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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

अरुण कमल का संकलन "मैं वो शंख महाशंख" पढ़ते हुए


अस्सी के दशक के बेहद महत्त्वपूर्ण कवि अरुण कमल के इस संकलन पर मैंने  परिकथा के लिए लिखा था जो बाद मे राजकमल प्रकाशन के न्यूज़ लेटर मे भी छपा। आज यहाँ  उनके जन्मदिन पर शुभकामनाओं के साथ 



पीछे से ताक रही डूबती आँख के साथ चलते कदम...
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अरुण कमल का हालिया संकलन ‘मैं वो शंख महाशंख’ पढ़ते हुए उनके पहले संकलन की शीर्षक कविता ‘अपनी केवल धार’ की याद आना स्वाभाविक है. वंचित कामगार वर्ग के लिए उनका यह विनीत और कृतग्य भाव उनकी पूरी काव्ययात्रा में बार-बार आया है, लेकिन यहाँ इस कविता में ही नहीं बल्कि कई अन्य कविताओं में भी इस कृतज्ञता की जगह एक सहयात्री का भाव है. अपनी तीन दशकों से लम्बी काव्ययात्रा के इस पड़ाव में उनका पहले से कहीं अधिक धैर्यवान और परिपक्व दिखना तो स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ वह जो पहले से अधिक उर्जावान, व्यग्र और धारदार दिख रहे हैं, वह विस्मित करने वाला है. इस संकलन का भावबोध और इसकी वैचारिकता ही नहीं, इसके शिल्प और भाषा की बहुरंगी चमक भी उस ऊर्जा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे रही है, जो उनके कवि को लगातार सक्रिय ही नहीं बनाए हुए है बल्कि लगातार नए-नए क्षेत्रों में प्रवेश करने, द्वंद्वों में उलझने, उनसे दो-दो हाथ करने और अपनी प्रतिबद्धता की जाँच करने की ओर अग्रसर भी कर रहा है. एक वामोन्मुख राजनीतिक कवि के लिए यह समय जितना उदासी और अवसाद का है उतना ही भविष्य की लम्बी लड़ाई की तैयारी के तौर पर अपने तूणीर में नए-नए बाणों को एकत्र कर बिखरी सेनाओं में नया उत्साह भरने का भी. यह संकलन इन दोनों कार्यवाहियों की गवाही देता है. नवसाम्राज्यवादी समय में पीछे छूटते जा रहे लोगों और आदर्शों तथा परम्पराओं की निशानदेही ही नहीं अपितु उन्हें अपनी कविता और अपने जीवन में साथ लेकर चलने का संकल्प कवि को वह ज़रूरी शक्ति देता है जिसके भरोसे वह कविताओं के ज़रिये विविधता और अर्थ बहुलता से संपन्न एक ऐसा आख्यान रचता है जिसमें उसका समय अपनी समस्त विसंगतियों तथा विपर्ययों के साथ पालिफोनिक स्वर में दर्ज़ होता है. 

संकलन की दूसरी ही कविता है – ‘निर्बल के गीत’. छह उपखंडों में विभाजित यह कविता एक आर्तनाद से शुरू होकर जिस तरह एक जिद में समाप्त होती है, वह इन उपखंडो को गीत के अलग-अलग बंद में तब्दील कर देता है. हर बंद के बीच जो अंतराल है वही है इस गीत का मुखड़ा जहां खामोशी से कवि अपनी पक्षधरता को बार-बार दुहरा रहा है. हर रात हर चीज़ से डरता हुआ निर्बल, सुनसान घर में अकेले बचे रह जाने की नियति से बचा लेने की गुहार करता निर्बल, दूब में बस ओस भर दख़ल की चाहना दुहराता निर्बल जब सारी उम्मीदों से बेआस हो जाता है और यह समझ जाता है कि ‘कोई कुछ नहीं देगा/एक शाम भोजन भी नहीं रात भर का आसरा तो दूर’ तब उसके पास जो बचता है वह है थोड़ी उदासी और थोड़ी उम्मीद में पगा उसका अपना आत्मबल, उसकी अपनी जिद जिसके भरोसे वह कह पाता है “जीता रहूँगा/उस पेड़ की तरह जिस पर ठनका गिरा/उस कुत्ते की तरह जिसकी देह में खौरा है/उस पक्षी की तरह जिसके पंख झड़ रहे हैं/ मैं एक टूटी सड़क की तरह ज़िंदा रहूँगा/ एक सूखी नदी की तरह अगले अषाढ़ तक.” अषाढ़ की प्रतीक्षा में सूखी नदी का ज़िंदा रहना मानों हमारे समय का एक महाकाव्यात्मक बिम्ब बनकर सामने आता है. प्रलय प्रवाह में बच गए राजा मनु के बरक्स यह आगामी अषाढ़ की प्रतीक्षा में इस मानवविरोधी समय में खुद को पूरी ताकत के साथ बचा ले जाने की मशक्कत करता निर्बल है. इस कविता में अरुण कमल ने जिस देसज बिम्ब-संपन्न आद्र भाषा और गीतात्मक प्रवाह वाले सबलाइम शिल्प का प्रयोग किया है, वह समकालीन रूखी और अति-गद्यात्मक कविताओं की भीड़ में अलग से दिखाई और सुनाई देने वाला स्वर है. इस कविता के साथ जिस एक और कविता का ज़िक्र मैं करना चाहूंगा वह है ‘निजी एलबम से’. निजी एलबम के सहारे अपने कवि मित्रों और अग्रजों की स्मृति दर्ज़ करती यह कविता उन चित्रों को जैसे पाठक के भावबोध में पुनर्सृजित कर देती है. अपनी इस  चित्रधर्मी भाषा में अरुण कमल केवल उन्हें याद ही नहीं करते बल्कि शमशेर, त्रिलोचन, भीष्म साहनी, नागार्जुन और केदार नाथ अग्रवाल के पैरों के पास खुद के बैठे होने की कृतग्य परन्तु स्पष्ट घोषणा भी करते हैं. यहाँ आवर्त के सम्पादक वीरेश चन्द्र और मानबहादुर सिंह की स्मृति में लिखी गयी कविताओं का भी मैं ज़िक्र करना चाहूंगा. मूक भीड़ के सामने कवि मानबहादुर सिंह की गुंडों द्वारा की गयी ह्त्या से उपजे क्रोध और हताशा को इस कविता में समेटते हुए जिस तरह बिना लाउड हुए वह कहते हैं कि ‘पर कितना कम थूक है अब इस देश के कंठ में’ वह आपको भीतर तक हिला देता है. 

