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शनिवार, 16 अप्रैल 2016

अरुण श्री की कविताओं पर राहुल देव





मेरा अभीष्ट देवत्व नहीं है !


ज जबकि कविता बहुतायत में रची जा रही है ऐसे में कविता के कुछ प्रतिनिधि युवा स्वरों को चिन्हित करना बेहद कठिन काम है | वैसे भी निरंतर विकासशील प्रवृत्तियों पर बात करना अपेक्षाकृत जोखिमपूर्ण रहता है | फिर भी कविता के युगीन स्वरुप के निर्धारण के लिए कदम उठाये जाने चाहिए, ऐसे छिटपुट प्रयास हमें कभी-कभार दिखाई भी पड़ते हैं | संचारक्रांति और सोशलमीडिया के बढ़ते वर्चस्व से इधर कविता के लिखने-पढ़ने, छपने-छपाने में तेज़ी आई है जिसने कविता की गुणवत्ता को भी पर्याप्त रूप से प्रभावित किया है | ज्यादातर कवियों के लिए कविता लिखना अब भी एक शगल है | सोशल मीडिया पर हर तीसरा आदमी अपने को कवि मानता है | सार्थक लेखन करने वाले समर्पित साहित्यकार कम ही हैं | ऐसे दौर में कुछ ऐसे भी नाम हैं जिन्होंने निरंतर अच्छे लेखन से ध्यानाकर्षित किया है | अरुण श्री मेरे लिए उन्हीं नामों में से एक हैं | इससे पहले अरुण पत्र-पत्रिकाओं, ब्लोग्स आदि में प्रकाशित होते रहें हैं | चार संयुक्त काव्य संकलनों में उनकी सहभागिता रही है | साल 2015 के प्रारंभ में आया कविता संग्रह ‘मैं देव न हो सकूँगा’ उनका पहला स्वतंत्र कविता संग्रह है |अरुण युवा हैं | साहित्यिक फलक पर अपनी सशक्त अभिव्यक्ति से उन्होंने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है | उनकी ही तरह से युवा कविता में कुछ और नाम भी हो सकते हैं जिनकी रचनाशीलता को रेखांकित किया जाना चाहिए | युवा कविता के स्वरुप व प्रवृत्तियों पर आलोचकों को निष्पक्ष होकर अपनी राय रखनी चाहिए, उनसे बचना या कतराना नहीं चाहिए | न ही बगैर पढ़े यह कहना उचित होगा कि अच्छी कविता लिखी नहीं जा रही या भारत भूषण पुरस्कार लायक कोई कवि या उसकी कविता योग्य नहीं हैं | कविताओं के अनुपात में की गयी आलोचना का प्रतिशत बहुत कम है | किसी बड़ी प्रवृत्ति पर आरोप-प्रत्यारोप से पहले उस पर समग्रता में बात करना/ उससे गुज़रना पहली शर्त है | युगीन काव्य प्रवृत्तियों को तय करना एक प्रक्रिया है |


अरुण विद्रोह के कवि हैं | उनकी कवितायेँ अपने समय की आँखों में आँखें डालकर बात करने की शैली में हैं | वे उनमें लगातार प्रश्न उठाते हैं | अरुण कहीं भी पाठक को डिक्टेट नहीं करते और न ही कोई अंतिम निर्णय देते हैं, कविता ऐसा करती भी नहीं | तनाव और बेचैनी के आलम से निकली उनकी अधिकांश कवितायेँ पाठक को अन्दर तक आकुल कर देती हैं | अरुण उनमें राजनीतिक और सामाजिक अंतर्संबंधों की पोल खोलते नज़र आते हैं | उनकी काव्ययात्रा आत्म से अनात्म की यात्रा है | संग्रह में अपने आत्मकथ्य में कवि लिखता है कि, “मैंने यात्रा का चुनाव किया, गंतव्य का नहीं | जीवन मेरे लिए कोई उद्देश्य नहीं, एक यात्रा भर है |” कवि अपनी काव्ययात्रा के प्रारंभ में ही सीधी-सरल और सुविधाजनक राह न पकड़ते हुए जीवन के अनुभवों से गुज़रती हुई एक टेढ़ी-मेढ़ी, उबड़-खाबड़ पगडण्डी का चुनाव करता हैं | उनकी कविता में उनका यह आत्मसंघर्ष सहज ही परिलक्षित होता है | इनकी कविता में आपको सीधे-समतल रास्ते बहुत कम मिलेंगें | संग्रह की कविताओं को अरुण ने तीन खण्डों में विभाजित किया है – ‘मेरे विद्रोही शब्द’, ‘कवितायेँ नाखून बढ़ाकर’ तथा ‘जब भी सोचता हूँ प्रेम’ | अपनी पहली ही कविता से वह पाठक के सामने अपना मंतव्य स्पष्ट कर देते हैं | इस कविता का शीर्षक है, आखिर कैसा देश है ये? इस कविता की एक पंक्ति में वे कवि की पीड़ा को शब्द देते हुए लिखते हैं कि,

