पिशाचों के अट्टहासों के बीच - सुमन केशरी की ताज़ा कविता

कठुआ बलात्कार और हत्या की घटना ने देश की सामूहिक अन्तश्चेतना को गहरे झकझोरा और यह स्वाभाविक है कि इसकी अनूगूँज साहित्य तथा अन्य कला माध्यमों में भी सुनाई देती. हमारे समय की महत्त्वपूर्ण कवयित्री सुमन केशरी की यह कविता क्रूरता से घिरते जा रहे इस समय में हमारे क्रोध और दुःख की जैसे सामूहिक अभिव्यक्ति की तरह सामने आती है...अधूरी ही हो सकती थी यह कविता जब तक इस दुःख का कोई मदावा न तलाश लें हम...


यह कार्टून चित्र प्रसिद्ध कश्मीरी कार्टूनिस्ट सुहैल नक्शबंदी का है जो इस पूरी घटना और इसके राजनैतिक उपयोग की विडम्बना को बखूबी दर्ज़ करता है.  





एक अधूरी कविता...

उसकी आँखें आसमान को समेटे हुए थीं
या खुद आसमान थीं
जिनसे कई कई आकाशगंगाओं का प्रकाश फूट फूट 
उसके होठों पर बिखरती मुस्कान को रोशन किए हुए था
वह मुस्कान जो आश्वस्त करती थी
कि एक दिन अँधेरा जरूर दूर होगा और सुबह की किरणें मुस्काएँगी 
हर घर के आँगन में एक समान
गजब की करुणा से भरी हुई थी वह मुस्कान
जो आठ साल की बच्चियों की मुस्कान से एकदम जुदा थी
उसमें न इतराहट थी
न जिद
न अपने को परी मानने का कोई इल्हाम
केसर से धुली
वह मुस्कान कुछ संकोच के साथ होठों पर खिल रही थी 
होले होले
आँखों में उजास भरती

मैंने उसे तस्वीर बनने के बाद देखा था
किंतु वह लाश बन कर भी 
खूब जीवित थी
अपनी आँखों में चमक लिए
जिसमें उतर कर पता चलता था कि दरिंदों ने उसे लाश बनाने से पहले कितना
भंभोड़ा था
क्या महज इसलिए कि वह दूसरे धर्म की थी
या इसलिए कि आखिरकार वह योनि लिए एक औरत थी
शायद इसलिए कि वह औरत भी थी और दूसरे धर्म की भी
तो इससे वासना भी सधती थी और यह अहसास भी कि
आखिर दुश्मनों की आबरू को धूल में मिलाकर
उन्हें परास्त कर दिया
केवल एक जान लेकर!
क्या हुआ जो वह बच्ची थी
मासूम कली सरीखी
पर थी तो वह दुश्मन ही
आइंदा भी जन्म देती दुश्मनों को ही
संपोले को मसल कर मार देना ही धर्म है! 

ओ री लड़की
तुझे धर्म की वेदी पर
बलि दी गई
बलात्कार के बाद! 
साधना का यह कौन-सा रूप है
पूछती हूँ
उस प्रस्तर की देवी से
जो विराजी हैं
उस स्थल पर
जहाँ तू मारी जाती रही
ओ बच्ची
दिनों दिनों तक
तिल तिल करके!

ओ देवी! 
क्या तुम्हारा हृदय  फट न गया
इस पैशाची हरकत पर
क्या तुम्हारा खून न खौला
इस क्रूर कृत्य पर
कैसी माँ हो तुम?
या फिर  तुम महज एक कल्पना हो
उस आदिम इच्छा की
जो जड़-चेतन सभी पर 
काबू पा लेना चाहती हो
एक रहस्यमय ईश्वरीय सत्ता के सहारे!
वह आदिम वासना
जो दे देना चाहती हो एक डोर
उन्हें 
जिनके मन कमजोर हों
और
जो थामे रखना चाहते हों
आंचल की कोर
जीवन भर
पर आँखें मूंद लेना चाहते हों
हर तरह के पापों से
जो जीना चाहते हो जीवन निर्द्वन्द
कठपुतलियों की तरह
थमाकर अपनी डोर किसी दूसरे को
खुद को पाप और पुण्य से 
अलगाते
खाते और मदमाते…

