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लौट जाती है उधर को भी नजर क्‍या कीजे - कुमार अम्बुज

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एडिनबर्ग वर्ड राइटर्स कांफ्रेंस, त्रिनिदाद में मुख्य वक्ता के तौर पर दिए गए ओलिव सीनियर के ने कहा था, “राजनीति! व्यग्रता इस पद के संकीर्ण उपयोग से पैदा होती है. हम अक्सर राजनीति को पार्टीगत राजनीति, चुनावी राजनीति, राजनैतिक नेतृत्व और इनसे जुड़े विवादों और टकरावों के रूप में समझाते हैं और इसीलिए बहुत से लोग यह कहते हुए इससे खुद को अलग करते हैं कि ‘मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं. ... लेकिन राजनीति अपनी बेहद आरम्भिक परिभाषा में ही राज्य चलाने की कला से जुडी है...मैं कहना चाहती हूँ कि देश की वृहत्तर राजनीति पालने से लेकर कब्र तक अपरिहार्य रूप से हमारा सबकुछ निर्धारित करती है. रोटी की क़ीमत या बंदूकों की उपलब्धता राजनीति तय करती है और यह भी कि कोई समृद्ध जीवन जियेगा या फिर किसी रिफ्यूजी कैम्प में सड़ेगा...वृहत्तर राजनीति उस दुनिया को जिसमें हम पैदा होते हैं और हमारे दैनंदिन पर्यावरण को निर्धारित करती है और उस ‘राजनीति’ के लिए रास्ता बनाती है जो जीवन के हर क्षण में हमारे उन व्यक्तिगत निर्णयों में अन्तर्निहित है जिन्हें लेने के लिए हम अचेतन या सचेतन तौर पर लेने के लिए बाध्य होते हैं.” 
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स्टेशन नगरीय गढ़ों के गेट होते हैं और गाँवों के लिए दीवार - शेषनाथ पाण्डेय की दो कविताएँ

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शेषनाथ भाई की इन कविताओं को पढ़ना मेरे लिए विस्मयकारी था. उनके कवि रूप से लगभग अपरिचय मेरे अज्ञान का ही द्योतक है लेकिन ऐसे समय में जब कला के नाम पर निरर्थक वाक्यों और अनर्थक बिम्बों को सजाकर पेश किया जा रहा हो और प्रेम योनि-गुदा के मूर्खतापूर्ण समीकरणों में हल किया जा रहो, ये कविताएँ सिर्फ़ आश्वस्त नहीं करतीं बल्कि पाठ और अर्थ की अन्विति का सुख भी देती हैं. इतिहास, लोक और जीवन के अनेक कोणों से मनुष्यता के स्रोत तलाशतीं इन कविताओं को असुविधा के लिए उपलब्ध कराने के लिए मैं उनका निजी रूप से आभारी हूँ.



अर्थाभास 
एक यहाँ एक जंगल था जो अपनी आग के बिना ही जल गया वहाँ एक नदी थी जो अपनी प्यास के बिना ही जल उठी अब कितना भुलाया जाएगा जंगल जलाने के गुनाह को तुम कैसे उच्चारोगी मुझे जबकि मैंने तुम्हारी प्यास की परवाह नहीं की ! दोमुझे जहाँ प्यास लगी वह एक स्टेशन था चाहे इसकी ज़मीन पर मवेशियों के खुर के साथ टमटम और बैलगाड़ी के पहियों के निशान ही क्यों ना हो चाहे इसके पुकार का नाम टेसन ही क्यों ना हो स्टेशन नगरीय गढ़ों के गेट होते हैं और गाँवों के लिए दीवार मैंने तुम्हारी तस्वीर देखी और प्यास की बात भूल गया रे…

कूपन में स्मृति

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·अशोक कुमार पाण्डेय
अजीब सी किताब थी वह । 2030 में छपी थी । पूरे सौ साल पुरानी! शीर्षक ही समझ से बाहर था – स्मृति और प्रेम। उसके नीचे लिखा था- रचना। यह शायद लिखने वाले का नाम होगा। माँ ने बताया था कि पहले लोगों के ऐसे ही नाम होते थे। नानी ने उनका भी कुछ नाम रखा था। फिर नामों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और कोड्स अलाट कर दिये गए। उसका कोड था – सी ए जी एल 1090। लेकिन स्मृति और प्रेम! शीर्षक ही न समझ आये तो कोई आगे पढ़े कैसे। उल्टा पलटा तो आधी पूरी लाइने और अजीब अजीब से शब्द जिन्हें कभी डिक्शनरी में भी नहीं देखा था। पंद्रह दिन से पहले मास्टर रोबो से मुलाक़ात असंभव थी। कई लोगों से पूछना चाहा लेकिन जानता था कि उसे न तो इसकी अनुमति थी न ही कोई इस पर ध्यान देने वाला था।
वह थोड़ी देर और सोना चाहता था लेकिन 7 घंटे का उसका कोटा पूरा हो चुका था और टीवी उद्घोषिका लगातार उसे उठने का निर्देश दे रही थी। अंततः उठा और कॉफ़ी मशीन के सामने जाकर कार्ड स्वाइप किया फिर ऑनलाइन ब्रेकफास्ट साईट पर जाकर बैलेंस चेक किया और दो अंडे और टोस्ट ऑर्डर कर दिया। मन तो पराठे खाने का था लेकिन इस महीने में वह दो बार पराठे खा चुका …