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बुधवार, 4 जनवरी 2017

मृदुला शुक्ला की कविताएँ

 मृदुला शुक्ला ने पिछले कुछ वर्षों में  हिन्दी कविता की दुनिया में अपनी पुख्ता ज़मीन निर्मित की है. उनकी कविताओं का संसार विस्तृत है. यहाँ एक मध्यवर्गीय स्त्री की प्रश्नाकुल आँखों से देखी गई दुनिया है जिसमें उसके आसपास के समाज के साथ-साथ व्यापक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ है और दोनों के बीच के अंतर्द्वंद्व भी. यहाँ सवालों के निश्चित जवाबों की जगह उन जवाबों की राह की मुश्किल जद्दोजेहद है, किसी विजय के उद्घोष की जगह संघर्ष के घाव और सैद्धांतिक निष्पत्तियों की जगह एक स्त्री की सहज व्यवहारिक दृष्टि. 

उनका एक संकलन "उम्मीदों के पाँव भारी हैं" प्रकाशित हो चुका है और पर्याप्त चर्चित हुआ है. असुविधा पर उनका स्वागत और उम्मीद है कि भविष्य में भी उनका सहयोग मिलता रहेगा.



 


लव-जिहाद
अब जबकि ये दुनिया 
धीरे धीरे तब्दील हो रही है एक बाज़ार में 
बाकायदा मोल भाव करके मिलती हैं भावनाएं 
तो शब्दों की सार्वजनिक सभा में 
आम सहमति से तय किया है किताबों से निकल
वस्तुओं में बदल जाना 

नैतिकता बन गयी है 
डुगडुगी मदारी के हाथ की 
जिसकी डुग-डुग पर नाचेंगे बन्दर 
अल्प विराम के समय हाँ में हाँ मिलायेंगे जम्हूरे 


प्रतिबद्धता शहर से बहुत दूर
निर्जन में चुपचाप खड़े 
खंडित देवालय के बाहर बंधा पीतल का घंटा है 
जिसे चुरा ले जाएगा एक चोर 
पिघला कर उसे अधिकतम तापमान पर 
चोर बाजार में उससे गढ़ी जायेंगी 
महीन नक्काशी की सजावटी मूर्तियाँ 
जिन्हें शहर के बीचो बीच 
सबसे बड़े कला केंद्र में सजाना तय पाया गया है 


प्रेम ने विरोध किया 
गहरा विरोध ,इनकार किया वस्तु बनने से 
नक्कार खानो में तूती की कौन सुनता है भला 
देखिये अब वो अन्धो की हाथ में पड़ गयी गेंद हैं 
वे खेल रहे हैं उससे एक खेल,फेंकते हैं
कभी इस पाले तो कभी उस पाले 
अभी आजकल ही तो ये नया खेल 
लव-ज़िहाद के नाम से बाज़ार में आया है


तुम्हारी ज़बान कैंची की तरह चलती है
कुछ डोरियाँ हैं जो बांधे रखती है
उसके सपनो को
कुछ बारीक से रेशे
उसकी खिलखिलाहट को

बचपन बंधा रहता है नैहर से
यौवन चुनरी
आशाये मांग से
मुस्कुराहट कोख से

पंख हैं तो सही
मगर उड़ाने बाँध दी जाते है
नोच दिए जाने के भय

सुबहें गरम पराठों से
शामें तुलसी चौरों पे जलते दिए से
दुपहरी थोड़ी ढीली सी लपेटी होती
आँगन में सूखते बड़ियों से
मर्तबानो में मुस्कुराते आचारों
जाने क्या है जो बांधे रखता है उसे देहरी से


तुम यह बंधन काटती क्यूँ नहीं?
सुना है तुम्हारी जुबान कैंची की तरह चलती है!

