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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

दुनिया भर की शराबों में जितना भी अल्कोहल है, सब गुरुदत्त है.: बाबुषा की कविताएँ


बाबुषा उन कवियों में से है जिसे पढ़ना हर बार किसी ज्ञात के भीतर के अज्ञात का साक्षात्कार करना सा लगता है. अब एक लंबा वक्फ़ा हुआ उसे पढ़ते. 2011 में उसकी कविताएँ असुविधा पर शाया हुई थीं ईश्वर के साथ बैठकर भुट्टा खाने की उसकी वह दीवानावार चाह वक़्त के साथ दीवानगी के नए मरहलों से गुज़री है. भाषा उसका बंदीगृह कभी नहीं बन पाई. किसी परम्परा से उसे जोड़ने का बोरिंग काम आलोचक करें. मुझ जैसा पाठक तो उस इमेजरी से रश्क करता है जो वह हँसते खेलते बनाते तो दिखती है पर एक कलमघसीट जानता है वह किस क़दर लहू पी के सुलझती होगी.  

ये कविताएँ हंस के ताज़ा अंक में आई हैं. मैंने कल उससे माँगी तो "लो, जो करना हो करो" वाले अंदाज़ में उसने भेज दीं. तो एक बार फिर यह हंगामाखेज़ दोस्त और मानीखेज़ शायरा असुविधा पर...



हरा गहरा नहीं मिलता


अरसा बीता किसी काली रात की गहरी खोह में बैठे
इस कदर जगमग हैं चौबीसों घन्टे 
कि गहरी नीदों में छुपने लायक अँधेरा नहीं मिलता
गाँवों में तक नहीं मिलते अब मीठे पानियों वाले गहरे कुएँ
कब से नहीं मिला कोई मरने की हद तक घायल 
किसी की आत्मा पर घाव अब गहरा नहीं मिलता
धड़कते जीवन के मुहाने खुलने वाली कोई गहरी सुरंग नहीं मिलती
यूँ तो हर ओर है बिखरा हरा, गहरा नहीं मिलता
इस बेतरह सूखाग्रस्त समय में घुटने तक भी नहीं डूबता जीवन
क्या करें
किस से कह दें
गहरी चुप्पियों में डूबने के सिवाय अब कोई चारा नहीं मिलता


महबूब की सिगरेट 

एक 

वो 
अपनी चुप्पियों से 
क़श-क़श बुनता आकाश
काढ़ लेती उसकी प्रिया
अनन्त  का घूँघट. ]

दो रास्ते होंगे उसके पास
विदा के ठीक पहले
बचे हुए सँकरे दस मिनटों में
हो सकता है खींच ले अपनी प्रिया को पास
सीने में भींच ले 
उँगलियाँ जला ले
बिखेर दे होंठों की राख
सब मिटा दे
या कि फिर खींच ले क़श
सीने में भर ले धुआँ
क़श क़श क़शमक़श

हालाँकि बिला शक 
जानती है लड़की अच्छी तरह ये बात
कि भीतर बक्से में पड़ी सफ़ेद धागे की गिटी निकाल कर
ढूँढ लेगा सुई का बारीक छेद
गोल-गोल छल्लों से बुनेगा आकाश
ख़ूब पढ़ना जानती है लड़की 
सफ़ेद अक्षरों की बारहखड़ी
धुएँ के जंगल से बीन लेती मौन बातें

वो आदमी
जिसकी उँगलियों के बीच
फँसा रहता हमेशा पूरा का पूरा एक संवाद
नहीं चूमता प्रेयसी के होंठ
वो चूमता आकाश
बादल ग़रीब
आनी-जानी रुत के सिपहिये
लड़की पर बरसता समूचा आकाश
घटाटोप धुंध में ढिबरी-सी जलती लड़की
उसके लिए
जो चपचाप बुन रहा आकाश



दो 

वो
जो धुएँ से बुन देता लड़की के हिस्से का आकाश
कि धरती मिट भी जाए तब भी बचा रहेगा आकाश
चिताओं की अग्नि को ढाँपे रखेगा 
और नदी की अस्थियों को भी सहेज लेगा आकाश
प्रलय की हिचकियों पर डोलती पृथ्वी
ईश्वर की अनंत साँस- सा आकाश
जब कुछ न था
जब कुछ न होगा

तब भी बचा रहेगा आकाश
धुएँ के बीच गुम वो आदमी
हृदय की सफ़ेद पड़ती कोशिकाओं से बुन रहा आकाश
उसकी उँगलियों के बीच
फँसा रहता हमेशा पूरा का पूरा एक संवाद
प्रिया चीन्ह लेती अपनी गुमी ओढ़नी
झट पहन लेती आकाश
लाज भरी लहर-लहर लहराती आँचल
उसके लिए
जो चुपचाप बुन रहा आकाश


