इन दिनों बेहद मुश्किल में है मेरा देश
दरवाज़े की कोई भी खटखट हो सकती है उनकी
ज़रूरी नही कि रात के अंधेरों ही में हो उनकी आमद
किसी भी वक़्त हमारी ज़िंदगी में
उथल-पुथल मचा सकती है उन बूटों की आवाज़
इन दिनों संविधान की तमाम धारायें संवेदनशील हैं
कविताओं के बाहर बोलने पर
मंदिरों की तरह है देश की सुरक्षा इन दिनों
ज़रूरी नहीं कि हथियार हों आपके हाथों में
उनकी बन्दूक़ों के सामने अप्रस्तुत होना पर्याप्त है
पर्याप्त हैं अख़बार की कुछ कतरनें
फुटपाथ से ख़रीदीं कुछ किताबें
लिख दिया गया कोई सपना- गा दिया गया कोई गीत
पूछा गया एक असहज प्रश्न
यहां तक कि किसी दोस्त की लाश पर गिरा एक आंसू भी
इन दिनों बेहद मुश्किल में है मेरा देश
जितना अभी है कभी ज़रूरी नहीं था विकास
जितने अभी हैं कभी उतने भयावह नहीं थे जंगल
जितने अभी हैं कभी इतने दुर्गम नहीं थे पहाड़
कभी इतना ज़रूरी नहीं था गिरिजनों का कायाकल्प
इन दिनों देशभक्ति का अर्थ चुप्पी है और सेल्समैनी मुस्कराहट
कुछ भी असंगत नहीं चाहते वे इस आपातकाल में!
श्रेणी कविता
उम्र से अधिक दिखना औक़ात से अधिक दिखना होता है क्या?
6 टिप्पणियाँ प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय पर 2/06/2010 09:47:00 PM(गीत चतुर्वेदी अपनी पीढ़ी के मेरे सबसे प्रिय कवियों में है। उसकी कवितायें बोलती हैं और वह अक्सर चुप रहता है। खोजने वाले उस पर तमाम लोगों का असर खोज सकते हैं पर मुझे उसमें एक ऐसी विशिष्ट मौलिकता दिखती है जिसके सहारे कोई उसकी कवितायें बिना नाम के भी पहचान सकता है। अभी राजकमल से उसका संकलन आया है आलाप में गिरह…कीमत है २०० रुपये। यहां कवर पेज़ और संकलन से तीन कवितायें)
(1) ’ मालिक को ख़ुश करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाला मानवीय दिमाग़ और अपनी नस्ल का शुरुआती जूता ’
राजकुमारी महल के बाग़ में विचर रही थीं कि एक कांटे ने उनके पैरों के साथ गुस्ताख़ी की और बजाय उसे दंडित करने के राजकुमारी बहुत रोईं और बहुत छटपटाईं और बड़े जतन से उन्हें पालने वाले राजा पिता तड़पकर रह गए और महल के गलियारों और बार्जों में खड़े हो धीरे-धीरे बड़ी हो रही राजकुमारी के पैरों से किसी तरह कांटा निकलवाया और हुक्मनामा जारी करवाया कि राज्य में कांटों की गुस्ताख़ी हद से ज़्यादा हो गई है और उन्हें समाप्त करने की मुहिम शुरू कर दी जाए पर योजनाओं के असफल रहने और मुहिमों के बांझ रह जाने की शुरुआत के रूप में ढाक बचा और ढाक के तीन पात बचे तो राजा ने आदेश दिया कि सारे राज्य की सड़कों और महल के पूरे हिस्से की ज़मीन पर फूलों की चादर बिछा दी जाए पर चूंकि फूल बहुत जल्दी मुरझा जाते हैं सो यह संभव न हुआ तो राजा ने अपने एक भरोसमंद मंत्री को इसका इलाज निकालने की जिम्मेवारी दी तो उस मंत्री ने बजाय सारी ज़मीन पर फूल बिछाने के राजकुमारी के पैरों पर ध्यान जमाया और नर्म कपड़े की कई तहों को चिपकाकर मोटी.सी कोई चीज़ बनाई और राजकुमारी को पहना दी जिसके पार कांटा क्याए कांटे का बाप भी नहीं पहुंच सकता था और इस तरह एक आदिम जूते का निर्माण हुआ हालांकि जूतेनुमा एक चीज़ बनाने वाले उसे मंत्री कि़स्म के मानव ने राजकुमारी कि़स्म की किसी महिला के पैरों को कांटों से बचाने के लिए इलाज ढूंढ़ने से पहले ख़ुद भी कई बार कांटों को भुगता था और दूसरे तमाम लोगों के भी कांटा चुभते देखा था पर नौकर की जमात का वह व्यक्ति मात्र स्वामिभक्ति के पारितोषिक के लिए ही जूता बना पाया
(१९९८)
(३) ’ मुंबई नगरिया में मेरा ख़ानदान ’
पिता पचपन के हैं पैंसठ से ज़्यादा लगते हैं
पच्चीस का भाई पैंतीस से कम का
क्या इक्कीस का मैं तीस-बत्तीस का दिखता हूं
मां-भाभी भी बुढ़ौती की देहरी पर खड़े
