
असुविधा
मेरी कवितायेँ
रविवार, २९ नवम्बर २००९
मै कलमा पढ़कर सुरैया नही बनना चाहती

| प्रतिक्रियाएँ: |
शनिवार, १४ नवम्बर २००९
चाय, अब्दुल और मोबाइल

(कोई तीन साल पहले यह कविता कथन में छपी थी। आज इसे संकलन तैयार करते हुए दुबारा पढा तो लगा आप सब से शेयर करना चाहिए)
रोज़ की तरह था वह दिन
और दफ़्तर भी चेहरों के अलावा
कुछ नहीं बदला था जहां
वर्षों से थके हुये पंखे
बिखेर रहे थे ऊब और उदासी
फाईलें काई की बदरंग परतों की तरह बिखरीं थीं बेतरतीब
अपनी अपार निष्क्रियता में सक्रिय आत्माओं का सामूहिक वधस्थल।
रोज़ की तरह घड़ी की सुईयों के एक खास संयोग पर
वर्षों के अभ्यस्त पांव
ठीक सताइस सीढ़ियों और छियालिस क़दमो के बाद
पहुंचे अब्दुल की दुकान पर
चाय पीना भी आदत थी हमारी ऊब की तरह!
रोज़ की तरह करना था उसे नमस्कार
रोज़ की तरह लगभग मुस्कुराते हुये कहना था हमें- पांच कट
फिर जुट जाना था कुर्सियों और अख़बार के जुगाड़ में
रोज़ की तरह जताना था अफ़सोस बढ़ती क़ीमतों पर
दुखी होना था बच्चों की पढाई से बीबी की बीमारी
और दफ़्तर की परेशानियों से देश की राजनीति तक पर
तिरछी निगाहों से देखते हुये तीसरे पेज़ के चित्र
कि अचानक दाल में आ गये कंकड़ सी
बिख़र गई एक पालीफ़ोनिक स्वरलहरी !
हमारी रोज़ की आदतों में शामिल नहीं था यह दृश्य
उबलती चाय के भगोने को किसी सिद्धहस्त कलाकार की तरह
आंच के ऊपर नीचे नचाने
और फिर गिलासों में बराबर बराबर छानने के बीच
पहले कविता पाठ में उत्तेजित कवि सा बतियाता अब्दुल
सरकारी डाक्यूमेण्टरी के बीच बज उठे सितार सा
भंग कर रहा था हमारी तंद्रायें
चौंकना सही विशेषण तो नहीं
पर विकल्प के अभाव में कर सकते हैं आप
उस अजीब सी भंगिमा के लिये प्रयोग
जो बस आकर बस गयी उस एक क्षण में हमारे चेहरों पर
और फिर नहीं रहा सब कुछ पहले सा
बदल गये हमारी नियमित चर्चाओं के विषय
पहली बार महसूस किया हमने
कि घटी क़ीमतें भी हो सकती हैं दुख का सबब!
हमारी कमीज़ की ज़ेबों में
सम्मानसूचक बिल्लों से सजे
मोबाईल की स्वरलहरियों से झर गया सम्मोहन...
मानो हमारे ठीक सामने की छोटी लकीर
अचानक हुई हमारे बराबर-और हम हो गये बौने
हालांकि बदस्तूर ज़ारी है हमारा
सताइस सीढ़ियों और छियालिस क़दमो का सफ़र
अब भी रोज़ की तरह अब्दुल करता है नमस्कार
पहले सा ही है पत्ती-शक्कर-दूध-अदरक का अनुपात
पर कप और होंठों के बीच मुंह के छालों सा चुभता है
मोबाईल पर चाय के आर्डर लेता अब्दुल
आजकल हम सब कर रहे हैं इंतज़ार
कैमरे वाले मोबाईल के भाव गिरने का !