पर नहीं
तुम तो अपने उन्नत वक्ष को
सीढ़ी की तरह
उनके पाँवों तले 
रख देती हो
जो उन पर चढ़
तुम्हें ही रौंदते
सिंहासन तक जा पहुँचते हैं
तुम्हें पता तक नहीं चलता
कब तुम्हारी नाक टूट जाती है
कब तुम्हारे होठों पर फैली मुस्कान विकृत हो जाती है
कब तुम्हारे कमल थामे हाथ गायब हो जाते हैं
दीख पड़ता है तो बस 
तुम्हारे गर्भगृह में 
आततायियों के वीर्य और पसीने की दुर्गंध से गंधाता
किसी मासूम का खून
और बालों के गुच्छे के गुच्छे

तुम्हारे दीवारों से आती है
पिशाचों के अट्टहासों के बीच
चीखों और कराहों की आवाज
गिड़गिड़ाहटों की मंद पड़ती ध्वनि
और एक चुप्प….
नरमुंडों की माल पहने पिशाच नाचते हैं तुम्हारे गर्भगृह में
और तुम अपनी खंडित देह के
अभयदान देते
अपने हाथ को निहारती बैठी रहती हो
निर्द्वंद
अपनी दैवीयता में मग्न

जानती तो होगी तुम
यह हत्या भी भूमि के एक टुकड़े के लिए ही हुई
किंतु इस बार का कुरुक्षेत्र
किसी जमीन के टुकड़े का नाम नहीं 
बल्कि 
एक नवारुण देह का नाम है
याद रहे 
इस युद्ध में तो 
किसी भी नियम पालन नहीं किया गया
छोड़ छल और कपट के

आती है आवाज
द्यूत में जीत रहे दुर्योधनों
के अट्टहासों की
और फिर
द्रौपदी के बिलखने की
छल कभी नहीं जीतता
चीख चीख कर कह रही है द्रौपदी
अपने खींचे जा रहे वस्त्र
में लड़की की नुची देह को
ढंकती
उसे कफ़न सा उढ़ाती  द्रौपदी 

भयंकर दृश्य है
देवी तुमने देखा
या तुम भी डूब गई हो
उन औरतों के आंसुओं
के सैलाब में
पत्थर की हो 
तो क्या हुआ
हो तो औरत ही
और तुम भी तो नुची होगी
शृंगार की आड़ में… 

तुम्हें डूबना ही होगा
त्याज्य मूर्ति हो तुम
पाप स्थल पर स्थापित
अब तुम्हें कोई नहीं पूजेगा
कोई नहीं पूजेगा
कभी तुम्हें
भले ही गूंजती रहे मंत्रों की ध्वनि
तुम्हारे कानों में
या देवि सर्वभूतेषु…

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सुमन केशरी समकालीन कविता में एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति हैं. "याज्ञवलक्य से बहस", "मोनालिसा की आँखें" और "शब्द और सपने "के बाद हम उनके अगले कविता संकलन "पिरामिडों के साए  में"की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहे हैं. सुमन जी की कुछ और कविताएँ असुविधा पर यहाँ पढ़ी जा सकती हैं. 

टिप्पणियाँ

अरुण चवाई ने कहा…
लोमहर्षक! एक किनारों से बद्ध,क्षुब्ध झील की तड़प जो एक आवेग के साथ संप्रेषित हो जाती है।
अरुण चवाई ने कहा…
लोमहर्षक!अपने ही किनारों से बद्ध, क्षुब्ध झील की क्रुद्ध तरंगों के थपेड़े मारती सी काव्य रचना।
Suman ने कहा…
अभी अभी मैंने अपनी कविता" एक अधूरी कविता" का अंग्रेजी अनुवाद Inconvinience blog पर पढ़ा। अनुवाद जिसने भी किया है, उसका धन्यवाद। बस एक बात कहनी है कि अनुवाद में स्त्रीलिंग की जगह पुल्लिंग हो गया है माने, शी की जगह ही। साथ ही अंतिम वाक्य या देवि सर्वभूतेषु भी कुछ अजी सा ही छप गया है। कृपया देखें और उचित सुधार करें।

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