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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

सर्वेश सिंह की कविताएँ

युवा कवियों की कविताओं की इस प्रस्तुति में रीतेश मिश्र, अमित उपमन्यु और अरुण श्री के बाद आज सर्वेश सिंह की कविताएँ प्रस्तुत हैं. एक डिग्री कालेज में हिंदी के प्रवक्ता सर्वेश कविता के अलावा कहानियाँ भी लिखते हैं और आलोचना में ख़ासे सक्रिय हैं. उनकी कविताओं में एक ख़ास तरह का विट है जो उतना महानगरीय नहीं जितना कस्बाई है. यह क़स्बाई ठाट और जिद उनके यहाँ लगातार उपस्थित है कई बार कविताई से समझौते के बावज़ूद. शिल्प को लेकर वह अभी बहुत सावधान नहीं हैं, लेकिन कथ्य के साथ वह कोई समझौता नहीं करते. "जागती रहो कवयित्री" जैसी कविता में उनके भीतर का सहानुभूति से भरा मनुष्य एक कविता सभा में उपस्थित कवियों की गिद्ध दृष्टि को देखकर चिंतित तो होता है लेकिन वह इस दृष्टि को ठेंगे पर रख निश्चिन्त सो रही आधुनिक स्त्री को नहीं देख पाता. "कितना तो सच" जैसी कविता में उनका विट और एक सकारात्मक गुस्सा अपनी कलात्मकता और कौशल के साथ सामने आता है. 

अभी इतना ही कहते हुए शेष पाठकों के लिए छोड़ता हूँ और सर्वेश का असुविधा पर हार्दिक स्वागत करता हूँ. उम्मीद है उनका सहयोग आगे भी मिलता रहेगा.



विरह में दो मन्त्र

वहाँ जूते उतार कर जाते हैं
जैसे बिस्तरों पर
द्वार पर नंदी है-
उत्तुंग और उत्तेज

अंगूठे और तर्जनी की योग-मुद्रा से उसे आभार दें

यहाँ से अब वापसी मुश्किल है 
ध्यानावस्थित मन 
लसलसे रास्तों पर
खुद--खुद आगे बढ़ता जाएगा  
खून में मुक्ति की चाहना के काबुली घुड़सवार 
दौडेगें सरपट 

एक-सा ही जादू है
यहाँ भी..
और वहाँ भी.. 
कि मन की अज्ञानता में 
गर्भ-गृह के द्वंद्व की सुखद यातना में
एक गति, एक ताल और एकतानता में  
सारी ये कायनात
मंथनमय है 

और वहां जहाँ गिरता दूध जमा हो रहा है
और गल रहे हैं फूल,बेलपत्र 
वह आकृति, रूप के भवन में दीप की शिखा-सी है 
त्रिभंगी और लसलसी
वह बिस्तरों की सत्यापित प्रतिलिपि-सी है
 
देवताओं में सुडौल वे
सनातन काल से वहीं जमें हैं
पत्थर के चाम हो गए हैं

पर पत्थरों के इस विन्यास में
कितना तो साफ़ है
धर्म का उद्योग
कितना तो उज्जवल है उनका चिर-संयोग    

कितना तो समान है
कि बिस्तरों में उस कामना के बाद
जागना नहीं
और जागरण इस प्रार्थना के बाद भी नहीं 

कर्म के बस दो अलग-अलग तंत्र हैं
आस्था और वासना
श्रेयस और प्रेयस   

बस विरह में दो मन्त्र हैं-
ओह मेरे प्यारे शिवा !
ओम नमः शिवाय !!   