मंगलवार, २७ अक्तूबर २००९
वे
वे
सबसे ऊंची आवाज़ में
नारे लगाकर भर देते हैं
सबसे ज्यादा खालीपन
सबसे दहकते लहू में
भर देते हैं बर्फ का ठंढापन
वे
समझौते के ख़िलाफ़
बोलते हुए कर देते हैं
सबकुछ समर्पित
मांग लाते हैं
हड्डियां दधीचि से
और ड्राईंगरूम में
सजाकर रख देते हैं वज्र
वे
ख़तरा टल जाने पर
एकान्त टापू से निकल
करते हैं सावधान
सबसे क्रांतिकारी
सिद्धांतों का परचम लिये
सबसे महफ़ूज़ जगहों पर
लगाते हैं पोस्टर
और इस तरह
धीरे-धीरे
वे बदल देते हैं वह सब
जो नहीं बदलना चाहिये
शनिवार, २४ अक्तूबर २००९
ब्लैक फ्रिंज
( अब असुविधा पर अपनी कविताओं के साथ-साथ हिन्दी के महत्वपूर्ण रचनाकारों की रचनायें पढवाने का भी विचार है। इस क्रम में आज कवि कथाकार विजय गौड़ की कहानी । हिन्दी की कहानियों में विविधता के अभाव को देखते हुए विज्ञान केंद्रित यह कहानी ख़ास लगती है )
लड़कों की खुसर-पुसर जारी थी। आपस में दूरियां कम होने पर भी पूरी आवाज में कोई नहीं बोल रहा था। बस एक दबा-दबा स्वर जो शब्दों के अन्त में उत्पन्न होता है... हस् स्सऽऽऽ ! यंत्रों को इधर-उधर रखने की आवाजें ध्यान भंग कर रही थीं। लैब-असिस्टेंट इधर-उधर घूम रहे थे। टैक्निशियन एक लड़के का वोल्टमीटर ठीक कर रहा था। वोल्टमीटर में डिफ्लैक्शन नाम मात्र को भी नहीं था। वह लड़का जब काफी देर तक छेड़खानी करते-करते परेशान हो गया तब मैंने ही उसे सलाह दी कि टैक्निशियन से कहे। लेकिन वह लड़का तो तब भी परेशान ही होता रहा। अन्त में मुझे ही टैक्निशियन को बुलाना पड़ा । एक लड़का और टैक्निशियन के पास आया। उसके ‘आई पीस‘ की क्रास वायर टूट गयी थी। मैंने जेब से परची निकाली और ‘आब्जेक्ट‘ लिखने लगा। एक लड़का मेरे पास आया। मैं घबरा गया। परची छुपानी चाही पर लड़के को देख आश्वस्त हुआ। उसने ‘स्केल‘ उठाया और चला गया। मैं कुछ नहीं बोला, हालांकि मैं स्केल देने के पक्ष में नहीं था पर... । उसके बाद मैंने उपयोग किये जा रहे उपकरणों का नाम और फार्मूला लिखा। फार्मूला मुझे कतई याद नहीं था। दिमाग में प्रश्न गूंजा-‘‘ कहीं एग्जामिनर ने फार्मूला ही पूछ लिया तो‘‘। यही सोचकर फार्मूला याद करने लगा। बड़ी मुश्किल से ही रट पाया। बगल वाले लड़ंके के ‘गैल्वेनोमीटर‘ के स्केल पर लाइट-स्पाट ही नहीं आ रहा था। काफी देर तक वह स्पाॅट को स्केल पर लाने की कोशिश करता रहा। बाद में परेशान होकर उसने मुझे टोका। करता तो मैं भी क्या पर सांत्वना देने या समझो यूं ही, स्पाॅट को एडजेस्ट करने लगा। स्पाॅट कभी स्केल पर दिखाई देता फिर उसी क्षण गायब। जरा-सा स्केल हिला कि समझो झलक मात्र को दिखा स्पाॅट उसी वक्त गायब । तभी एक टीचर घूमता हुआ आ गया। मेरे हाथ गैल्वेनोमीटर के स्केल पर ही थे। वह लड़का और मैं दोनों ही सहम गये। ‘‘तुम्हारा प्रैक्टिकल कौन सा है?