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सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कुछ नई कविताएँ

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संतोष कुमार चतुर्वेदी उस परम्परा के कवि हैं जहाँ लोक और जन दो अलग अलग श्रेणी नहीं अपितु एकमेक होकर सामने आते हैं. उन्हें पढ़ते हुए क़स्बाई संवेदना का ग्लोबल विस्तार लगातार महसूस होता है और इसीलिए भाषा उनके यहाँ अलग से कुछ करने की कोशिश करने की जगह बहुत स्वाभाविक रूप से तमाम उपलब्ध स्रोतों से जीवन रस लेते हुए कथ्य को उसके बहुविमीय विस्तार में रूपायित करती है. असुविधा पर पढ़िए इस बार उनकी कुछ ताज़ा कविताएँ 



पृथिवी एक अनिवार्यता की तरह है
सूर्य ही समूचा सच नहीं इस सच के सहयात्री और भी हैं
अकेले नहीं बनता कोई मण्डल सौर मण्डल की बात ही क्या
घूमती है पृथिवी सूर्य के चारो तरफ़ निरन्तर इस पृथिवी पर खड़ा कवि सूर्य रश्मियों को एकटक ताकता है सतरंगी आभा में डूब कर
सौर मण्डल को जानने के लिए पृथिवी एक अनिवार्यता की तरह है धधकते सूर्य से ही नहीं पृथिवी की सौम्यता से भी इसकी एक अलग तस्वीर बनती है
प्रेम
जो बात तुम्हारे लिए राज है उसे दुनिया की तमाम स्त्रियाँ खुलेआम जानती हैं कि हर तरह के पानी से नहीं गलती दाल
पानी का तनिक भी खारापन सारे ताप को बेकार कर देता है
वह तो मिठास भरे पानी का प्रेम है जिसमें डूब कर <