चुप्पी
चुप्पी हमेशा ये नहीं कहती
आपके पास शेष नहीं रहा
कहने के लिए कुछ
या चाहते ही नहीं
अब आप कुछ कहना

दरअसल चुप्पियाँ स्वेच्छा से
ओढा हुआ ताबूत होती हैं

उन कठिन दिनों में
आप टटोल रहे होते हैं
अपने आस पास के लोगों की
ग्राह्यता ,पात्रता
जो धारण कर सकें आपके
भीतर उबलते हुए मौन के आवेग को

खुद को मथते हुए आप पाते हैं
प्रकृति भी जब तोडती है
धरती और आकाश की ग्राह्यता सीमा
असीमित और व्यापक होते हुए
इनकी क्षमताएं,
टूटता मौन हमेशा विप्लव ही दे जाता है

मैं भी अक्सर ,
किसी दलदली जमीन में पड़े कछुवे सी ,
खोल से निकालती हूँ
अपना सिर बाहर
घंटों तक लेती रहती हूँ जायजा,
बाहर, मौसम की पात्रता का

फिर वापस जा लौटती हूँ
ताबूत में अपनी
खद्बदाती चुप्पियों के साथ
और सोचती हूँ ,
ताबूत भी होती है काफी आराम दायक जगह

मुस्कुराहटें

मुस्कुराहटें  होती हैं फूलों से हलकी
शायद सुगंध से भी
हंसी की पोटली से
खुल कर गिरती हैं छन्न से
और परागकणों के साथ
बहती चली जाती हैं हवा में दूर तक

बहुत सूक्ष्म होते हैं इनके के जीवाणु
एक होठ से दूसरे होठ तक
संक्रमित करते है ,अदृश्य रूप से

अजी ये सुनी सुनी सुनाई बातें हैं
बहुत भारी होती है मुस्कान
जीवन के मुश्किल दिनों ने
आप अपनी पूरी ताकत से सम्हाले रखते हैं
चिपकी रही आपके चहरे से

मगर बार बार आ ही जाता है वो लम्हा जब
कमज़ोर हो जाते हैं आपके इरादे
या बेहद भारी हो जाती है आपकी मुस्कान
छूट कर गिर जाती है आपके होठों से

छनाक से गिरती है वो
बिखर जाती हैं टूट कर
उनकी किरचें ,चुभती रहती हैं
बरसों बरस
कभी आँखों में कभी पैरों में


चाँद
नो,
दूर हो तुम
हजारों कोस,

शीतलता हो,
तृप्ति हो
एहसास हो

कामिनी का मुख
विरह में बढ़ाते हो कामना,
मिलन में उत्तेजना

प्रेरणा में हर कवि के
तुलिका में लरजते हो
प्रकृति के अनुपम चितेरों के

धुंधली उदास सी
शामो में उतरते हो
बहनों की छतो पर
तोतले दुधमुहों
को लोरियों में

शोध में विज्ञान में
आज भी तुम
विस्मय हो
रहस्य हो

जानते हो क्यूं?
दूर हो मानव पहुँच से
आज भी अनुपलब्ध हो

एक सलाह दूँमानोगे
दूर से भी यदि कभी
दिखे आदम जात
तो भागना तुम
अगर तुम आ गए
उसकी हद्द में
या फिर
उसकी ज़द में

तो फिर देखना
थूकेगा, मैला फैलाएगा तुम पर
कचरों के निस्तारण की
जगह बनाएगा
छातियों पर
हल चलाएगा

और फिर
खुद से दूर
बहुत दूर ढूँढेगा एक नया चाँद।

पिता
चौतरफा दीवारें थी 
भीतर घुप्प अँधेरा 
एक खिड़की खुली

कुछ हवा आई 
ढेर सारी रौशनी 

तुम चौखट हो गए 
आधे दीवार में धंसे से 
आधे कब्जों में कसे से 

ये जो उजाला है ना
खिडकियों के नाम है 

चौखट तो अब भी 
डटी है दीवारों के सामने 
अंधेरों से लड़ती......

पिता तुम चौखट ही तो रहे हमेशा ..
ये जो तमाम उजाले हैं हमारे हिस्से के 
ये मुझ तक पहुंचे ही हैं 
तुम्हारे कंधो पर सवार होकर


 मेरी कविताएँ
कवितायें मुझे मिलती हैं 
चौराहों पर ,तिराहों पर 
और अक्सर 
दोराहों पर 

संकरी पगडंडियों पर कवितायें 
निकलती हैं 
रगड़ते हुए मेरे कंधे से कन्धा 
और डगमगा देती हैं मेरे पैर 

इक्क्का दुक्का दिख ही जाती है 
तहखानों में अंधेरो को दबोचे 
उजालों से नहाए 
महानगरों की पोश कोलोनियों में 