बिल्कुल छोटी भतीजी है ढाई साल की
लोग पूछते हैं पांच की हो गई होगी
पता नहीं क्या है परिवार की आनुवंशिकता
जीन्स डब्ल्यूबीसी हीमोग्लोबीन हार्मोन्स ऊतक फूतक सूतक
क्या कम है क्या ज़्यादा
धूप में रखते हैं बदन का पसीना
या पहले-चौथे ग्रह में बैठे वृद्ध ग्रह का कमाल
चिकने चेहरों से भरी इस मुंबई नगरिया मेंमेरा ख़ानदान कितना संघर्षशील है सो असुंदर है
अभी कल ही तो भुजंग मेश्राम पूछकर गया था
उम्र से अधिक दिखना औक़ात से अधिक दिखना होता है क्या?अभी कल ही तो पूछ कर गया था भुजंग मेश्राम
माईला… ये पचास साल का लोकतंत्र
उन लोगों को कायको पांच हज़ार का है लगता?
(१९९८)
’(३) तस्वीर में आमिर ख़ान के साथ मेरा एक रिश्तेदार ’
बहुत ख़ुश लगा पड़ा था और यहां-वहां देखते थोड़ा गर्व भी
अग़ल-बग़ल बैठे थे जो थोड़ा-थोड़ा कनखियों से झांक लेते तोसामने वाला पूरा का पूरा झुक पड़ा था और वह भी छिपाने का छद्मप्रयास कर रहा था
जभी मैंने पूछा उस आदमी ने एक बार भी ना नहीं किया
तुम बता रहे हो जितनी आसानी से वह आ गया था तुम्हारे पास
वह पूरा मुंह खोलकर बोला हां
और जितनी बातें वह बता चुका था फिर-फिर बताने लगा
कैसा लगा तुम्हें उस वक़्त
क्या तुम्हारे लिए घड़ी बंद हो गई थी
उसने बताया मैंने उसे बहुत नज़दीक से देखा
और अनमनी नींद के सपने की तरह छुआ
उसकी हथेलियों से पसीना रिसता है
हमेशा मुस्कुराता है और ऑटोग्राफ़ बुक्स का सम्मान करता है
मेरे रिश्तेदार के कंधे पर हाथ रखे आमिर ख़ान शांत था
मेरे रिश्तेदार की ख़ुशी चार बाई छह के फोटो से छलक रही थी
वहां एक फ़ोटोग्राफ़र था जो तुरंत फ़ोटो निकालकर दे रहा था
मुझसे पहले कइयों ने खिंचवाया था
मुझसे मिलते समय वह बिल्कुल घर का लगा
वह ईसा नहीं था पर उसके भीतर एक ईसा था
सही है जब भी जाऊंगा उसके पास वह नहीं पहचानेगा मुझे
कुत्ते उसके दरवाज़े पर हुल्लड़ करेंगे
यह तस्वीर दिखाने के बावजूद मुझे घर में नहीं घुसने देंगे
पर यही क्या कम है कि उसने तस्वीर खिंचवाई मेरे साथ
मेरा वह रिश्तेदार अपना स्टेशन आने के बाद लोकल से उतर गया
तो जाते-जाते अपनी प्रसन्नता फिर बांच गया वह
तस्वीर के साथ क़ीमती ख़ुशियां लाया है
जिनकी छांह में चांदी की पट्टी पर नाचेगा
लोकल के धक्कों में लय ढूंढ़ेगा
कुछ दिनों तक सिर्फ़ एक पल में जिएगा
(१९९८)
***पुस्तक मेले से लाई तमाम नयी-पुरानी कविता की किताबों के परिचय की यह सीरीज आगे भी चलेगी। अगली प्रस्तुति मोहन डहेरिया के कविता संकलन 'न लौटे फिर कोई इस तरह'
(मदन मोहन दानिश इस दौर के बेहद ज़रूरी शायर हैं। उनसे और अतुल अजनबी से हम शहर वालों को ढेरों उम्मीदे हैं और दोनों ही अब तक इस पर खरे उतारे हैं। पिछली बार कुमार विनोद साहब की गज़लें पेश करने के बाद तय किया की इनका भी आपसे परिचय कराया जाय...हालांकि ये परिचय के मुहताज नहीं। ये ग़ज़लें उनके संकलन 'अगर ' से )
(एक )
आप चलते अगर सलीक़े से
तय न होता सफ़र सलीक़े सेबाख़बर हमपे रश्क करने लगे
यूं रहे बेख़बर सलीके सेआबरू रह गयी फ़साने की
कर दिया मुख़्तसर सलीक़े सेबांध लेता है वो नज़र अक्सर
उसपे रखिये नज़र सलीक़े सेदिल न टूटे ग़रीब का दानिश
दीजियेगा ख़बर सलीक़े से*-------------*--------------*----------------*----------------------*-------------------------*
(दो )इश्क़ की मंज़िल को पाने के लिये
प्यार को कुछ कर गुज़रना चाहियेमानता है कौन अब ये मश्वरा
वक़्त से हर वक़्त डरना चाहियेशेर कहने के लिये दानिश मियां
रोज़ जीना, रोज़ मरना चाहिये*-------------*--------------*----------------*----------------------*-------------------------*
और मेरा एक प्रिय शेर
मुहब्बत, रतजगे , आवारागर्दी
ज़रूरी काम सारे हो रहे हैं!