जागती रहो कवयित्री  
(कविता की सभा में सोती हुई एक कवयित्री को देखकर)

जागती रहो कवयित्री

कि अभी भी मंच पर बैठा एक बूढ़ा गिद्ध
अपने दांतों को पैना कर रहा है
कि तुम्हे बेखबर देख वह थका हारा ज्योतिर्लिंग 
अपने लोगों को दे रहा है नई युक्ति
जिससे तुम्हें नोचा जा सके बार-बार
हर सभा में

कि अभी भी वहाँ जल रहा है वही दिया
जिसका प्रकाश तुम्हारे लिए नहीं है

देखो कि दिल्ली से आया एक सत्तासीन कवि
तुम्हें यूं घोड़े बेच कर सोता देख
बिल्ली में बदलता जा रहा है
और उसके बगल में बैठा कवितातुर नौकरशाह
इतना अच्छा मौका पाकर
तुम्हारे सपनों में घुसने की कोशिश कर रहा है
और दूर पीछे बैठा
अपने भीतर स्त्री को पालने वाला
वह बलिष्ठ कवि
अपनी तीखी तिरछी नजरों से
तुम्हारी गौर देह
और उन्नत वक्ष में
कविता तलाश रहा है

संभल जाओ कवयित्री
कि अभी भी कमरे है बंद
और बैठे हैं वहाँ ढेर सारे मर्द
जो अपनी अनामिका को तर्जनी से बड़ी तो जरूर देखना चाहते है
पर तुम्हें बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते 
(तुम्हे पता तो है न की इसका मतलब क्या है ?)

अभी भी वक्त है कवयित्री
कि उठो,जागो और जगाओ उन सब को
जो थोड़ी सी जगह
थोडा सा सम्मान
और थोड़ी सी ठंडी हवा पाकर
तुम्हारे आसपास सो गई हैं
बताओ उन्हें कि यह कुर्सी
यह थोड़ी सी ठंडी हवा
और यह थोडा सा बतकुच्चन
भले अपना सा लगे
पर यह मंच 
यह सभा
और यह कमरा
अभी भी उनकी जद से बाहर है

मत सोओ कवयित्री
कि कृत्रिम प्रकाश में
मर्दों से भरी सभा में 
यूँ आंखें बंद कर और मुँह खोलकर सोना
अभी भी एक स्त्री के लिए बहुत खतरनाक है
___________________________________________________________


एकोहम बहुस्यामि.....
 
बटुक ने उसे पंचामृत में डुबोया
और आरण्यकों में प्रक्षिप्त कर दिया
पुजारी ने लपेटा गेरुवे में
और आरती की थाल में सजा दिया

एक बूढ़े समीक्षक ने परखा बहुरंगी चश्मों से   
और इतिहास के ऊपर उछाल दिया   
जब हाथ आई एक चौड़े जननायक के 
तो उसने नारे में बदल दिया

छात्रों ने उसके कतरों में पाए सन्दर्भ  
पढ़कर ठहर गया बंझा को गर्भ
ब्राह्मण ने लगाई पुराणों की दौड़
क्षत्रिय का अश्व लेकर भागा चित्तौड़
बनिए की तिजोरी की चोर बन गई  
शुद्र की थाली का कौर बन गयी 

देवताओं की अमृत बनी
असुरों की विष 
शाला की मन्त्र बनी 
वामा की तंत्र
               
बुद्ध की दुःख हुई
गौतम की न्याय
कबीर का क्रोध बनी
तुलसी की सहाय 

कोई मक्का लेकर भागा
कोई काशी
कहीं कठौते की गंगा बनी
कहीं सत्त्यानाशी

बिस्तर पर कामसूत्र बनी
कुरुक्षेत्र की गीता
किसी ने केवल राम देखा
किसी ने सीता

रूस हुई फ़्रांस हुई
हुई भगवा और वाम
कभी केवल रूप हुई
कभी केवल नाम
   
कविता तो एक थी
बस सुविधा की व्याख्याओं से
बहुस्यामि हो गई........


कितना तो सच !