‘‘ टीचर ने डांटते हुए कहा। मैं बिना कुछ बोले ही सिर नीचे झुका अपने उपकरणों के पास आ गया। डर के मारे होश ही उड़ गये। कभी सरकिट को छूने लगा कभी कापी के पन्ने उलटने लगा। टीचर एक ही जगह पर खड़ा-खड़ा मुझे घूरता रहा फिर दूसरी ओर घूम गया। सभी लड़कों ने इसी बीच परचियां छुपा ली थी और प्रैक्टिकल करने का अभिनय करने लगे। टीचर के जाने के बाद मैंने गैल्वेनोमीटर के क्रास में लगी कुंजी का नाम बगल वाले लड़के से पूछा और लिखने लगा। टैक्निशियन ने उस लड़के के आई पीस में क्रास वायर चिपका दी। मैं ‘आब्जरवेशन टेबल‘ बना चुका था। लेकिन मैंने रीडिंग नहीं उतारी। टीचर का सख्त आदेश था कि पहली रीडिंग उनसे चैक करवायी जाये। बगल वाला लड़का रीडिंग भी लिख चुका था। समझा जाये तो वह अपना पहला प्रैक्टिकल समाप्त कर चुका था। अब वह इधर से उधर घूमने लगा। कभी इसके पास कभी उसके पास। बीच - बीच में एक कमरे से दूसरे कमरे में भी निकल जाता। दूसरे कमरे में लड़कियां भी थी। वह हर क्षण कोई न कोई सूचना लेकर दौड़ता हुआ आता-एग्जामिनर कहां है, क्या कर रहा है, कौन-कौन लड़का नकल कर रहा है, आदि आदि! अन्य लड़के भी प्रैक्टिकल समाप्त कर चुके थे। दबी- दबी आवाज में वे एक दूसरे से सवाल करने लगे। मैंने जेब से परची निकाली। रीडिंग पढ़ी और उसे ही इस्तेमाल करना चाहा-‘कन्डेन्सर‘ को 2 माइक्रो फैराडे पर घुमाया। वोल्टमीटर का पाठ 2 वोल्ट किया। जैसा मैंने पढ़ा था, करता गया। ‘मोर्स की‘ दबायी और छोड़ दी। गैल्वेनोमीटर में विक्षेप होने लगा। स्केल पर स्पाॅट अपनी मध्यमान स्थिति ंके दोनों ओर घूमता हुआ साफ दिखाई देने लगा। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। जिस स्पाॅट को स्केल पर लाने के लिए वह लड़का इतना परेशान होता रहा, वही स्पाॅट इतनी आसानी से आ सकता है! मैंने ‘रफ‘ कागज पर रीडिंग लिखी। उसके बाद तो मेरा उत्साह ही बढ़ गया। टीचर को बुलाया और रीडिंग चैक करवा दी। टीचर के चले जाने के बाद प्रैक्टिकल की सिरदर्दी से बचने के लिए मैंने बाकी की रीडिंग परची से ही टेप ली। टीचर पहले ही कह चुके थे कि जिन्होंने अपना पहला प्रैक्टिकल समाप्त कर लिया वे अपने दूसरे प्रैक्टिकल पर चले जाएं। मैंने अपनी उत्तर पुस्तिका उठायी और दूसरे प्रैक्टिकल उपकरणों पर चला गया - ‘न्यूटन्स रिंग (फ्रिंज) ‘ । एग्जामिनर ने वायवा लेना शुरू कर दिया था। अभी पहले ही लड़के का वायवा चल रहा था। दस मिनट से भी ज्यादा हो गए। लगता था एग्जामिनर पूरे इत्मीनान से वायवा लेने के मूड़ में है। मुझे घबराहट होने लगी। इतना लम्बा वायवा!