श्रेणी ग़ज़ल, मदन मोहन दानिश
सिलसिला शुरू तो खैर दया से ही हुआ था
उस उदास सी सुबह
जब पहली बार झिझकते कदमो से आयी वह
नम आंखे गड़ाये जमीन पर
और सूनी उंगलियों में फंसी
दुख सी नीली कलम खोलते-खोलते फूट ही पडी आखिरकार
तो जैसे उसका दुख कोलतार सा पसर गया सबके भीतर
कुछ पल के लिए ढीले हो गये नियमों के बंधन
कुछ पल के लिये ठहर गये कागज़ के टट्टू
कुछ पल के लिये हुई आत्माओं में हरकत
हमारे साथ की कुर्सी पर बैठी वह
सहकर्मी बनने से पहले कई दिनों तक रही
हमारे दिवंगत सहकर्मी की हतभागी विधवा
सच मानिये
हम तो बदलना भी नहीं चाहते थे
उसकी मांग की सफ़ेदी सी स्थायी थी हमारी सहानूभूति
लेकिन जो हुआ उसके बाद
क्या करते आप जो होते हमारी जगह?
अभी महीना भी नहीं बीता था पूरा
कि आंखे खिल गईं ओस से धुली जाड़े की सुबहों सी
हम चिताभष्म से सिक्के ढ़ूंढ़ने वाले कंगलों की तरह
ढ़ूंढ़ते रहे उनमे अश्रु और आत्मदया की कतरने
पर वहां धूप से टुकड़े थे आत्मविश्वास के
और उस दिन तो मानो बिज़ली गिरी हमपर
जब किसी चुटकुले पर हंस पड़ी वह ठठाकर
और धुल गया चेहरे से उदासी का आखि़री धब्बा
वैसे गनीमत थी अब भी
और जिंदा था हमारा विश्वास
कि चलो अब हंसी वसी तो कोई कहां तक रोके
पर कम तो नहीं होते आत्मा के साथ शरीर लिपटे शोक चिह्न
उसकी सूनी कलाईयों और एकरंगी साड़ियों से पसीज जाते हम भीतर तक
अपनी पत्नियों को चूमते हुए रात के अंधेरों में
बुदबुदाते मन नही मन ‘ ईश्वर इसे मत दिखाना कभी ऐसे दिन’
अक्सर ख़ुद ही भर देते उनकी मांगो में सिन्दूर
पायल और बिछुए बदलवा दिये वक़्त से पहले ही
बस सोच ही रहे थे अगले बोनस से नई कांजीवरम के बारे में
कि उस दिन दशहरे की छुट्टियों के ठीक बाद
विश्वास ही नहीं हुआ अपनी आंखों पर
...जैसे मांग का सिन्दूर उतर आया हो साड़ी की किनारी पर
और आंसू सज गये हों मध्यमा पर मोती की शक्ल में
चप्पलों पर उग आई थी हील
बाल विजय पताका से लहरा रहे थे कंधो पर
बेतरतीबी कतर दी गई थी भौहों से
और चिबुक के तिल की अनुकृति उभर आई थी उनके बीचोबीच
ठीक उसी पल लगा हमें
कुछ ज़्यादा ही बतियाती है वह दफ़्तर के इकलौते कुंआरे क्लर्क से
ठीक उसी पल दिखा हमें उसकी आंखों में आमंत्रण
ठीक उसी पल खाली-खाली लगी उसकी मेज़
ठीक उसी पल घड़ी पर गयी हमारी निगाह
मत पूछिये कैसी यंत्रणा थी उस एक पल में
ढह गया हमारी आस्था का अंतिम अवलम्ब
और हम रह गये किंकर्तव्यविमूढ़ - अवसन्न
बोनस के पैसे पड़े रहे बैंको में
और झल्लाये पत्लियों पर यूंही
मन किया ढ़ूंढ़ निकाले किसी पुराने बक्से में पड़ी उनकी डिग्रियां
और चिंदी-चिंदी कर उड़ा दें हवा में
बदल दें हर जगह नामांकन
और कहें
दिखाओ तो एक बार कैसे रहोगी जब नहीं रहेंगे हम
मत पूछिये क्या-क्या किया हमने
उसकी सूनी मेज़ पर टिका दिये सारे टट्टू
उसकी क़लम सुनहरा चाबुक हो गयी
जकड़ दिया उसको नियमो की रज्जु से
वह अल्हड़ पुरवा हो गयी
उसके पांवो से बांध दी घड़ी की सुईयां
वह पहाड़ी नदी हो गयी
और क्या करते अब इससे ज्यादा?
