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सोमवार, 2 जनवरी 2017

उज्ज्वल भट्टाचार्य की कविताएँ

लम्बे समय से जर्मनी में रह रहे आधे जर्मन और पूरे भारतीय उज्ज्वल भट्टाचार्य को कविता की दुनिया में आमतौर पर एक शानदार अनुवादक के रूप में जाना जाता है. एरिष फ्रीड, बर्तोल्त ब्रेष्ट, हान्स माग्नुष एन्त्सेबर्गर और गोएठे की कविताओं के उनके द्वारा किये अनुवाद पुस्तक रूप में आ चुके हैं. लेकिन लम्बे समय से उन्होंने लगातार कविताएँ लिखी हैं. उनकी कविताएँ एक बेचैन राजनीतिक कार्यकर्ता की कविताएँ हैं. अपने समय की विडम्बनाओं से जूझते वह अपने पक्ष में मज़बूती से खड़े ही नहीं रहते बल्कि गहन वैचारिकता के साथ इस "पक्ष" के भीतर के अंतर्द्वंद्व से भी लगातार गुज़रते हैं.

अपनी कविताओं के प्रकाशन को लेकर उनकी सावधानी का आलम यह है कि अब जाकर उनका पहला कविता संकलन - "राजा का कुर्ता और अन्य कविताएँ" वाणी प्रकाशन से आ रहा है. संकलन तो ख़रीद कर पढियेगा, अभी उनकी कुछ कविताएँ असुविधा पर.



अपनी लाश देखकर

जब वह सुबह घर से बाहर निकला तो दरवाज़े के बाहर उसकी लाश पड़ी थी। पन्नी से ढकी लाश, पास में एक पुलिसवाला खड़ा था। बताया, तीसरी मंज़िल की खिड़की से उसकी लाश नीचे गिर पड़ी थी। क्यों, उसने पूछा। पता नहीं, कंधे उचकाकर पुलिसवाले ने जवाब दिया। सुबह 9 बजे, पुलिसवाले ने कहा, उस समय गिरजे का घंटा बज रहा था।

नीचे गिरने से पहले उसकी लाश ने विदा ली थी : सलमान रुशदी से, अमरीकी राष्ट्रपति से, किसी अफ़्रीकी देश में आई भुखमरी से, अपनी बीवी से। बच्ची का माथा सहलाते हुए उसकी आँखें छलछला आई थीं। ठिठककर एक लमहे के लिए उसने कुछ सोचा था।
पर पूरब की ओर खुली हुई खिड़की उसे न्योता दे रही थी।

बगल की दीवार पर उसकी किताबें लगी हुई थीं, कोने में म्युज़िक बाक्स था, मेज़ पर कविताएँ, संपूर्ण-असंपूर्ण, अधकचरे नोट। मेरे बाद सब कुछ ख़त्म हो जाएगा, ठहरकर उसने सोचा था। लेकिन जब वह खुद ही ख़त्म हो चुका है, फिर क्या सारी चीज़ें ख़त्म नहीं हो गई हैं ?

एक मरे हुए आदमी को लाश बनते कितनी देर लगती है ? चौंककर उसने सोचा था :
अब सब जान जाएँगे कि वह मर चुका है। दो दिन पहले मौसम के बारे में अपनी राय देनेवाला पड़ोसी अब क्या सोचेगा ? मौसम कैसा भी हो, क्या लाश के लिए कोई फ़र्क पड़ता है ? उसे थोड़ा नज़ला सा था और उसने सोचा था : क्या नज़ले के साथ नीचे कूद पड़ना ठीक रहेगा ?

उसने सोचा था, लोग सोचेंगे, इसीलिए वह मुस्कराया करता था, इसीलिए वह इतना बोलता था, इसीलिए वह चुप रहता था।


अपनी लाश को देखकर वह सोचने लगा : लाश बनने का फ़ैसला उसने क्यों लिया था ?
क्या उसने वाकई कोई फ़ैसला लिया था ? क्या मरा हुआ आदमी कोई फ़ैसला ले सकता है ? लेकिन अगर उसने फ़ैसला लिया, फिर क्या वह सचमुच मरा नहीं था ? अगर वह मरा नहीं था, फिर उसने लाश बनने का फ़ैसला क्यों लिया ? क्या यह सिर्फ़ एक ग़लतफ़हमी थी ?

उसने सोचा, पुलिसवाले से पूछा जाए। लेकिन पुलिसवाले के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।

उसका जीवन

बचपन से ही मां-बाप कहते थे
बेटी को पढ़ाऊंगा
एक अच्छे घर में शादी होगी
और ऐसा ही हुआ
आनर्स में उसे फ़र्स्ट डिवीज़न मिला था
फिर शादी हो गई
ससुराल में उलाहने
लगभग नहीं के बराबर मिले
पति के साथ
छुट्टी पर जाने का मौका मिला
एकबार जयपुर
एकबार तो दस दिनों के लिये साउथ की टूर
दो बच्चे हुए
नौकरी का इरादा छोड़कर
घर संभालना पड़ा
पति साहब हो गए
एकबार सेक्रेट्री से इश्क का लफ़ड़ा चला था
जल्द ही ठीक हो गया
बेटे को मैनेजमेंट में डिग्री के बाद
अच्छी नौकरी मिल गई
बेटी की भी शादी हो गई
जीवन भरा-पुरा था
शाम को वह सीरियल देखती थी
अचानक एक छोटी सी बीमारी के बाद
वह चल बसी.

