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रविवार, 2 दिसंबर 2012

पंजाबी कवि गुरप्रीत की कुछ कविताएँ




  • असुविधा पर आप भाई जगजीत सिद्धू के मार्फ़त  पहले भी कुछ पंजाबी कवियों को पढ़ चुके हैं, इस बार पढ़िए वरिष्ठ कवि गुरप्रीत की कुछ कवितायें












    • गुरप्रीत पंजाब के एक ऐसे कवि है जिनकी कवितायों के विषय भी उनकी भाषा की तरह सरल और जिन्दगी से जुड़े होते है .उनकी अब तक तीन किताबे प्रकाशित हो चुकी हैं 'शब्दों की मर्ज़ी ", "अकारण " " सियाही घुली है ". बहुत गहरे अर्थ छोडती हुई गुरप्रीत की कवितायों में एक आम आदमी की रोजमर्रा जिन्दगी की बाते बहुत ही सरल और सादे ढंग से व्यक्त हैं ... जैसे कविता " बिका हुआ मकान और वह चिड़िया " कवि के बिके हुए मकान को खाली करते वक़्त उसकी और उसके घरवालो की मन की स्थिति को व्यक्त करती है                                                  

       जगजीत सिद्धू 



    गुरप्रीत की कविताएं




    पत्थर 



    एक दिन
    पूछता हूँ
    नदी किनारे पड़े पत्थर से
    बनना चाहोगे
    किसी कलाकार के हाथों
    एक कलाकृत
    फिर रखा जाएगा तुझे
    किसी आर्ट गैलरी में
    दूर दूर से आयेगे लोग
    तुझे देखने
    लिखे जाएँगे
    तेरे रंग रूप आकार पर लाखों लेख
    पत्थर हिलता है
    ना ना
    मुझे पत्थर ही रहने दो
    हिलता पत्थर
    इतना कोमल
    इतना तो मैंने कभी
    फूल भी नहीं देखा .


    ग़ालिब की हवेली

    मैं और मित्र कासिम गली में
    ग़ालिब की हवेली के सामने
    हवेली बंद थी
    शायद चौंकीदार का
    मन नहीं होगा
    हवेली को खोलने का
    चौंकीदार, मन और ग़ालिब मिल कर
    ऐसा कुछ सहज ही कर सकते हैं
    हवेली के साथ वाले चौबारे से
    उतरा एक आदमी और बोला
    "हवेली को उस जीने से देख लो "
    उसने सीढ़ी की तरफ इशारा किया
    जिस से वो उतर कर आया था
    ग़ालिब की हवेली को देखने के लिए
    सीढ़ीयों पर चढ़ना कितना जरूरी है
    पूरे नौ बर्ष रहे ग़ालिब साहब यहाँ
    और पूरे नौ महीने वो अपनी माँ की कोख में
    बहुत से लोग इस हवेली को
    देखने आते हैं
    थोड़े दिन पहले एक अफ्रीकन आया
    सीधा अफ्रीका से
    केवल ग़ालिब की हवेली देखने
    देखते देखते रोने लगा
    कितना समय रोता रहा
    और जाते समय
    इस हवेली की मिट्टी अपने साथ ले गया
    चुबारे से उतरकर आया आदमी
    बता रहा था ,एक साँस में सब कुछ
    मैं देख रहा था उस अफ्रीकन के पैर
    उसके आंसुओ के शीशे में से, स्वय को
    कहाँ कहाँ जाते हैं पैर
    उस सभी जगह जाना चाहते हैं पैर
    जहा जहा जाना चाहते हैं आंसू
    मुझे आँख से टपका हर आंसू
    ग़ालिब की हवेली लगता है .

    पिता


    अपने आप को बेच
    शाम को वापिस घर आता
    पिता
    होता सालम- साबुत
    हम सभी के बीच बैठा
    शहर की कितनी ही इमारतों में
    ईंट ईंट हो कर , चिने जाने के बावजूद
    अजीब है
    पिता के स्वभाव का दरिया
    कई बार उछल जाता है
    छोटे से कंकर से भी
    और कई बार बहता रहता है
    शांत अडोल
    तूफानी मौसम में भी
    हमारे लिए बहुत कुछ होता है
    पिता की जेब में
    हरी पत्तियों जैसा
    सासों की तरह
    घर आज-कल
    और भी बहुत कुछ लगता है
    पिता को
    पिता तो पिता है
    कोई अदाकार नहीं
    हमारे सामने जाहिर हो ही जाती है
    यह बात
    कि बाज़ार में
    घटती जा रही है
    उनकी कीमत
    पिता को चिंता
    माँ के सपनों की
    हमारी चाहतों की
    और हमें चिंता है
    पिता की
    दिन ब दिन कम होती
    कीमत की ...