और वह है
कि बदलती ही जा रही है दिन ब दिन
बात-बात पर आने लगी है मुस्कुराहट
लाख कोशिशों के बावज़ूद नहीं रोती अब फूट-फूटकर
बस उदासी की एक बदली आकर चली जाती है
बतिया लेती है अब किसी से भी बेधड़क
भाई साहब नहीं सर कहने लगी है अब
दो पहियों पर भागती है आज़ादी से
मजे से खाती है समोसे कैंण्टीन में
कई बार सुना है गुनगुनाते अकेले में
हद है चिढ़ सी जाती है कम्बख़्त
शादी के नाम पर ही!
जिनके बदले लिखा जा सकता है सिर्फ़ एक शब्द – समझौता
23 टिप्पणियाँ प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय पर 1/05/2010 07:25:00 PMयहां दर्ज़ करना है अपना नाम
वे डिग्रियां जिन्हें पलट कर भी नहीं देखा वर्षों से
विस्तार से देनी है जानकारी उस दफ़्तर की
जिसमें घुसते ही
पता लिखना है उस घर का
जिसके लिये गिरवी पड़े हैं
मेरी ज़िन्दगी के बीस साल
यहां दर्ज़ करनी है एक जाति
जिसके दांतों पर लहू है हज़ार बरस पुराना
एक धर्म – जिसे वर्षों पहले कर चुका जीवन से बहिष्कृत
लिखना है एक देश का नाम
जो कभी हो ही नहीं सका मेरा
यहां दर्ज़ करनी हैं तमाम ऐसी कार्यवाहियां
जिनके बदले लिखा जा सकता है
सिर्फ़ एक शब्द – समझौता!
एक तस्वीर चिपकानी है
सबसे अस्वाभाविक मुद्रा में
एक तिथि लिखनी है उस घटना की
जिसके लिये कतई ज़िम्मेदार नहीं मैं
कितना कठिन है
इन सबके बाद
कविता लिखने वाले हाथों से
एक अजनबी भाषा में
दर्ज़ करना अपना हस्ताक्षर
जवाब दो फरीदा… उस भयावह भूल का हिसाब दो!
21 टिप्पणियाँ प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय पर 12/18/2009 05:51:00 AM

बदल गये हैं उनके शब्दकोषों में
(दो)
श्रेणी 2007, कविता, गुजरात, नरेन्द्र मोदी, फरीदा
देस समूचा आज सेठों के हाथ में है...
जो बचा है वो जेब में है काँख में है
संस्कृति संगठन पर शोहदों का जाल है
वे कुछ करते नहीं...देश का यही हाल है...
गुनी मर रहै है और पट्ठे खुशहाल है।
कीर्ति चाहिए तो कुकूर बनिए
भूकिए कम कम-कम तनिए
सुनिए गुनिए बहुत न धुनिए
बनिए मुन्ना या प्यारी मुनिए
सुनिए जो कहा जाए वही बस
कहिए जो सहा जाए वही बस
लिखिए जो लगे सुंदर सुहाए
छाती पिराए पर न निकले हाय।
राउर को बाउर समझने की न चूक करो
मरो दरवज्जे पर लेकिन न हूक भरो
करो वही जिससे मन उनका हरसे
उनके मन में सदा सर्वदा सावन भादौं बरसे
मन का मोर नाचे-पंख-पूछ पसार
तुम्हारा आँगन बने उनका मुतवार।
ससुरे तेरा तो सब कुछ है मंगनी का
बन बाग और खेत बगीचा
सब है उनके लान से नीचा...