“एक कवि के लिए गैरकानूनी होने से अधिक पीड़ादायक है गैरजरूरी होना |”

सच है किसी देश के लिए कवि और उसकी कवितायेँ गैरजरूरी हो जाएँ इससे अधिक त्रासद और पीड़ादायक स्थिति और क्या होगी | इस कविता में अरुण धूमिल के तेवर में दिखाई देते हैं | वह कठोर यथार्थ की विसंगतियों को सामने रखते हुए साफ़ साफ़ बात करते हैं | उनके बिम्ब देखिये-

“कविताओं के हर प्रश्न पर मौन रहती है संसद और सड़कें भी
निराश कवि मिटा देना चाहता है नाखून पर लगा लोकतंत्र का धब्बा |”

अरुण के पास अपनी भाषा है | उनका सबसे मजबूत पक्ष उनका विशिष्ट कहन है | अरुण ने अपना एक अलग सलीका अपना एक अलहदा शिल्प विकसित किया है जोकि उनकी कविताओं में गद्यात्मक लगते हुए भी प्रवाह को बनाये रखता है | संवेदना से भरी-पूरी उनकी कविताओं में एक स्वाभाविक लय सुनाई देती है | अरुण ने छोटी-बड़ी सभी तरह की कवितायेँ लिखीं हैं | भावों की अपेक्षा कवि का विचारपक्ष ज्यादा प्रबल है | कवि सार्वभौम मानवीयता का पक्षधर है | वह एक बेहतर भविष्य का सपना संजोते हैं, उसकी तलाश के रास्ते सुझाते हैं | अजन्मी उम्मीदें शीर्षक कविता में वह लिखते हैं,

“हाशिये पर पड़ा लोकतंत्र अपनी ऊब के लिए क्रांति खोजता है |”

इस कविता में कवि संसद और सड़क से प्रश्न पर प्रश्न करता है | संसदीय माननीयों के प्रति उसका आक्रोश यूँ ही नहीं | उनकी गलत नीतियों, तमाम सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक विषमताओं, राजनैतिक बदलाव की इच्छा और विकल्पों का अभाव पाठक को सड़क की आम जनता के प्रति गहरी सहानुभूति से भर देता है | उनकी कई कविताओं में भूमंडलीकृत दौर में तेज़ी से पैर पसारती जा रही कैपिटलिज्म की तीखी आलोचना है | अरुण विचारों के स्तर पर मार्क्सवाद से प्रभावित अवश्य हैं लेकिन उसके अंधानुगामी नहीं | अपनी यात्रा के लिए साध्य और साधन दोनों की शुचिता उसके लिए महत्त्वपूर्ण है | उसे फ़र्क नहीं पड़ता कि इससे किस वाद की सेवा बन या बिगड़ जाती है | इस वजह से ही कवि एक बेबाक, ईमानदार व दृष्टिपूर्ण काव्यरचना में समर्थ हो सका है | यह तथ्य अरुण के काव्यव्यक्तित्व की मौलिक व स्वतंत्र निर्मिति करता है | मेरे विद्रोही शब्द शीर्षक कविता में सामंती प्रवृत्ति को संबोधित करते हुए कवि स्पष्ट लिखता है,

“तुम्हारे मुकुट का एक रत्न होना स्वीकार नहीं मुझे
शब्दों के विलुप्त होने की प्रक्रिया समझाते तुम –
विद्रोही कवियों से एक अदद प्रशस्तिगान चाहते हो
लेकिन मेरे लिए सापेक्ष तुम्हारा झंडा थामने के –
कंगूरे से कूद आत्महत्या कर लेना बेहतर विकल्प है |”