    बिका हुआ मकान और वह चिड़िया 


    अपने बिके हुए मकान में ,
    बस आख़री पहर और रुकना है
    यह क्यों बिका ,
    कैसे बिका ,
    सब को सब कुछ बताना है
    पत्नी ,बहन ,छोटा भाई
    बांध रहे है सामान सारा
    और इसी तरह
    माँ मेरी बांध रही है ,
    हमारे साथ अपने आप को भी
    साहस की गठरी में
    पिता बहुत ही ध्यान से
    उठवा रहे है सारा सामान
    एक के बाद दूसरी चीज़
    अपनी पूरी समझ के साथ
    अपने साथ वह
    हमारे दिल को भी ,
    टूटने से बचा रहे हैं 
    छोड़ देता हु मैं
    पहले से तैयार दलीलों की दीवार पीछे
    माँ की आँखे भरी हुई
    पिता का मन डगमगाता हुआ
    पत्नी की झूठी मुस्कराहट
    बेटे का सहमा चेहरा
    मैं अपने साथ
    सब को दिलासा देता हूँ
    पता नहीं किस शक्ति से ...
    दीवार , दरवाज़े , खिड़कियाँ भी धडकती है
    जाना पहली बार ,
    बिक़े हुए मकान को अलविदा कहते
    याद आई वह चिड़िया ,
    जिस के बारे में,
    रोज सुनाता था अपने सुखन* को
    कितनी कहानियाँ |                                                           (सुखन -- बेटे का नाम )
    पहली बार रह रहे है
    किराए के मकान में
    अजनबी अजनबी सा सब कुछ
    बदल रहे है अपने आप में ,
    सहज होने के लिए करते है
    कुछ और दिनों का इंतज़ार
    माता पिता संकट निवारण के लिए
    सोचते है ,
    किसी तीर्थ स्थान पर जाने को ,
    मैं कविता के द्वार की सीढियों पर ,
    नमस्तक होता हूँ
    सामने चहचहा रही
    होती है ,
    वह चिड़िया...
    कामरेड 


    सबसे प्यारा शब्द कामरेड है
    कभी कभार
    कहता हूँ अपने आप को
    कामरेड
    मेरे भीतर जागता है
    एक छोटा सा कार्ल मार्क्स
    इस संसार को बदलना चाहता
    जेनी के लिए प्यार कविताएँ लिखता
    आखिर के दिनों में बेचना पड़ा
    जेनी को अपना बिस्तर तक
    फिर भी उसे धरती पर सोना
    किसी गलीचे से कम नहीं लगा
    लो ! मैं कहता हूँ
    अपने आप को कामरेड
    लांघता हूँ अपने आप को
    लिखता हूँ एक ओर कविता
    जेनी को आदर देने के लिए...
    कविता दर कविता
    सफर में हूँ मैं ...
    ----------------------------------------------
    लेखा
    -------
    मैंने सब का ,
    कुछ न कुछ देना है
    देना यह मुझसे ,
    कैसे भी दिया नहीं जाएगा
    मेरे आते जाते सांस ,
    घूमती धरती के साथ घूमते हैं ,
    चमकते सूरज के साथ चमकते हैं
    मेरे पास , तुम्हारे पास भाषा है
    मैं धन्यवाद कह कर मुक्त हो सकता हूँ
    नदी , पहाड़ ,जंगल ,मैदान , पंछियो के लिए
    मैं कौन सा ढंग चुनू.......

    आदिकाल से लिखी जाती है कविता 


    बहुत पहले किसी युग में लगवाया था
    मेरे दादा ने अपनी पसंद का एक खूबसूरत दरवाज़ा
    फिर किसी युग में उसे उखाड़ फेंका मेरे पिता ने
    और लगवाया अपनी पसंद का बिलकुल नायाब दरवाज़ा
    घर के मुख्य द्वार पर लगा अब यह
    मुझे भी पसंद नहीं ...

    दोस्त 

    कौन कौन दोस्त हैं मेरे
    मैं किसका दोस्त हूँ ...
    दोस्ती
    जोड़ ,घटाव , गुना , तकसीम
    क्या यह है दोस्ती
    मैंने किस किस के लिए
    क्या क्या बचाया
    क्यों बचाया ...
    दोस्त शब्द थक गया है
    दोस्ती से बाहर कही
    किसी पेड के नीचे
    सुस्ताना चाहता है
    नदी में अपने पाँव डाल
    झूठ को पानी में बहा देना चाहता है |
    दोस्त शब्द
    अपने अर्थो के लिए
    भाई काहन सिंह नाभा* के साथ
    गोष्टी रचा रहा है |
    (*भाई काहन सिंह नाभा -- महान पंजाबी विद्वान् )



    जगजीत सिद्धू ने पंजाबी की अनेक महत्वपूर्ण कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया है। उनसे jagjit.sidhu.37@facebook.com  पर संपर्क किया जा सकता है।

10 comments:

रत्नेश सिंह ने कहा…

शानदार कवितायें और अनुवाद भी बढ़िया

Suresh Hans ने कहा…

गुरप्रीत ...बेहद खूबसूरत कविताओं के लिए बधाई ! आभार जगजीत जी !

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सुंदर कवि‍ताएं पढ़वाने के लि‍ए आभार

नन्द भारद्वाज ने कहा…

बहुत सहज और असरदार कविताएं लिखते हैं गुरप्रीत। जीवन के सामान्‍य कार्य-व्‍यापार में कितने गहरे अर्थ छिपे हैं, रिश्‍तों में कितना अपनापन और कॉमरेड जैसी संज्ञा के लिए कितनी गहरी आत्‍मीयता। इन अच्‍छी कविताओं को पढ़कर कविता के प्रति विश्‍वास और पुख्‍ता होता है।

vandana gupta ने कहा…

सभी कवितायें शानदार हैं मनोभाव बखूबी उभर कर आये हैं जो दिल को छूते हैं।

' मिसिर' ने कहा…

गुरप्रीत की सरल,सहज कविताओं का असर सीधे ह्रदय पर होता है शायद इसलिए कि वे सीधे ह्रदय से निकलती हैं ! प्रस्तुति के लिए आभार !

प्रदीप कांत ने कहा…

ये कविताएँ वे कविताएँ है जो जीवन को देखती तो कवि के अपने नज़रिये से है किंतु सब ही को बेहद अपनी सी लगती हैं। और यही किसी कविता की सार्थकता है।

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रजनीश 'साहिल ने कहा…

सचमुच बहुत सहज और संवेदनात्मक।

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