आँखे कर नीचा...जा..जा हट जा
जो मिला है उसी में खुश रह खा...
जब कहें तो दाँत चियार चोरकट
चुप्पा बन न बन तू मुँहफट
चल हट....और नगर को सरपट
बचना है तो न किसी मोर्चे पर डट
सट उनके चरण में निहुर झटपट।
बात अटपट लगे तो भी न बोल
सुग्गा बन समझ पिंजरे का मोल
साध मन को शांत रहने की कला में
लड़ना क्यों इस जग की चली-चला में
बस उनकी बानी बोल...
बस मधुरी बानी बोल
बस सुघरी बानी बोल
बस मोहक बानी बोल
बस अंतर-अंतर बोल।।
मै कलमा पढ़कर सुरैया नही बनना चाहती
24 टिप्पणियाँ प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय पर 11/29/2009 09:55:00 AM(कोई तीन साल पहले यह कविता कथन में छपी थी। आज इसे संकलन तैयार करते हुए दुबारा पढा तो लगा आप सब से शेयर करना चाहिए)
रोज़ की तरह था वह दिन
और दफ़्तर भी चेहरों के अलावा
कुछ नहीं बदला था जहां
वर्षों से थके हुये पंखे
बिखेर रहे थे ऊब और उदासी
फाईलें काई की बदरंग परतों की तरह बिखरीं थीं बेतरतीब
अपनी अपार निष्क्रियता में सक्रिय आत्माओं का सामूहिक वधस्थल।
रोज़ की तरह घड़ी की सुईयों के एक खास संयोग पर
वर्षों के अभ्यस्त पांव
ठीक सताइस सीढ़ियों और छियालिस क़दमो के बाद
पहुंचे अब्दुल की दुकान पर
चाय पीना भी आदत थी हमारी ऊब की तरह!
रोज़ की तरह करना था उसे नमस्कार
रोज़ की तरह लगभग मुस्कुराते हुये कहना था हमें- पांच कट
फिर जुट जाना था कुर्सियों और अख़बार के जुगाड़ में
रोज़ की तरह जताना था अफ़सोस बढ़ती क़ीमतों पर
दुखी होना था बच्चों की पढाई से बीबी की बीमारी
और दफ़्तर की परेशानियों से देश की राजनीति तक पर
तिरछी निगाहों से देखते हुये तीसरे पेज़ के चित्र
कि अचानक दाल में आ गये कंकड़ सी
बिख़र गई एक पालीफ़ोनिक स्वरलहरी !
हमारी रोज़ की आदतों में शामिल नहीं था यह दृश्य
उबलती चाय के भगोने को किसी सिद्धहस्त कलाकार की तरह
आंच के ऊपर नीचे नचाने
और फिर गिलासों में बराबर बराबर छानने के बीच
पहले कविता पाठ में उत्तेजित कवि सा बतियाता अब्दुल
सरकारी डाक्यूमेण्टरी के बीच बज उठे सितार सा
भंग कर रहा था हमारी तंद्रायें
चौंकना सही विशेषण तो नहीं
पर विकल्प के अभाव में कर सकते हैं आप
उस अजीब सी भंगिमा के लिये प्रयोग
जो बस आकर बस गयी उस एक क्षण में हमारे चेहरों पर
और फिर नहीं रहा सब कुछ पहले सा
बदल गये हमारी नियमित चर्चाओं के विषय
पहली बार महसूस किया हमने
कि घटी क़ीमतें भी हो सकती हैं दुख का सबब!
हमारी कमीज़ की ज़ेबों में
सम्मानसूचक बिल्लों से सजे
मोबाईल की स्वरलहरियों से झर गया सम्मोहन...
मानो हमारे ठीक सामने की छोटी लकीर
अचानक हुई हमारे बराबर-और हम हो गये बौने
हालांकि बदस्तूर ज़ारी है हमारा
सताइस सीढ़ियों और छियालिस क़दमो का सफ़र
अब भी रोज़ की तरह अब्दुल करता है नमस्कार
पहले सा ही है पत्ती-शक्कर-दूध-अदरक का अनुपात
पर कप और होंठों के बीच मुंह के छालों सा चुभता है
मोबाईल पर चाय के आर्डर लेता अब्दुल
आजकल हम सब कर रहे हैं इंतज़ार
कैमरे वाले मोबाईल के भाव गिरने का !












