संदेश

निदा नवाज़ की कविताएँ

चित्र
निदा कश्मीर में रहते हैं. बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा में रहते हैं ; एक ऐसे इलाक़े में जहाँ लोगों को अब कभी भी गोलियाँ चलने या ग्रेनेड फटने की आदत सी पड़ चुकी है. वह ख़ुद इनका शिक़ार हो चुके हैं लेकिन मनुष्यता के प्रति ज़िम्मेदारी की तरह चलने वाला उनका क़लम नब्बे के ख़ूनी दशक से अब तक कभी रुका नहीं. घाटी से आने वाली इकलौती हिन्दी की इस आवाज़ को बहुत गौर से सुनना चाहिए.


यातनाओं का क़ाफ़िला

हम यातनाओं के एक बड़े क़ाफ़िले के साथ अनिश्चिता की गहरी और विशाल घाटी में फैले इतिहास के दहकते रेगिस्तान में सफ़र कर रहे हैं शांति के किसी चश्मे की तलाश में हम खोज रहे हैं हमसे छीनी गईं अस्मिता की हरी भरी चरागाहें
उन्होंने हर युग में,हर क़दम पर हमारे आत्मसम्मान की सीमाओं को लांघा और हमें हांकते रहे अपने उपनिवेश की पाखण्डी लाठी से
वे कभी पैदल आये,कभी हाथी घोड़ों या मोटर गाड़ियों से कभी समुंदरी रास्तों से अकेले या फिर लश्कर के साथ कभी उनके जंगी जहाज़ों की गड़गड़ाहट ने हमारी गहरी नींदों में बसे सुखद सपनों में सेंध लगाई तो कभी उनके टैंक हमारी छाती को छलनी करते गए
उन्होंने हर युग में अपने भेस बदले,धर्म और नियम बद…

अमित उपमन्यु की ताज़ा कविता

चित्र
अमित की कविताएँ आप पहले भी असुविधा पर पढ़ चुके हैं. लेकिन यह कविता अपनी भाषा और अपने बनक में पिछली कविताओं से काफी अलग है. बल्कि यों कहूँ कि यह आज में ज़्यादा विन्यस्त है. यह सहज भी है कि जिस तरह की घटनाएँ लगातार समाज में चल रही हैं उसमें एक संवेदनशील युवा उद्वेलित हो, ज़रूरी अक्सर यह है कि यह उद्वेलन तात्कालिकता के घेरे से बाहर निकले और एक मानीखेज़ स्टेटमेंट में बदल जाए. अमित की यह कविता ऐसा करने में सफल रही है. 

अमित उपमन्यु 

सौ सन्नाटों की रात
1.
दो लोग एक दूजे से पीठ किए बैठे हैं दो अट्टहास कर रहे हैं जो दो घुप्प अंधेरी रात में कविता-पाठ कर रहे हैं चार लोगों का कहना है बकवास कर रहे हैं
चार लोग शोकचक्र को कांधे पर उठाये घूमते हैं चार उसके शोक में ताड़ी पीकर झूमते हैं साहब का फिर आना मुमकिन नहींतो इन आठ को अग्रिम श्रद्धांजलि दे रहे हैं मुर्दों में मिले ज़िंदों को याद करके सूखी-सूखी हिचकियां ले रहे हैं
साहब रोना भी चाहते थे पर रोना आया नहीं

लौट जाती है उधर को भी नजर क्‍या कीजे - कुमार अम्बुज

चित्र
एडिनबर्ग वर्ड राइटर्स कांफ्रेंस, त्रिनिदाद में मुख्य वक्ता के तौर पर दिए गए ओलिव सीनियर के ने कहा था, “राजनीति! व्यग्रता इस पद के संकीर्ण उपयोग से पैदा होती है. हम अक्सर राजनीति को पार्टीगत राजनीति, चुनावी राजनीति, राजनैतिक नेतृत्व और इनसे जुड़े विवादों और टकरावों के रूप में समझाते हैं और इसीलिए बहुत से लोग यह कहते हुए इससे खुद को अलग करते हैं कि ‘मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं. ... लेकिन राजनीति अपनी बेहद आरम्भिक परिभाषा में ही राज्य चलाने की कला से जुडी है...मैं कहना चाहती हूँ कि देश की वृहत्तर राजनीति पालने से लेकर कब्र तक अपरिहार्य रूप से हमारा सबकुछ निर्धारित करती है. रोटी की क़ीमत या बंदूकों की उपलब्धता राजनीति तय करती है और यह भी कि कोई समृद्ध जीवन जियेगा या फिर किसी रिफ्यूजी कैम्प में सड़ेगा...वृहत्तर राजनीति उस दुनिया को जिसमें हम पैदा होते हैं और हमारे दैनंदिन पर्यावरण को निर्धारित करती है और उस ‘राजनीति’ के लिए रास्ता बनाती है जो जीवन के हर क्षण में हमारे उन व्यक्तिगत निर्णयों में अन्तर्निहित है जिन्हें लेने के लिए हम अचेतन या सचेतन तौर पर लेने के लिए बाध्य होते हैं.” 
ह…

स्टेशन नगरीय गढ़ों के गेट होते हैं और गाँवों के लिए दीवार - शेषनाथ पाण्डेय की दो कविताएँ

चित्र
शेषनाथ भाई की इन कविताओं को पढ़ना मेरे लिए विस्मयकारी था. उनके कवि रूप से लगभग अपरिचय मेरे अज्ञान का ही द्योतक है लेकिन ऐसे समय में जब कला के नाम पर निरर्थक वाक्यों और अनर्थक बिम्बों को सजाकर पेश किया जा रहा हो और प्रेम योनि-गुदा के मूर्खतापूर्ण समीकरणों में हल किया जा रहो, ये कविताएँ सिर्फ़ आश्वस्त नहीं करतीं बल्कि पाठ और अर्थ की अन्विति का सुख भी देती हैं. इतिहास, लोक और जीवन के अनेक कोणों से मनुष्यता के स्रोत तलाशतीं इन कविताओं को असुविधा के लिए उपलब्ध कराने के लिए मैं उनका निजी रूप से आभारी हूँ.



अर्थाभास 
एक यहाँ एक जंगल था जो अपनी आग के बिना ही जल गया वहाँ एक नदी थी जो अपनी प्यास के बिना ही जल उठी अब कितना भुलाया जाएगा जंगल जलाने के गुनाह को तुम कैसे उच्चारोगी मुझे जबकि मैंने तुम्हारी प्यास की परवाह नहीं की ! दोमुझे जहाँ प्यास लगी वह एक स्टेशन था चाहे इसकी ज़मीन पर मवेशियों के खुर के साथ टमटम और बैलगाड़ी के पहियों के निशान ही क्यों ना हो चाहे इसके पुकार का नाम टेसन ही क्यों ना हो स्टेशन नगरीय गढ़ों के गेट होते हैं और गाँवों के लिए दीवार मैंने तुम्हारी तस्वीर देखी और प्यास की बात भूल गया रे…