‘‘यार मुझे तो कुछ भी नहीं आता। ‘‘ ‘‘तो यहां किसे आता है, जो होगा देखा जाएगा। ‘‘‘‘देख तो सही कितनी देर हो गयी उसे।‘‘ लड़के एग्जामिनर की ओर इशारा करते हुए आपस में बातें कर रहे थे।‘‘अबे देर तो उसके पास लगेगी जो सही जवाब देगा। जब यहां कुछ आता ही नहीं तो क्या खाक पूछेगा।‘‘ सब कुछ दबी आवाज में ही चल रहा था सिर्फ अन्तिम वाक्य ही जोर से बोला गया। तभी एग्जामिनर दूसरे लड़ंके के पास पहुंच गया। वह लड़का हमारे कमरे के दरवाजे के ठीक एकदम सामने ही था। एग्जामिनर की नजर सीधे हमारे कमरे मेे पड़ती थी। सभी लड़के अपने-अपने उपकरणों के सामने खड़े होकर प्रयोग करने लगे। मैंने सोडियम लैम्प के आगे रखी ‘ग्लास प्लेट‘ पर लैंस को रखा और माइक्रोस्कोप में लगे आई पीस से फ्रिंज (रिेग) देखने का अभिनय करने लगा। बीच-बीच में आंख उठाकर सामने वायवा ले रहे एग्जामिनर को भी देख रहा था। एग्जामिनर थोड़ी देर तक ‘सोनोमीटर‘ की तार पर उंगली को उलझाता रहा। वह लड़का आवश्यकता से अधिक परेशान दिखाई दे रहा था, जिसका वायवा चल रहा था। हाथ में पकड़े हुए लकड़ी के स्केल को मोड़ने की कोशिश करता रहा। मैंने फिर आई पीस में झांका। कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। लैंस को रूमाल से साफ कर प्लेट के ऊपर रखा लेकिन स्थिति पहले से भिन्न नहीं रही। पूरे ही उपकरण को प्रकाश के सापेक्ष कई-कई कोणों पर घुमा दिया। रिंग का कहीं कोई आभास नहीं था। ग्लास प्लेट से परावर्तित होता पीला प्रकाश ही दिखायी दे रहा था। मेंरी घबराहट बढ़ने लगी। दरअसल मेरा उद्देश्य मात्र फ्रिंज बना देना ही था। रिडिंग मेरे पास थी ही। फ्रिंज थे कि दिखायी ही नहीं दे रहे थे। परेशान होकर मैंने प्रैक्टिकल लिखना ही ज्यादा उचित समझा। एग्जामिनर एक लड़की के पास पहुंचा और वहीं उसके पास स्टूल में बैठ गया। उसके बाद तो पता नहीं कितने प्रश्न पूछे ओर कितनों के जवाब उस लड़की ने दिए पर वायवा पूरे बीस मिनट तक चला। वह लड़की बार-बार नाक पर टिके चश्में को छू रही थी। मेरी घबराहट और भी ज्यादा हो गयी। मैंने अपना स्टूल उठाया और दूर रख दिया। बगल वाले लड़के ने भी अपना स्टूल वहीं डाल दिया। उसके बाद सभी ने अपन-अपने स्टूल हटा दिए। सबको डर था कि कहीं एग्जामिनर उनके पास भी न बैठ जाये और फिर... । मेरा तो बैठने का मन वैसे भी नहीं था। बैठने में घबराहट बढ़ती हुई सी लगती। लड़के आपस में सवाल-जवाब कर रहे थे। तभी दूसरे कमरे से एक लड़का आया। उसका वायवा हो चुका था। सभी ने उसे घेर लिया। वह बड़ा खुश लग रहा था। अपने जवाब जो उसने एग्जामिनर को दिये थे, बताने लगा। मैं उसके जवाब सुनने की स्थिति में नहीं था। मैं बार-बार उससे वे प्रश्न पूछता रहा जो उससे पूछे गये थे। पर तब ही दूसरे कमरे में टहल रहे अध्यापक ने वहीं से घूर कर देखा, नजर मिलते ही हम दोनों सकपका गए ओर वह चला गया। मैं फिर प्रैक्टिकल लिखने लगाा। एग्जामिनर सामने वाले कमरे के अन्तिम