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पिशाचों के अट्टहासों के बीच - सुमन केशरी की ताज़ा कविता

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कठुआ बलात्कार और हत्या की घटना ने देश की सामूहिक अन्तश्चेतना को गहरे झकझोरा और यह स्वाभाविक है कि इसकी अनूगूँज साहित्य तथा अन्य कला माध्यमों में भी सुनाई देती. हमारे समय की महत्त्वपूर्ण कवयित्री सुमन केशरी की यह कविता क्रूरता से घिरते जा रहे इस समय में हमारे क्रोध और दुःख की जैसे सामूहिक अभिव्यक्ति की तरह सामने आती है...अधूरी ही हो सकती थी यह कविता जब तक इस दुःख का कोई मदावा न तलाश लें हम...

यह कार्टून चित्र प्रसिद्ध कश्मीरी कार्टूनिस्ट सुहैल नक्शबंदी का है जो इस पूरी घटना और इसके राजनैतिक उपयोग की विडम्बना को बखूबी दर्ज़ करता है.  



एक अधूरी कविता...
उसकी आँखें आसमान को समेटे हुए थीं या खुद आसमान थीं जिनसे कई कई आकाशगंगाओं का प्रकाश फूट फूट उसके होठों पर बिखरती मुस्कान को रोशन किए हुए था वह मुस्कान जो आश्वस्त करती थी कि एक दिन अँधेरा जरूर दूर होगा और सुबह की किरणें मुस्काएँगी हर घर के आँगन में एक समान गजब की करुणा से भरी हुई थी वह मुस्कान जो आठ साल की बच्चियों की मुस्कान से एकदम जुदा थी उसमें न इतराहट थी न जिद न अपने को परी मानने का कोई इल्हाम केसर से धुली वह मुस्कान कुछ संकोच के साथ होठों पर खिल रही…

विमल चन्द्र पाण्डेय की नई कविता

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विमल युवा पीढ़ी के सबसे चर्चित कहानीकारों में से हैं. लेकिन कविताएँ भी उन्होंने लगातार लिखी हैं. असुविधा पर ही आप उनकी एक लम्बी कविता पढ़ चुके हैं.  इन कविताओं का गठन और तनाव दोनों चौंकाता है. लम्बी कविताओं में इसे लगातार निभा पाना कवियों के लिए हमेशा एक मुश्किल चुनौती रही है. जिस तरह का विषय उन्होंने चुना है इस कविता में उसमें शिल्प के स्तर पर बिखराव का खतरा होता है तो भाषा के स्तर पर शोर का. लेकिन विमल ने इसमें वह शिल्प चुना है जो मुझे निजी तौर पर बहुत प्रिय है और पोस्ट ट्रुथ के इस समय को रेशा रेशा पकड़ कर एक पूरी रस्सी बटने में क़ामयाब. यहाँ लम्बी कविता कई छोटी कविताओं का एक समुच्चय बन जाती है, ऐसी कविताएँ जो अलग अलग होते हुए भी एक ही विडम्बना के अलग-अलग पक्षों को साथ में बुनती हुई.


कैंसर और बलात्कार के आम हो चुकने वाले मेरे समय का रोज़नामचा
ये कविता देश के पक्ष में हो सकती है पर ये निश्चित ही सरकार के ख़िलाफ़ है ऐसी जोखिम भरी पंक्ति से जो अपनी बात आज के दौर में शुरू करे समझिये उसका कलेजा निडर और नीयत साफ़ है
** (स्वर्गीय नरेंद्र झा के लिये)
कैंसर और बलात्कार के आम हो चुकने के बाद के इस दृश्य में व…