अरुण अपनी कविताओं में व्यक्त आक्रोश को व्यंग्य में नहीं बदल पाते जैसा कि धूमिल अपनी कविताओं में संभव कर दिखाते हैं | धूमिल किस तरह व्यवस्था की विसंगतियों को उघाड़ते हैं | उनकी गंभीर वैचारिकता और व्यंग्य शब्दचित्रों का तालमेल कविताओं को पाठकीय प्रत्युत्तर के लिए तैयार करता है | धूमिल के काव्यांश इसीलिए उधृत किये जाने वाले काव्यांशों में सर्वोपरि हैं | यहाँ मेरा उद्देश्य कवि की किसी भी तरह से धूमिल से तुलना करना नहीं है | यहाँ बस मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि आक्रोश को यदि व्यंग्य की धार मिल जाए तो कविता और अधिक प्रभावी हो जाती है | इसी तरह अरुण कहीं-कहीं बहुत सीधे व सपाट हो जाते हैं जिससे पाठक कई बार किसी काव्य निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाता | ऐसे में कविता अपने ढाँचे में खड़ी तो हो जाती है लेकिन उससे पाठकीय अपेक्षाओं की पूर्ति संभव नहीं हो पाती ध्यान रहे कि यहाँ पाठक से मेरा आशय सामान्य और प्रबुद्ध दोनों प्रकार के पाठकों से है | कवि की मान्यताओं को पाठकीय विस्तार मिलना एक अच्छी कविता के लिए जरूरी तत्व है |

‘कोई क्रांतिकारी नहीं हूँ मैं’ एक अच्छी कविता है | कवि दिनोंदिन बढ़ते जा रहे अत्याचारों-अनाचारों से बहुत व्यथित हो जाता है और कविता फूट पड़ती है | उसका कहना है कि वह कोई क्रांतिकारी नहीं है लेकिन ऐसे समय में चुप रहना भी समस्या का कोई हल नहीं है | कवि अपनी कविताओं के माध्यम से अपना प्रतिरोध दर्ज करता है | कवि के लिए उसकी कविता ही उसका हथियार है | प्रेम की परिभाषा क्या है ? वास्तविक प्रेम के संघर्ष का चित्रण कवि अपनी कविता में करता है | ‘प्रेम संघर्षरत है’ शीर्षक कविता में कवि कह उठता है,

“असल प्रेम तो/ तुम्हारे भीतर ही कहीं संघर्षरत है अपने अस्तित्व के लिए”

यह कविता भौतिकतावादी प्रेम की निर्मम चीरफाड़ करती है |

‘सुनो स्त्री’ शीर्षक कविता में कवि का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट होता है | इस कविता में वह बताते हैं कि किस तरह एक आत्मा (स्त्री) देह में बदलती है | थोपी गयी स्मृतियों को कवि इसका मुख्य कारण मानता है | तो वहीँ ‘चमारनामा’ नामक कविता में कवि समाज के निम्न कहे जाने वाले वर्ग के साथ खड़ा दिखाई देता है | ‘इरोम चानू शर्मीला’ शीर्षक कविता एक बेहद मार्मिक कविता है जिसमें उनके प्रति कवि की सघन संवेदनाएं व्यक्त हुई हैं | ‘बुद्धिजीवियों के षड्यंत्र’ शीर्षक कविता में अरुण कहते हैं,

“तुम देते रहो
वातानुकूलित मंचों से कृष्ण के प्रेम का उदाहरण
मुझे तो अपना प्रेम समझ न आया आजतक
आश्चर्य तो ये कि तुम प्रेम की बात करते
खाप के विषय में बात करना जरूरी नहीं समझते
सुना है लव जेहाद की चर्चा बहुत है इनदिनों”