लड़के के पास था। उसके बाद हमारे कमरे में आना था। लड़के दरवाजे की ओट से झांक-झांक कर देख रहे थे। बगल वाला लड़का रीडिंग उतार रहा था। वह बार-बार आई पीस में देखकर उत्तर-पुस्तिका पर लिखता। शायद उसके फ्रिंज बन चुके थे। मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। मैंने एक बार फिर लैंस को उठाकर साफ किया। लैंस को ग्लास प्लेट पर रख आई पीस में देखा। आई पीस में पीले प्रकाश के अलावा कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। लड़के दरवाजे के साथ एकदम सटकर दूसरे कमरे की ओर ही देख रहे थे। वायवा देता लड़का बहुत ही सहज होकर सवालों के जवाब दे रहा था। मेरी घबराहट फिर बढ़ती रही। एक तो वायवा का डर दूसरे फ्रिंज न बन पाने के कारण मुझे बेचैनी ज्यादा ही होने लगी। मैंने कमरे में चमकती ट्यूब लाइट बन्द कर दी। पूरे कमरे में अंधेरा छा गया। सिर्फ सोडियम लैम्प से निकली पीली रोशनी ही कमरे में सीमित ऊंचाई तक फैल रही थी। उसके ऊपर पूरा ही अंधेरा था। आपस में एक दूसरे का चेहरा पहचान पाना भी कठिन हो रहा था। गैल्वेनोमीटर के स्केल पर घूमते स्पाॅट साफ चमकने लगे। उनकी परछांई सामने की दीवारों पर पड़ रही थी। रात का-सा सन्नाटा और सन्नाटे को तोड़ते झिंगुरों की -सी आवाज में लड़के खुसर-पुसर कर रहे थे। मैंने पिछली रात जो भी पढ़ा था, दोहराना चाहा। लेकिन कुछ भी याद नहीं आ रहा था। दिमाग में तो आलोक धन्ना की ‘भागी हुई लड़कियां और पतंग ही गूंज रही थी- ‘‘आकाश को इतना नरम/और मुलायम बनाते हुए कि दुनिया का सबसे पतला /और रंगीन कागज उड़ सके/बाॅंस की सबसे पतली कमानी उड़ सके और शुरू हो सके रोटियों किलकारियों की एक नाजुक दुनिया। गैल्वेनोमीटर के स्पाट की परछाई ध्यान भंग कर रही थी।
एग्जामिनर हमारे कमरे में प्रविष्ट हुआ। एकदम सन्नाटा। सभी लड़के अपने-अपने उपकरणों के पास खड़े हो गये। जूते की खटखट, सन्नाटे को तोड़ती सोडियम लाइट की पीली रोशनी और दीवार पर तैरता लाइट स्पाॅट। कहीं कोई आवाज नहीं थी। एग्जामिनर मेेरे पास आकर खड़ा हो गया। मैं जबरदस्ती आंख को माइक्रोस्कोप में धंसा फ्रिंज देखने का अभिनय करने लगा। रोशनदान से एक प्रकाश किरण कमरे में पहुंच रही थी। मैं बिना वजह ही आई पीस को नीचे ऊपर चलाने लगा जिससे एग्जामिनर को लगे कि मैं आई पीस केा समायोजित कर रहा हूं। अचानक मुझे काले सफेद रिंग दिखायी दिये। मैंने आई पीस को स्थिर कर गौर से देखा। फ्रिंज साफ दिखायी दे रहे थे। मैंने गर्दन उठायी। एग्जामिनर ने मुझसे नाम पूछा। पिछली कक्षाओं के परिणाम पूछे। फिर उपकरण की ओर देखने लगा। मेरी निगाह एग्जामिनर के चेहरे पर ही टिकी थी। उसकी नाक कुछ तिरछी लग रही थी। चश्में के अन्दर आंखों का रंग कुछ लालपन लिए हुए था। चेहरे पर भौंह के अलावा नाम मात्र को भी बाल नहीं थे। उसने अपना दाया हाथ बेंच पर टेक दिया। दांये पैर को हवा में लहराते हुए सारे शरीर का भार उसने दांये पैर पर ही डाल दिया। हमारे बीच कोई आवाज नहीं थी। मुझे ऐसा लग रहा था, सभी मेरी ओर देख रहे हैं। एग्जामिनर ने उपकरण देखते हुए पूछा- ‘‘ ये प्रैक्टिकल क्यों कर रहे हो ?