साहब, बीबी और गुरुदत्त



"कोई किसी से प्यार कहाँ करता है, जानाँ ? "
लड़की उसे प्यार नहीं करती थी. वो तो सारा गुनाह बारिशों का था. इधर लड़का भी तो उसे प्यार नहीं करता. और बस ! जो भी हुआ, वो सारी शराब की ग़लती थी.
यूँ तो बारिशें बंजारा जात की औरतें हैं. जीवन और उल्लास के गीत गातीं, फिर शाम के धुंधलके में गुम हो जातीं. महुआ कच्चा-पक्का जैसा भी हर मौसम में मिल ही जाता. फिर एक और बारिश आ गयी और आई एक और लड़की. वो भी कहाँ प्यार करती थी उस लड़के से, वो तो सारा कुसूर गीता की आवाज़ का था जो उस वक़्त विविध भारती पर गुनगुना रही थीं कि,
"क़सम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी.."
"तुम भी चली जाओगी एक दिन. मैं नहीं भीगने वाला तुमसे. देखो ! मेरे पास छतरी है, रेनकोट है. सब इंतज़ाम पुख़्ता हैं अब की बार."
लड़की की गीली आँखों पर वो सिगरेट के छल्ले उड़ा देता. इधर वो सोचती कि अगर लड़का न मिला होता तो वो ज़िंदगी भर पानी बरसने को ही बारिश समझती रह जाती.
लड़का बेपरवाही से दूसरी ओर देखने लगता, व्हिस्लिंग करता, गुनगुनाता, चुटकुले कहता और शराब पीता.
जबकि लड़की ख़ूब अच्छी तरह जानती थी ये बात कि...
दुनिया भर की शराबों में जितना भी अल्कोहल है, सब गुरुदत्त है.


चलिये ! फिर कुछ और बात करें


ऐसा तो अक्सर ही होता है
कि पहला प्रेम घाव बन जाता है 
और दूजा औषध
इस धारणा को मानें तो घाव के साथ ही मिट जाती है
जड़ी-बूटी की भी ज़रूरत

हरे हो जाते घाव ऐसे मौसमों में
जो अब तक सूख चले थे
गाहे-बगाहे तड़कते रहते बिजलियों के साथ ही
जबकि याद में तक नहीं दर्ज रहतीं वो हरी जड़ी बूटियाँ
जिन पर इन दिनों जंगलों तक से गायब होने का संकट मंडरा रहा है
कुछ लोग नदियों में डुबकी लगाकर
जीवन की पीड़ा इत्यादि से मुक्त हो जाते हैं
कई तो सूखी भी होती हैं नदियाँ
इतनी सूखी कि उनमें कोई नहीं डूबता
ये खुद में ही डूब कर मर जाती हैं
कुछ नदियाँ लोगों को पार लगा देती हैं
कुछ लोग नदियों को पार लगा देते हैं

कई नदियों के नाम ही मिटते जा रहे नक़्शे से
बहुत सी जड़ी-बूटियाँ भी मिट चलीं सूची से
हौले-हौले फूँक कर मिटा दे अस्तित्त्व
प्रेम शायद ऐसे ही किसी इरेज़र का नाम होगा
कोरे काग़ज़ों पर लिखा जाता है चमकते अक्षरों में
नदी किनारे बसी उन गौरवशाली सभ्यताओं का इतिहास
जिसकी नींव 
हो न हो !  किसी तैराक ने ही रखी होगी

चलिये फिर ! 
लहलहाती फ़सलों की बात करें
बल खाती लहरों की बात करें
सजी-सँवरी नहरों की बात करें
नए-नवेले फूलों की बात करें
बारिश की
शहरों की बात करें
लिखी हुई बातों की बात करें
मिटी हुई चीज़ों पर इतना क्या सोचना
जाने भी दें
मार्स और प्लूटो की बात करें


9 comments:

Pranjal Dhar ने कहा…

शानदार कविताएँ! बधाइयाँ!

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचनाएँ

anupriya ने कहा…

बहुत सुंदर कविताएँ!बधाई।

akhiri khat ने कहा…

बाबुशा की कविताओं में जीवन से जुड़ा हुआ चिंतन झलकता है | मैं उनकी लेखनी को पसंद करती हूँ एक बेहतरीन कवियत्री हैं वह .. निशा कुलश्रेष्ठ

akhiri khat ने कहा…

बाबुशा की कविताओं में जीवन से जुड़ा हुआ चिंतन झलकता है | मैं उनकी लेखनी को पसंद करती हूँ एक बेहतरीन कवियत्री हैं वह .. निशा कुलश्रेष्ठ

Anand Kumar Dwivedi ने कहा…

शानदार कवितायें हैं भाई, पढवाने के लिए धन्यवाद !

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 04-02-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2242 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Nikita Singhal ने कहा…

शानदार रचना है सर कृपया मेरे इस ब्लॉग Indihealth पर भी पधारे

Prabhakar/ IndianTopBlogs ने कहा…

दिल को छू लेने वाली और दिमाग को झकझोरने वाली कविताएँ !

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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