या फिर इसी कविता का यह अंश,

“अलग देशकाल-परिस्थितियों को भोगता हुआ मैं
नहीं जानता कि ये मिथक
सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने के लिए थे
या समकालीन बुद्धिजीवियों के षड्यंत्र का हिस्सा
जानते हो
प्रतीक बच निकलने का रास्ता सुझाते हैं अक्सर
तीन बंदरों के चरित्र वाले तुम
महान पुराने वक्तव्यों में तलाशो अपना ब्रह्म-सत्य
मुझे तय करनी है
अपने समय की प्राथमिकतायें और मेरी पक्षधरता
मेरे गाल तुम्हारे गांधीबाबा की बपौती नहीं हैं |”

यह सामाजिक अंतर्विरोधों की कविता है जिसमें कवि ने बड़े साहस के साथ मिथकों और ऐतिहासिक तथ्यों का समावेश किया है |

‘थोड़ी सी लज्जा’ शीर्षक कविता में कवि का यह कहना कि,

“वातानुकूलित संस्कृति की आदी मेरी पसंदीदा कवयित्री
अपनी कविताओं में लिखती है पहाड़
और दरक सी जाती है
पत्थर हुए पाठकों के बीच
उदास नदी सी दर्ज कराती है अपनी मुग्ध उपस्थिति
लेकिन नदी किनारे बसे अपने गाँव नहीं जाना चाहती
कहती है वहां उमस है बहुत, बिजली भी नहीं रहती |”

समकालीन कविता के कृत्रिम परिदृश्य पर करारी चोट है | अगर हमारी कविता से लोक के असल चित्र अनुपस्थित हैं तो निश्चित रूप से यह कविता के लिए चिंता का विषय है | ऐसे बनावटी बिम्बों से सजी कविता पाठक को क्या स्पर्श करेगी | साहित्यकारों की कथनी और करनी के अंतर ने साहित्य को आमजन से दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है | संग्रह की कविता ‘यार कवि’ छोटी लेकिन बढ़िया कविता है | इस कविता में कवि का कहना है कि कवि हो जाना जीवन की जीवन्तता से विमुख हो जाना नहीं है | यह कविता हरदम कविता में डूबे रहने वाले कुछ गंभीर किस्म के कवियों को संबोधित है | कवि भी सबसे पहले एक मनुष्य है, वह किसी दूसरे ग्रह से आया हुआ प्राणी नहीं | उसे भी जीवन के तमाम पलों को जीने का हक़ है | कविता इस बात का समर्थन करती है |
संग्रह की कविता ‘बेटी से लड़की होने तक’ के निम्न अंश दृष्टव्य हैं,

“वो छीन लेती है अपने हिस्से की किताबें
दूध देख नाक सिकोड़ती लड़की
प्रेम को मानती है नमक जितना जरूरी
प्रेयस के लिए चौराहे की दूकान से खरीदती है
‘जस्ट फॉर यू’ लिखा काफी मग
पिता के लिए नया चश्मा कि देख सकें
सम्मान के नए शिखर
बेटी के मजबूत होते पंख भी
फिर सौंप दूंगा उसे अपनी अधूरी डायरी
कि वो खुद तय करे अपनी कहानी का उपसंहार”

जैसे कवि कोई काव्य डायरी लिख रहा हो | मानो वे छोटी छोटी काव्यकथाएं सुना रहे हों | आगे की कविता में वह कवि के पाखण्ड पर भी तंज करते हैं कि क्यों एक पुरुष तय करता है स्त्री होने की परिभाषा | इस संग्रह की एक छोटी कविता ‘एक कतरा अँधेरा’ मुझे बहुत पसंद आई इसलिए उसे आपके लिए पूरा दे रहा हूँ | देखें –

“दीपावली की रात है, उजली है बहुत

अभी जब डूबा था पिछला सूरज,
जलाए थे दिये मैंने –
ख़ुशी के, प्रीत के, अर्थ खोती रीत के

नयी रंगीनियों में डूब गया था कालापन
पुरानी करवटों पर डाल दी थी नई चादरें
खरीद लीं थीं बिकाऊ मिठाइयाँ
लेकिन नहीं खरीद पाया मिठास –
जिंदगी की
दूर नहीं हुआ विचारों का कसैलापन

अभी-अभी बदले चादरों पर उभर आई है –
पुराने बिस्तर की सिलवटें
रंगीन किये हुए दीवारों से –
झाँक रहे हैं अब भी कुछ पुराने धब्बे
पाठकों के शोर में भी चीखता है
हृदय के कोने से एक अंतहीन सूनापन

