(चार)

तुमने इतिहास न लिखा
सदा पुराण ही लिखा
तुम्हारे लेखन और समय के बीच
सदा मैं खडा था
मेरे दलन और मेरी पीड़ा के साथ
तुम्हारे तथ्य और तारीख
हर बार मेरे लहू से सन जाते थे
और तुम्हारे महान समाज का
सारा चमत्कार कलुषित हो जाता था

इसलिए इंसानों का इतिहास नहीं नहीं
तुमने देवताओं का परिलोक बुना
वे देवता जो तुम्हारी कल्पना से
तुम्हारे रक्षण को पैदा हुए
जो मुझे और मेरे अधिकारों को
दैत्य कहकर दलते रहे

मेरे रिसते घावों के लहू से
अपना और तुम्हारा पोषण करते रहे
अपने स्वर्गों के चित्रों में
रंग भरते रहे

तुम्हारा ये स्वर्ग बना रहे
मेरे लहू से तुम्हारा पोषण चलता रहे
और समय तक को मेरा
या मेरी पीड़ा का भान न हो
इसलिए तुमने इतिहास न लिखा
सदा पुराण ही लिखा

(पांच)

मैं नहीं जानता सौन्दर्य को
और उसके शास्त्र को
सौंदर्य शायद वह गुण है
जो तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे अनुभव में आता है
तुम्हारी कलम से रिसकर
तुम्हारे लेखन में आता है
लेकिन मैं नहीं जानता

ऐसा कोई सौंदर्य

मैं जानता हूँ
उस कौरूप को
जो मेरे जीवन में
मेरे अनुभव से आता है
मेरी कलम से रिसकर
मेरे लेखन में आता है
मेरी पीड़ा मेरे पीड़ा-शास्त्र का निर्माण करती है
तुम्हारा सुख तुम्हारे सौंदर्य-शास्त्र को रचता है

जैसे सुख और पीड़ा में
विरोध का सम्बन्ध है
वैसा ही सम्बन्ध मेरे और
तुम्हारे बोध में भी है
शायद ये तब तक रहेगा
जब तक तुम अपना सौदर्यबोध छोड़कर
मेरी पीड़ा के बोध तक न उतर आओ

(छः)

मैं नहीं मानता
फलरहित कर्म को

मेरे गहन कर्म के
सब परिणामों और फलों को छीनने वाले
उस दिव्य दर्शन को मैं नहीं मानता
यह मुझे दृष्टि नहीं देता
बल्कि मेरी आँखे छीन लेता है

यह मुझे बल नहीं देता
मुझे हतवीर्य बनाता है
फलरहित कर्म का दिव्य उपदेश सिर्फ मेरे लिए रहा है
तुम्हारे कर्मरहित फल का एक अन्य गुप्त उपदेश रहा है

मैं नकारता हूँ फल रहित कर्म को
ताकि कर्म रहित फल पर पलते
वे सनातन परजीवी
मेरा ही रक्त चूसकर
भविष्य में मुझे ही
आँख न दिखा सकें

(सात)

मैंने पहचान लिया है
तुम्हारी मोहिनी को
जो तुम्हें मेरे मोह में नहीं
बल्कि मुझे तुम्हारे मोह में
सदा सदा से छलती आयी है

मेरे आंसुओं के सुदीर्घ सागर में
मेरी जर्जर छाती से उभर रहे
मेरी ही पीड़ा के सुमेरु को
तुम्हारे षड्यंत्र के सर्प में बांधकर
तुमने सदा ही अमृत निकाला है

हमारे लिए नहीं
सिर्फ तुम्हारे लिए

तुम्हारी कायरता ने सदा ही उस सर्प की पूंछ थामी
और मेरे जीवट ने सदा ही उसका फन थामा है

अंत में हमेशा की तरह
सारी मेहनत मेरे हिस्से आयी
और मैं थककर चूर हुआ
मेरी थकान की बेहोशी में
तुम्हारे अवतारों की मोहिनी
हमेशा जादू करती रही
मेरे जीवन अमृत को
मुझसे छीनकर

सदा तुम्हें पिलाती रही 

5 comments:

Onkar ने कहा…

बहुत दमदार रचनाएँ

mukti ने कहा…

ये कविताएँ सीधे मार करती हैं.

kumar anupam ने कहा…

अच्छी कविताएँ।

kumar anupam ने कहा…

अच्छी कविताएँ।

शशिशर्मा ने कहा…

अच्छी कविताएँ।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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