कुल मिलाकर अगर फ़ालतू न सोचें तो
वह निहायत ही एक शरीफ आदमी है

इतने बड़े पद पर होते हुए भी
गलती से कुछ सही काम भले ही हो गये हों
पर ले दे के काम नहीं करने की गलती
कभी ना की उसने 

अरे घूस तो सभी लेते हैं
और क्या देते नहीं सब ?
चाहे गलत हों या सही
पर बेईमान की एक दमड़ी भी नहीं ली उसने
हाँ ! जो सही रास्ते पर था
लेकिन फंस गया
या फंसा दिया गया
और फिर जो दे भी रहा था  
दिल खोलकर लिया उससे

नहीं लेता तो क्या एक दूसरे तरह का पाप नहीं होता !

कभी किसी का हिस्सा भी नहीं मारा उसने
अपने से पहले वह दूसरे का पंहुचाता है
ताकि बनी रहे रवादारी और रसूख
इस परम्परा में    
और इस निष्ठा के लिए उसकी कसम खायी जा सकती है
बल्कि खाते ही हैं लोग फंसने पर

वह चिंतिति भी रहता है समाज के लिए
अक्सर खाने की मेज पर वह उदास हो जाता है
कुपोषित कुत्ते और गू खाते सूअर
जब उसे बेचैन कर देते हैं
तब ढेर सारा खाना फेंक देता है वह गेट के बाहर
सदय हो कुत्तों के हित

और शेफर्ड की तरह देखता है झुग्गियों को
जिसे सिर्फ अपने पेट की चिंता है

कि भगवान् इन्हें माफ़ करो
ये नहीं जानते
कि अपना
और कुत्तों का
और सूअरों का
पेट भरने का रास्ता
कितना तो सच्चा और सीधा है !

उसकी दिर्घोदरा बीवी
सहलाती है मन उसका 
और जलाती है मंदिर में दिया
कि अखंड रहे उसका अहिवात
नजर न लगे उन रंडियों की
जो समझा नहीं पाती अपने पतियों को
पेट और गहनों की भाषा

आखिर लोग यह क्यों नहीं सोचते
कि ये जीवन
कीचड़ में खिले कमल का नाम है
और केवल उसी पर हुमक के बैठती हैं
सुख और संमृद्धि की देवी
चंचला लक्ष्मी !
____________________________________________________________

बिटिया 

बाहर के उजाले
तुम्हारे चेहरे से रोशन हैं
और एक रंग जो सहेजे है इस घर को
तुम्हारे खेल के गुरुतत्व में स्थिर

तुम हो तो हैं ये हवाएं
जो खिलखिलाती हर कमरे में
करती हैं पीछा तुम्हारा
बेमन से जो हमें भी चटा जाती हैं अपना स्वाद
आशंका में जिन्हें नहीं खीचता मैं
कंठ के नीचे
कि कहीं तुम्हे कम न पड़ जाय

डोर हो तुम
पकड़ जिसे घूम लेता हूँ
पृथ्वी और आकाश
लपेट तुम वापस खींच लेती हो
फिर अपने मोंह के परेते में ....

पीछे जाना

पीछे ही जाना हो
तो जाना नहीं समा जाना
और उधर से जाना
जिधर से सूरज निकलता है  

कोई चश्मा पहनकर भी मत जाना
नहीं तो समा नहीं पाओगे 
बच्चो-सी आँखें ले जाना
तब तुम इतिहास नहीं कुछ और देखोगे

आंसूओं के चहबच्चे
पैरों से लिपट
सुनाएगें तुम्हें अपनी राम कहानी
और ऊपर पत्थर की खिडकियों से झांकती
सत्तर की सूनी आँखें
दिखायेंगी तुम्हे मनुष्य का असली अतीत 

स्मृति में तुम्हारे साजिशें भरती गयी हैं 
इसीलिए फिर कह रहा हूँ
कि चश्मा पहनकर
और डूबते सूरज की तरफ से
मत जाकर समाना  
कुछ नहीं पाओगे