ये हमारे  समकालीन गीत है, गीत की पारम्परिक संरचना की ऐतिहासिक विडम्बनाओं से टकराते हुए, अपने युगसत्य को कहने के लिए ताक़त जुटाता हुआ. इसी संकलन की एक और कविता ‘अभागा’ में वह इसी युगसत्य के बरक्स वह अपने साथी कवियों और इस रूप में खुद से भी सवाल करते हैं. वे पूछते हैं – ‘वे यहाँ इंतज़ार कर रहे थे तेरा और तू/ हवाई टिकट के लिए दौड़ रहा था/ क्या करता वहाँ जाकर उन आचार्यों सभासदों के बीच/ जिनके लिए काव्य बस डकार है अफारे की.’ कविता का अंत आज अकेले पड़ते जा रहे कविता संसार के भाग्य पर एक टिप्पणी के साथ होता है – ‘अभागा है वह जिसका कहीं कोई इंतज़ार नहीं करता/ उससे भी अभागा है वह जो इंतज़ार करते दोस्तों को छोड़/ आगे बढ़ जाता है’ – वंचना और उत्पीड़न झेलते बहुजन को छोड़कर साहित्य की सत्ता की गणेश परिक्रमा लगा रहे साहित्य का अकेला पड़ता जाना स्वाभाविक ही तो है! और इसका प्रतिकार भी वह सुझाते हैं अपनी एक और कविता ‘आलोचना पर निबंध’ में – ‘नहीं, हर धातु कंचन नहीं होता/ और कविता तो अधातु है वत्स/ कोई लिहाज मत करना न बड़े का, न नाम, न कुल गोत्र/ लिहाज बस सत्य का – जरा सा हाथ कंपा कि तस्वीर/ डिग जाएगी/ सबसे कठिन है कविता से प्यार/ उससे भी कठिन/ उस कविता के पक्ष में संग्राम. यह संकलन उस संग्राम का एक जीवंत दस्तावेज़ है. सहयात्रा का यह स्वर और भाषा और शिल्प का यही रंग ‘बस एक निशान छूट रहा था’, ‘पुराना सवाल’, ‘जिसने झूठी गवाही दी’ जैसी कविताओं और ‘किसी के लिए तीन कविताएँ’ तथा ‘तलवे के छाप’ जैसी  प्रेम कविताओं में भी लक्षित किया जा सकता है, किंचित दूसरे रूप में.