रौशनी से चौंधियाई आँखों में,
एक कतरा अँधेरा कहीं सहमा हुआ है |”

यह कविता कम शब्दों में कितना कुछ कह जाती है | आप देखिये यह कवि शब्दों के माध्यम से कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं करता | संग्रह की कविताओं में सभ्यता, प्रेम, संसद, सड़क, कवि, शब्द, लोकतंत्र, देश, क्रांति, विद्रोह, सुनो, लड़ो, स्त्री, भूख, पेट, वोट, मृत्यु, बीमार, खून जैसे शब्द बार-बार आते हैं | जिनसे कवि के मूलभाव को सहज ही समझा जा सकता है |

संग्रह के तीसरे और अंतिम खंड की कवितायेँ पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि संभवतः ये कवि की प्रारंभिक रचनाएँ हैं | भावों की अतिशयता और प्रवाहपूर्ण गीतात्मकता इन कविताओं को शेष दो खण्डों की कविताओं से अलग खड़ा करती हैं | इस खंड की ज्यादातर कविताओं प्रेम के स्थूल एवं सूक्ष्म स्वरुप का गहन पर्यवेक्षण एवं विवेचन मिलता है | ‘कैसे कहता’ शीर्षक कविता में जब कवि को उसका एक पुराना दोस्त मिल जाता है तो वह कवि से पूछता है कि क्या अब भी लिखते हो जिसके उत्तर में कवि अपनी कविता में कह उठता है कि,

“कैसे कहता?
जिसके लिए लिखता था अब वो रूठ चुका है
जिस रिश्ते पर अहंकार था – टूट चुका है
अब तो जितना हो सकता है खुश रहता हूँ
दिल तो दुखता है लेकिन अब चुप रहता हूँ

अब मैं दर्द नहीं लिखता हूँ !”

यह एक भावुक कर देने वाली कविता है | इसी तरह की प्रियतमा की स्मृतियों का एक और उदाहरण ‘बची हुई तुम’ शीर्षक कविता भी है जिसकी पंक्तियाँ हैं,

“जाने क्या –
जो सख्त बर्फ के नीचे अपनी गर्माहट से
सींच रहा है बीता रिश्ता
शायद –
तुम थोड़ी – थोड़ी मुझमे रहती हो
पास तुम्हारे छूट गया हूँ थोड़ा मैं भी |”

प्यार और रोटी के बीच की कश्मकश में कवि बेचैन होकर उत्तर ढूँढता है – (‘उत्तर ढूंढना है’ शीर्षक कविता)

“चाहता हूँ मेरे आँगन की बहारें खिल उठें –
प्यार का मेरे मधुर स्पर्श पाकर
सोचता हूँ डूब जाऊं प्यार की प्यासी नदी में

पर विवश हूँ, क्या करूँ मैं
भूख की रेखा खिंची है,
प्रश्न रोटी का खड़ा है बीच अपने,
और उत्तर ढूंढना है |”

वह जानता है कविताओं से हल नहीं होते भूख के जटिल समीकरण | जिंदगी का यह गणित इतना आसान नहीं |
अपनी ‘बिल्ली सी कवितायेँ’ शीर्षक कविता में अरुण कहते है,

“मैं कई बार शब्दों को चबाकर लहुलुहान कर देता हूँ
खून टपकती कवितायेँ
अतिक्रमण कर देती हैं अभिव्यक्ति की सीमाओं का
स्थापित देव मुझे खारिज़ करने के नियोजित क्रम में
अपना सफ़ेद पहनावा सँभालते हैं पहले
सतर्क होने के स्थान पर सहम जाती हैं सभ्यताएं
पत्ते झड़ने का अर्थ समझा जाता है पेड़ का ठूंठ होना |”

इसीलिए कवि चाहता है कि उसकी कवितायेँ बिल्ली सी हो जाएँ | यहाँ पर बिल्ली चपलता और अन्धविश्वास का एक प्रतीक है | या फिर ‘मेरी गवाहियाँ’ शीर्षक कविता का यह अंश देखिये,

“मैं मनुष्यता के दुर्दिनों का साक्षी मात्र हूँ
अदालतें न जाने कहाँ व्यस्त हैं इन दिनों
थाने की दीवार पर लिखा है कि शांति बनाये रखें कृपया
मुझे ‘वरना’ समझ आता है सरकारी ‘कृपया’ का अर्थ
मैं अपनी गवाहियाँ चौराहे के कूड़ेदान में फेंककर लौटा हूँ |”
और ‘गृह मंत्रालय का बयान’ शीर्षक कविता की यह एक पंक्ति,
“इस लोकतंत्र में एक वोट से ज्यादा क्या है तुम्हारा निवेश?”