तुम आज अचंभित हो
कि तुम्हारे प्रेम में कोई स्वाद नहीं है
और मैं कहता हूँ कि इसका कारण है
बहुत पहले की एक स्त्री के सर्पीले बाल
जो भरी सभा में सपना देख रहे हैं
किसी के खून से धुलने का
और शायद उससे भी पहले की एक स्त्री की करूँण प्रार्थना
कि ये धरती फट जाए
और मैं रहूँ उसके गर्भ में
इस धनुष-बाण की संस्कृति से बाहर

आँखों को उँगलियाँ बना टटोलना
वचनों से टुकड़े-टुकड़े हुआ प्रेम
वहीं कहीं लथपथ पड़ा होगा  

एक बात और याद रखना
पुष्पक से मत जाना
दबे पांव जाना
और वैसे समाना जैसे समाते हैं माँ में... 

झोले में कविता

कवितायेँ रख ली हैं मैंने झोले में
और निकल पड़ा हूँ अतृप्त इच्छाओं की काल यात्रा पर

घर से निकलते ही
उनमें से कुछ ने जोड़ लिए हैं हाथ
और हो गयीं हैं ध्यानमग्न
कि जैसे टूटने ही वाली हो धर्म की कोई मरजाद

और कुछ हो गयीं हैं गहरे उदास
कि जैसे फाड़ दिया जाने वाला हो कोई अनैतिक प्रेमपत्र

कंधे में उनकी संभावनाएं मह्शूश करते
खोज रहा हूँ समय का वह हिस्सा
जो फिलहाल न भूत में
न भविष्य में
और न ही वर्तमान में है

कि शायद किसी अन्तराल में मिले  
वह गहरे कानों वाली खूबसूरत स्त्री 
और इन्हें सौंप कर उसे
यह देखूँ 
कि जब एक कवि
और उसकी कवितायेँ
और एक ख़ूबसूरत स्त्री
मिलते हैं
तो वहाँ बना रहता है अँधेरा 
या लपेटता है उसे उजास  
 प्रेम के आइनों-सी तुलसी की पत्तियाँ

आजकल रोज रात सोने से पहले
सिरहाने पानी से भरा
शीशे का एक गिलास रख लेता हूँ
और सुबह आँख खुलने पर
उसे तुलसी पर चढ़ा देता हूँ

पता नहीं बासीपन से
या शीशे में रखने से
या अँधेरे में रात भर रखे रहने से  
या सिरहाने पड़े रहने से
या मुझ से कुछ पानी में मिल जाने से
पर ध्रुव है की पानी से ही
होता यह है कि 
दिन ढले तुलसी की पत्तियाँ
आइनों-सी दिखने लगती हैं   
उनमें झलकते हैं चाँद सितारे
आकाश और आकाशगंगाएँ
देवियों और देवताओं के चेहरे
अमृत और विष के कलश
आसमानी किताबों के फड़फड़ाते पन्ने

और सूरज को मुट्ठियों में दबाये पृथ्वी के चक्कर लगाता मैं  

यह सब धार्मिक -सा लग सकता है
पर मैं साफ़ दिल से कहता हूँ
कि यह अजूबा देखकर
मेरा यकीन इस बात पर बढ़ने लगा है
कि मैं किसी से प्रेम करने लगा हूँ |   




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 परिचय 


जन्म-     25 जून, इलाहाबाद,उत्तर प्रदेश
शिक्षा:   एम.ए.,एम.फिल.,पीएच.डी., जे.एन.यू.,दिल्ली से                                                                           
भाषा-   हिंदी
विधाएँ-  कहानी, कविता,आलोचना ; एक पुस्तक ‘निर्मल वर्मा की कथा-भाषा’ प्रकाशित 

संपर्क:
अध्यक्ष, हिंदी विभाग,
डी.ए.वी.पी.जी.कॉलेज,
(बी.एच.यू.)
औसानगंज,वाराणसी-२२१००१
मो.- 09415435154
Email:  sarveshsingh75@gmail.com  

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