पिछले दिनों गुजरते हुए गाँव के 
साप्ताहिक बाज़ार में
उसने आकर मुझसे मिलाया अपना हाथ 
और फिर झटके से गुज़र गयी 
मुस्कुराते हुए ,दबा कर अपनी बायीं आँख 

मेरे बेहद अकेले और उदास दिनों में 
वो थाम कर घंटो तक 
बैठती हैं मेरा हाथ 
थपथपाती है मेरा कन्धा 
अपनी आँखों में
सब कुछ ठीक हो जाने की आश्वस्ति लिए

सच तो ये है कि
कविताये मुझे घेर लेती हैं 
पकड़ लेती हैं मेरा गिरेबान 
सटाक ,सटाक पड़ती हैं मेरी पीठ पर 
और छोड़ जाती हैं 
गहरे नीले निशान .....

मेरी पीठ पर पड़े गहरे नीले निशान ही तो हैं मेरी कवितायें


 बडमावस

कामना के धागे कोरे थे
और कच्चे भी
पियरा उठे चुटकी भर हल्दी से
यूं ही नहीं लपेटे गए थे
गिन कर पूरे एक सौ आठ बार

मन्नतों की मौली
कितनी रंगो भरी थी
लटकते हुए बूढ़े बरगद की दाढ़ी में
वर्षों तक
धूप छांव जाते
उसने सौंप दिए थे मौसमों को रंग सारे

मोहल्ले के मुहाने पर वह जो बूढ़ा बरगद है न
अमावस की रात
मन्नतों का मेला लगता है वहां
मौली और कच्चे सूत को तिहरा कर
बांधी गयी गांठों से
बाहर निकल आती हैं मनौतियाँ
बंधे बंधे
दम घुटता है उनका भी

बरगद अचरज भरी आंखों से देखता है
वे एक ही चेहरे-मोहरे, रंग आकार की हैं
अब भला उसे कैसे पता चलेगा
कि कौन सी मन्नत किसकी है....

मन्नतें झांकती हुई एक दूसरे की आंखों में
करती हैं सामुहिक विलाप
अपनी खो गई पहचान के लिए

मगर स्त्रियां हैं
कि अगले वर्ष जेठ की अमावस को
फ़िर बांध आती हैं
अनगिनित अधूरी कामनाओं के धागे.


 तिनके

तिनको की पाठशाला में नहीं सिखाई जाती
भाषा प्रतिरोध की
वे सीखते हैं धारा के साथ बह जाने की कला
उनके बुजुर्ग जानते हैं तिनके
कभी नहीं बनते सहारा किसी
डूबते हुए का

फिर भी वे बरगलाते हैं गढ़ कर
नवजात तिनको को
अविश्वसनीय मुहावरें और कहावते

घाट घाट का पानी पिए ये
लम्बी दाढ़ियों वाले बुजुर्ग तिनके
रुक कर ठिठक कर
बह कर ,अकड़ कर
देखने जानने और
जान बूझ कर अनजान बनने की
तमाम कवायदों के बाद
आज तक नहीं समझा पाये

एक दूसरे का हाथ थाम किसी
सैलाब के सामने बाँध बन कर क्यूँ नहीं देखा
बवंडरों के भंवरो में उलझे
बवंडरों की आँखों में आँख डाल
किरकिरी सा क्यूँ नहीं कसके ....

 मदारी

तुम्हें भ्रम  है की तुम मदारी हो
इसलिए नहीं की तुम्हारे आसपास सब बंदर हैं
बल्कि तुम्हे गढ़नी आती है
खूबसूरत जंजीरे

सच ये है
की मदारी अकेला कुछ नहीं होता
सारा खेल चलता है जम्हूरे के दम पर
जो मिलाता है मदारी की हाँ में हाँ
बिना मशविरा किये बन्दर से

दरअसल दोनों को पता होता है
बंदर के गले में पड़ी जंजीर के बारे में

उड़ो मत
पढो डार्विन को लौट कर विज्ञान की कक्षा में
विकास क्रम में एक दिन
सारे बंदर हो जायेंगे जम्हूरे
और जम्हूरे मदारी
तुम शायद ढूढ़ भी लो कोई नया शिखर
लेकिन !
अगर कुछ यूँ हुआ
की विकास क्रम में
निर्जीव होने लगे सजीव
जिन्दा हो गयीं जंजीरे
तो उन्हें हाथ बदलते देर लगेगी क्या ?


जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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