इन कविताओं ने चली आ रही काव्यजड़ता को तोड़ा है | अरुण की कवितायेँ भीड़ में अपनी एक अलग ही पहचान बनाती नज़र आती हैं | कहीं कहीं कवि नास्टैल्जिक हो जाता है तो कहीं कहीं इनके यहाँ पर समकालीन यथार्थ कवि की कल्पना का साथ पाकर एक रूमानी फैंटेसी का प्रतिसंसार बनाता प्रतीत होता है जिनमें मुक्तिबोध की तरह अर्थों के गहरे संस्तर दिखाई देते हैं | इस प्रवृत्ति का सबसे अच्छा उदाहरण मुझे उनकी नयी कविता ‘साधो सूर्य का यह देश’ लगी | यह कविता इस संग्रह में सम्मिलित नहीं है |

कवि मदन कश्यप एक जगह कहते हैं कि हिंदी में सिर्फ दो तरह के लेखक हैं एक वे जो इस समाज और दुनिया को बदलना चाहते हैं अथवा कम से कम बदलाव में आस्था रखते हैं और इस बदलाव के लिए लिखते हैं | जबकि दूसरे वे हैं जो इस दुनिया को तमाम पतनशील मूल्यों के साथ स्वीकार कर चुके हैं और इस दुनिया में अपनी जगह बनाने/ बढ़ाने और अपना कद ऊँचा करने के लिए लिखते हैं | अरुण की कविताओं को पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूँ कि अरुण प्रथम प्रकार के कवि हैं | हिंदी कविता को इस युवा कवि से बहुत अपेक्षाएं रहेंगी |
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संपर्क : 

ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

मो. 09454112975
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अरुण श्री की कुछ  कवितायेँ  आप  यहाँ  पढ़  सकते  हैं. 

2 comments:

अरुण श्री ने कहा…

और क्या कह सकता हूँ सिवाय एक धन्यवाद के ....

pravin Kumar ने कहा…

मैं अरूण श्री को फेसबुक पर लगातार पढ़ता हूँ... एक आपलोग भी उनकी रचना पढ़ीये जो मुझे खूब पसंद है।
जी रहा अब तक उठाए जिन दिनों का मैं सलीब ।
याद रखना उन दिनों मुझसे किया था प्यार तुमने ।

प्रेम साधा जा चूका था , साधना था विश्व तुमको ।
मैं भला क्यों रोकता तुमको तुम्हारा तप लजाता ।
उन दिनों मैं सूर्य होता था तुम्हारी आस्था का ।
और तुमने रख लिया माथे लगाकर ,
माँग शुभ-आशीष मेरा -
“चाँद बन चमको किसी आँगन, तुम्हें सींचा करूँगा”

आँख भर आँसू छुपा चुपचाप मैं -
तकता रहा सुन्दर सजा आँगन तुम्हारा ।
होंठ भर मुस्कान ओढ़े कर लिया श्रृंगार तुमने ।
याद रखना उन दिनों मुझसे किया था प्यार तुमने ।

कब कहा मैंने कि है बाकी मेरा अधिकार तुमपर ,
कब कहा पथ रोक लूँगा देखते ही ,
कब कहा तुम याद आती हो अभी तक ?
हाँ !
मगर है चाह ,
मेरा दृश्य अंतिम -
‘लाँघ कर चौखट चला मैं देश दूजे ,
द्वार से तुम कह रही -
“जाना संभलकर,जल्द आना,राह देखूंगी”।

जानता हूँ बचपना है ।
बार अनगिन बचपने ही बचपने में किन्तु मुझको ,
दे दिए थे कुछ बड़े उपहार तुमने ।
याद रखना उन दिनों मुझसे किया था प्यार तुमने ।
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अरुण श्री !!

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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