अब वह लेटी हुई थी
पड़ोस की औरतें कह रही थीं
भागवंती है
सुहाग लेकर चली गई.
पेरुमल मुरुगन

शहर के चौक के बीच खड़े होकर
उस शख़्स ने कहा :
मुझे पता है
धरती घूमती है
घूमती रहेगी.
मैं पेरुमल मुरुगन हूं.
और मैं ज़िंदा हूं
लेकिन मेरे अंदर का लेखक मर चुका है.
मैं कुछ नहीं लिखूंगा,
मैं कुछ नहीं बोलूंगा.

पास खड़े दोस्त से मैंने पूछा :
कौन है यह पेरुमल मुरुगन ?
उसने कहा : लेखक था,
अब पता नहीं.
क्या लिखता है, मैंने पूछा.
उसने जवाब दिया : पता नहीं,
फिर उसने पूछा : जानना चाहते हो ?
मैंने कहा : पता नहीं,
लेकिन इतना ज़रूर जानना चाहता हूं
कि इसकी अहमियत क्या है ?

उसने कहा :
अहमियत सिर्फ़ इतनी है
कि वह शख़्स चीखते हुए कहता है
कि वह अब नहीं बोलेगा
और सड़क के दोनों ओर सारे मकानों में
खिड़कियां बंद हो जाती हैं,
खिड़कियों के पीछे पर्दे खींच दिये जाते हैं,
पर्दों के पीछे बत्तियां बुझा दी जाती हैं,
तुम और मैं
हम दोनों सड़क के किनारे खड़े रहते हैं.

थका हुआ क्रांतिकारी

जाड़े का मौसम है
ठंड के मारे बुरा हाल है
थका हुआ क्रांतिकारी
कम्बल लपेटकर
बिस्तर पर बैठा है
उसका सिद्धांत है -
दौड़-धूप करने से
पसीना आता है
पसीना ठंडा हो जाय
तो कंपकंपी होने लगती है.


वो कहता है :
सिद्धांत को समझे बिना
सड़क पर मत उतरो
ठंड लग जाएगी.
मुझे बिस्तर में रहने दो
कम्बल के नीचे.


मैं सिद्धांत तैयार करता हूं.
मुझे छेड़ो मत.
छेड़ो मत.

हमारा रहनुमा

जब वह झूठ बोलता है,
लोग उसे सच मानते हैं.
जब वह सच बोलता है,
तब भी लोग सच मानते हैं.
और वह परेशान हो सोचता है :
वह सच बोल रहा है या झूठ ?

लोग जब उससे ख़ुश होते हैं,
उसकी जयजयकार करते हैं.
लोग जब परेशान रहते हैं,
उसकी जयजयकार करते हैं.
और वह मायूस हो सोचता है :
लोग परेशान हैं या ख़ुश ?

जब वह झूठ बोलता है,
उसे सच बनाना चाहता है.
जब उसे सच बोलना होता है,
वह ख़ामोश रह जाता है.
वह हमेशा डरता रहता है,
उसका सच कहीं झूठ ना हो जाय.


वह सबकुछ कर सकता है,
सिर्फ़ सच नहीं बोल सकता.

पीढ़ियों के दरमियान

अपनी उम्र की घमंड के साथ
बच्चों से कहता हूं :
जानते हो, कितने सालों का तजुर्बा है
मेरी बेवकूफ़ियों का
ये बाल धूप में नहीं पके हैं,
यह कुर्सी
तुम्हारे लिये नहीं,
मेरे लिये बनी है.
कुर्सी में धंसा हुआ मेरा चेहरा –
उसे देखो –
कुछ सीखो –
तुम्हारा भी वक़्त आएगा,
लेकिन अभी नहीं.

बच्चे खड़े-खड़े मुझे देखते रहे,
मुझे देखते रहे
और मुस्कराते रहे,
फिर वो निकल पड़े
बाहर की ओर.

अब मैं अकेला हूं,
कुर्सी में धंसा हुआ

बेहद अकेला.

ऐतिहासिक प्रक्रिया

जहाँ मैं हूँ
मुझे होना नहीं है
पसंद भी शायद नहीं है
लेकिन वह भरोसा दिलाता है
वहां तक के रास्ते का
जहां मुझे पहुंचना है.

वहां मुझे पहुंचना होगा
लेकिन जब मैं वहां होउंगा
वहां मुझे होना नहीं होगा
पसंद भी शायद नहीं होगा
लेकिन वह भरोसा दिलाएगा
वहां तक के रास्ते का
जहां मुझे पहुंचना होगा.



1 comments:

surendra kumar ने कहा…

सभी कविताये बहुत सुन्दर हैं। पढ़ते हुए लगता है कि एक शब्द चटर बन कर हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है। कविता समाप्त होने के बाद कुछ खदबाता है ह्रदय में और एक टीस स्थाईभाव बन कर ठहर जाती है।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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