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सोमवार, 20 मार्च 2017

जितेन्द्र बिसारिया की लम्बी कविता - जोगी

 जितेन्द्र मूलतः कथाकार हैं लेकिन कविताएँ भी लगातार लिखते हैं. लोक और इतिहास का एक सुन्दर और मानीखेज़ समन्वय उनके यहाँ समकालीन आख्यान की शक्ल ले लेता है. इधर नाथ सम्प्रदाय पर बात चली तो मुझे उनकी भेजी यह लम्बी कविता याद आई. आप भी पढ़िए 



जोगी!
आज मत जा
आज उत्तर की हवाओं ने
मुझ से की है कुछ कानाबाती
आज फिर बेला फूले हैं
गुड़हल ने बिछाये हैं कुछ अंगार
सेज आज फिर सूनी है

जोगी!
आज फिर बिछड़ी है
कोई सारस जोड़ी
कि सिवान वाला ताल
भर गया है
उसकी करुण क्रेंकार से
कि मछली फिर छली गई है
एक पद ध्यानस्थ बगुलों से
कि तोड़ा है दम
फिर कहीं
ज़ाल में फंसी हिरनी ने


जोगी!
बहुत डर लगता है
दक्खिनयां हवाओं से
कि मेरे पिछवाड़े वाले महुए पर
उल्लू, खूसटियाँ और
चमगादड़ों की शक्ल में
जैसे बैठे हैं
कोई इब्लीस

जोगी!
पहले जब चैत की चांदनी में
हो रही होती मद की बारिस
लेकर छबलिया मैं
पहुँच जाती थी अकेले ही
फूलों के बहाने
चुनने अपने हिस्से का सुख
कि मेरे बाप का ग्वाला
वहाँ मेरे पीछे होता

जोगी!
प्रेम मदमाते रहने पर भी
उमंग इतनी बाबली होती
कि कर डाले किसी का निरादर
पहुँचाए ख़लल किसी के सुख में
कि महुए के सूखे पत्ते
पाकर मेरे पैरों का परस
तोड़ दें किसी कोयल की नींद
छेड़ दें किसी चंचल चातकी की प्यास
हम बहुत बच-बच कर चलते

जोगी!
लोक-लाज का भय किसे नहीं होता
और कौन बाप चाहता है
कि उसकी धियाएँ
फाहशा कहलाएं?
कि उनकी इज़्ज़त का सुनहला आकाश
बदनामी के धब्बों से हो जाए स्याह
इसलिए उठा दी गईं असमय ही
गाँव से कई डोलियाँ
पार कर गईं कुछ आप ही
गाँव की सरहद
कि कुछ भेज दी गईं दुनिया से गुपचुप
कि चुनने चाहें थे मर्ज़ी से
उन्होंने
ख़ुद ही महुए और कच्चे आम

जोगी!
गाँव तब भी गाँव था
अपनी रौ में बढ़ता
जब उसमें कुछ नया जुड़ता
तो स्वतः ही कुछ पुराना
घट जाता उसकी झोली से
कुछ पैबंद थे उसकी गूंदड़ी में
तो कुछ लाल-जवाहर टँके
कि हट नहीं की थी कभी
किसी शाह किसी कंजर ने
उसे एक रंग में रंगने की

जोगी!
सुना है इस बार
कोई रंगरेज़ राजा बना है
पता नहीं क्या खोट है उसकी नज़र में
या उसकी मकतब ही झूठी है
कि रंगना चाहता है सारा मुल्क़
एक ही रंग में
हाँकना चाहता है एक ही लाठी से
सारा झंग-सियाल, खेड़ा और तख़्त हज़ारा

जोगी!
जब से उसके राज की बयार
बही है गाँव-गाँव
तो जैसे हवा में ज़हर ही घुल गया हो
तेरा त्रिशूल तो कुछ भी नहीं
बहुत पैनी हैं उसकी धारें
कि अब लेकर जिन्हें
घूमते हैं गाँव के कुछ शोहदे
कि उनके रहते कभी टिकी रह सकी
गरीब के कांधे पर आबरूओं की चादर
कि गाँव में जिनके पुरखे
पहले से खोदते आए
भुखमरी के गड्ढे और
ग़ैरबराबरी की अंधी खाईयाँ
अब वही तय कर रहे हैं
मेरे दामन की लंबाई
और घूँघट के माप

जोगी!
अब तक किसी को उज़्र था
कि टिल्ला जोगिया कहाँ हो
और कहाँ पंच पीरों की मज़ार
पर उन्हें नाम से ही नफ़रत है
काबा और कलीसा से
बे नहीं चाहते हो मेल
लाल का बैंजनी से
बैंजनी का हरे से
हरे का सफ़ेद से
और सफ़ेद का स्याह से
...तेरे बगल में जो सींगी
और हाथ में खप्पर है
पता नहीं वे तुझसे
छीन लिए जाएँ कब
क्योंकि तूँ मोमिन है
महादेव का गोती नहीं

जोगी!
काफ़िर हुआ दिल
तो ख़ुदा को कौन माने
मेरा तो इश्क मज़हब था
और जात इश्क़ मेरी
मैंने राँझे को माना था
कि थीं राँझे से यारियां मेरी
पर वक़्त बहुत बुरा आया है
कि क़ाज़ी बिकने लगे
चंद अशर्फियाँ ईमान हुईं
तो हीर पराई हो गई

जोगी!
इन हवाओं में नफ़रत के रंग
हो रहे हैं इतने गहरे
कि कत्लो-गारत ही
मज़हब हुआ जाता है
अम्न तेरे इकतारे में बचा है शायद
मेरे दिल पर तो
ख़ंजर और शमशीर का साया है

जोगी!
डर-डरकर भला
कोई कितना जिए
कितना माने कोई
ज़माने भर की फ़रमाँबरदारियाँ
! आज ठहर मेरी ड्योढ़ी पर
छेड़ अपने इक तारे पर कोई इश्क़ की तान
कि हीर फिर हीर रहे
राँझा हो जाये
राँझा जोगी रहे
हीर हो जाये

जोगी!
देख तिरी कमर में छुपी बंसरी
मैंने बहुत पहले निरख ली थी
बहुत पहले ही महसूस कर लिया था
उन हवाओं को
जिन्होंने तेरे आने से पहले
खाई थीं तेरे आने की चुगलियाँ
मेरे राँझा-जोगी
मेरे जीण जोगिया!!!


                                                                   -जितेन्द्र विसारिया

2 comments:

HindIndia ने कहा…

Very nice poem with awesome depiction!! :)

Surinder ने कहा…

आलोचक नहीं हूँ इसलिए भावों के आधार पर ही प्रशंसा या नापसन्दगी की बात कर सकता हूँ। ये कविता भावपूर्ण और दिल को छूने वाली है। लिखने के लिए साधुवाद।

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