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मंगलवार, 10 जनवरी 2017

इला जोशी की कविताएँ

इन दिनों बम्बई में रह रही इला जोशी एकदम युवा पीढ़ी के उन गिने-चुने कवियों में से हैं जिनकी सामाजिक राजनैतिक सक्रियता साहित्यिक सक्रियता से भी ज़्यादा है. वह "मोर्चे पर कवि" के आयोजकों में से हैं जो पिछले एक साल से भी अधिक समय से हर महीने बम्बई की लोकल ट्रेन से लेकर सड़क तक पर जनपक्षधर कविता को लेकर जाने का शानदार काम कर रहा है. 

इला की कविताएँ एक प्रश्नाकुल युवा की कविताएँ हैं. यहाँ लगातार सवाल हैं, सवालों से जूझने का माद्दा है, एक पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री होने की विडम्बनाएँ हैं और उम्मीद है. अक्सर छोटी कविताएँ लिखने वाली इला के पास एक बनती हुई भाषा है और अपने कथ्य को सहजता से कह पाने के लिए आवश्यक शिल्प. असुविधा में उनका स्वागत  



देशभक्ति का साहित्य

देशभक्ति के काल में
रचा गया
सबसे अश्लील साहित्य
और जुटाए गए
कामोत्तेजित आंकड़े

इसकी विषय सूची
पटी पड़ी थी
अफ़वाहों के
हस्तमैथुन उपजित वीर्य से
और अनुलग्नक में थीं
तंत्र और प्रशासन के
सम्भोग की विवेचना
 हमाम में शर्म

नंगों के हमाम में दाख़िल हुई
पूरे कपड़े पहनी एक औरत
और अपने नंगेपन से शर्मा
उन्होंने उस औरत से मांगी
एक एक कतरन
और ढक दिया अपना पौरुष

वो अब भी हमाम में
नंगे ही खड़े थे
और अपने कपड़ों से बची
आख़िरी कतरन से
उस औरत ने ढक लीं
अपनी आंखें
उसने कभी सुना था कहीं
कि आँख की शर्म तो होनी चाहिए

संशयी प्रेम

बिस्तर के छोर से
मध्य का सफ़र
देह ने किया

साथ होने का
सफ़र किया
प्रेम ने

एक
समानांतर सफ़र में
प्रेम से देह जुड़ी
या देह से प्रेम

जीवन चक्र

जीवन के पड़ाव
बदल देते हैं मतलब
बुनियादी बातों के भी
जबकि हम हर पड़ाव पर
जी रहे होते हैं
कई समानांतर जीवन

ये नहीं होता है
किसी चक्र के भाँती
कि ज़रूरी हो लौटना
उसी जगह पर
जहाँ से की थी शुरुआत
और जीवन मृत्यु का भी
आपस में कोई सम्बन्ध नहीं

इतिहास के तहखाने में औरतें

उन्हें औरतें पसंद हैं
घरों में, दफ़्तर में
सड़क, रेल और बसों में
जहां आसान होता है
उन्हें टटोलना और
उनके अंदर के भाव
दिखने लगते हैं
उन औरतों के चेहरों पर

उन्हें नापसंद हैं
इन औरतों से अलग औरतें
जो कभी इन्हें टटोल लेती हैं
महसूस करती हैं इन्हें वैसे ही
जैसे ये करते हैं घर, दफ़्तर,
सड़क, रेल और बसों में
उस पल इनका पौरुष
झेल नहीं पाता
उन औरतों की कामुकता

इन्हें अपनी जैसी औरतें
बिल्कुल पसंद नहीं
जो जानती हैं
साम, दाम, दंड की भाषा
और देती हैं पटखनी
इन्हें इनके ही दांव में
तब खंगालते हैं ये
उसका इतिहास, रसूख़
धर्म और जाति

ये भूल जाते हैं सिर्फ़ इतना
कि औरत का नहीं होता
कोई धर्म, जाति और परिवार
और जब वो तोड़ने लगती है
अपने दायरे और इनकी नैतिकता

असली राजनीति तब शुरू होती है

5 comments:

anupriya ने कहा…

सभी कविताएँ धारदार !!बहुत बधाई!

Gaurow Gupta ने कहा…

बेहद खुबसूरत कविता।

HindIndia ने कहा…

बहुत ही बढ़िया article है। .... Thanks for sharing this!! :) :)

Vipin Kaushik ने कहा…

उत्तम

Rasbihari pandey Editor Anushka patrika ने कहा…

वाकई अद्भुत

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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