संकलन में अरुण कमल ने पाकिस्तान यात्रा के दौरान लिखी गयी कवितायें ‘दूसरा आँगन’ शीर्षक से एक साथ रखी हैं. साझा इतिहास और संस्कृति वाले देश में यह सवाल उठना तो लाजिम है ही कि ‘ये कैसा बिदेस है जो देस सा लगे है’. निदा फाज़ली ने अपनी यात्रा से लौटकर लिखा था – हिन्दू भी मजे में हैं, मुसलमां भी मजे में / इंसान परेशान यहाँ भी है वहां भी. अरुण कमल लिखते हैं – ‘मैंने लाहौर में एक तोता देखा...यहाँ भी वह फूले चने खाता वैसी ही निपुणता से/ छिलका बाहर दाना अन्दर/ और नाम भी मिट्ठू ही था यहाँ, मियाँ मिट्ठू.../ पर एक बात जो ख़ास लगी वो ये कि/ यहाँ भी वो लोहे के पिंजड़े में बंद था जैसे यहाँ/ और यहाँ भी वो पिंजड़ा काटने की मुहिम में जुटा था जैसे वहाँ.’ इस तरह एक जैसी परेशानियों से आगे जाकर एक जैसी प्रतिरोध की ताकतों को भी देख पाते हैं. लेकिन इस एक जैसे सबकुछ के बीच बाघा बार्डर पर झंडे उतारने की परेड में बाड़ के उस पार फहराया जाता भारतीय झंडा मातृभूमि के प्रति प्यार जगाता है तो धुँआ उठाते घर और दूही जाती भैंसों को देखकर एक बार फिर घर याद आता है. जहाँ झंडे हमें अलग करते हैं वहीँ यह धुँआ हमें एक करता है. यही सबब है उनकी इस इच्छा का कि ‘कितना अच्छा हो अगर दुनिया की हर सड़क हर चौक/ शाम ढलते दस्तरख्वान बन जाए/ और रात का मानी हो रोशनी और रोटी.’ शहीद-ए-आज़म की बेकद्री का उनका दर्द शायद पाकिस्तान में हुए एक हालिया फ़ैसले से कुछ कम हुआ हो लेकिन वह आशंका तो अपनी जगह है ही कि – ‘ऐसा भी हो सकता है देश में कल?/ मेरे भी देश में?’    

इस संकलन में कई कवितायें लोकतंत्र के उस हश्र को रेशा-रेशा साफ़ करते हुए उस पर सवाल खड़ा करती हैं जिसने आम जनता के जीवन को दुस्वार कर दिया है. ‘परिवर्तन’ जैसी कविता जिसमें वह कहते हैं कि ‘दुर्ग के कपाट के रंग बदल गए/ बदल गए प्रहरी उनकी बर्छियाँ/ बदले सभासद नवरत्न बदले/ बदली थैलियाँ अशर्फियाँ/ तब भी खड़ा था द्वार पर/ अब भी खड़ा हूँ द्वार पर/ कोई तो कहे/ भिखमंगे को जाने दो अन्दर’ तो असल में वह भगत सिंह की उस आशंका के सही साबित होने की निशानदेही कर रहे हैं कि ‘गोरे अंग्रेजों की जगह अगर काले अँगरेज़ सत्ता में आ गए तो स्थितियों में कोई बदलाव नहीं होने वाला’ और इस तरह वह देख पाते हैं कि आज़ादी के साठ सालों के भीतर ‘सरकार बिगड़े जमींदारों की तरह सारे कल कारखाने चम्मच कटोरी/ बेच रही थी और अंत में उसने बच्चों के दूध की बोतलें भी बेच दीं’ (सरकार और भारत के लोग). ऐसे में क्या आश्चर्य कि एक माँ यह सवाल करे कि ‘सरकार जी, ऐसा करें कि संसद भी बेच दें’. ‘घर से घूरे में’ बदल गए घरों वाले इस ‘विश्व के विशालतम लोकतंत्र’ के नागरिक की मुक्ति का रास्ता न तो उस ‘योग’ में है जिसमें ‘नगर के भद्र जन श्रेष्ठ प्रातः प्रातः / सरोवर के पास उद्यान के पवित्र पवन को/ सड़ा रहे थे   पाद पाद कर’ संपादित कर रहे हैं न ही अन्ना-केजरीवाल के नेतृत्व में ज़ारी मध्यवर्ग के उस विचारधाराहीन आन्दोलनों से जिसने ट्यूनीशिया, लीबिया, बहरैन या मिस्र में सरकारें तो बदल दीं लेकिन जनता के सपने न पूरे कर सका (इस कविता ‘हवा में हाथ’ में जो आशंका उन्होंने व्यक्त की है उसे वक़्त ने सही सिद्ध किया) बल्कि सर्वहारा वर्ग के उस प्रतिकार में जो साइकिल फेंके जाने के प्रतिरोध में काम रोक कर उन दो असंगठित मजदूरों ने किया, बस ज़रुरत उस ‘खुली मुट्ठी’ को कस कर बाँधने की है, इसीलिए कवि को धरने से वापस घर लौट रहे बाप और बेटे उम्मीद से भरा वह बिम्ब देते हैं जिसे वह कविता में दर्ज़ करता है और यह ‘निगेटिव फोटो’ सी तस्वीर उसे दुनिया की तमाम चमक-दमक और रंग-रोगन से भरी तस्वीरों से अधिक महत्वपूर्ण लगती है. इन्हीं निगेटिव्स से भरे इस ‘एल्बम’ में दुनिया को खूबसूरत बनाने वाले सपनों और संघर्षों का उम्मीद तथा आकांक्षा से भरा एक हरा-भरा संसार है.
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प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन 


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