‘‘ मैंने जरा भी विचलित हुए बिना जवाब दिया। एग्जामिनर थोड़ा मुस्कराया। आंखों से चश्मा निकाल उसने अपनी एक आंख को माइक्रोस्कोप में धंसा दिया। मुझे फिर घबराहट होने लगी। कमरे में रोशनदान से आती प्रकाश किरण में तैरते धूल-कण साफ दिखायी दे रहे थे। मैंने अपने आप को संयत करने की कोशिश की।-‘‘ हेा न हो एग्जामिनर मुझसे यही पूछेगा कि बीच में काला रिंग क्यों दिखायी देता है।‘‘ दरअसल काले सफेद फ्रिंजों को ही न्यूटन्स रिंग कहा जाता है न। मैं जवाब तलाशने लगा-‘ काला फ्रिंज-काला रिंग! दो सतहों की पीठ जुड़ने पर उत्पन्न होने वाला काला फ्रिंज!‘ कमरे में एक दम स्याह-काला अंधेरा था। सोडियम लाइट की पीली रोशनी बड़ी ही रहस्यमय लग रही थी। ‘सेन्टर में काला फ्रिंज- विरोध का सूचक, शान्ति विरोध। विरोध अपने तक प्रकाश किरण न पहुंच पाने का, विरोध- व्यवस्था में कस दिये जाने का। विरोध जबरदस्ती थोपी गई मान्यमाओं का। यदि सोडियम लाइट (मोनोक्रोमेटिक) की जगह साधारण प्रकाश होता तो क्या तब भी काला रिंग ही दिखायी देता?‘‘
मैं जवाब देने के लिए एकदम मुस्तैद हो गया। एग्जामिनर ने आई पीस से आंख हटायी। आंखों पर चश्मा चढ़ाया । अपने हाथ में पकड़े हुए कागज पर मेरे नाम के आगे लाल स्याही से न जाने क्या लिखा और आगे बढ़ गया। मेरी समझ नहीं आया कि मैंने पहला जवाब सही दिया था या गलत। क्योंकि लड़कों का कहना था कि जो सही जवाब देगा उसी से ज्यादा प्रश्न पूछे जायेंगे।
शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९
विरूद्ध
नहीं किस-किस के विरूद्ध
कौन सी रणभूमि में निरन्तर कटते-कटाते
संघर्ष रत रोज लौट आते अपने शिविर में
श्रांत-क्लांत रक्त स्वेद मिट्टी में सने
घाव के अनगिन निशान लिये
न जीत के उल्लास में मदमस्त
न हार के नैराष्य से संत्रस्त।
कोई आकस्मिक घटना नहीं है यह युद्ध
न आरम्भ हुआ था हमारे साथ
न हमारी ही किसी नियति के साथ हो जायेगा समाप्त
शिराओं में घुलमिलकर दिनचर्या का कोई अपरिहार्य सा हिस्सा हो ज्यों
बिलकुल असली इन घावों के निशान
लहू बिल्कुल लहू की तरह - गर्म,लाल और गाढ़ा
हथियारों के बारे में नहीं कह सकता पूरे विश्वास से
इससे भी अधिक कठिन है दोस्तों और दुश्मनों के बारे में कह पाना
अंधकार - गहरा और लिजलिजा अंधकार
मानो फट पड़ा हो सूर्य
और निरंतर विस्फोटों के स्फुलिंगों के
अल्पजीवी प्रकाश में कैसे पहचाने कोई चेहरे
बस यंत्रमानवों की तरह-प्रहार-प्रहार-प्रहार
कई बार तो ऐसा लगता है कि
अपने ही हथियारों से कट गिरा हो कोई अंग
अपना ही बारूद छा गया हो दृष्टिपटल पर
अपनी ही आवाज से फट गया हो कर्णपटल
अपना ही कोई स्वप्न भरभराकर गिर पड़ा हो कांधे पर
अपनी ही स्याही घुलमिल गयी हो लहू में
अपना ही कोई गीत बदल गया हो चीत्कार में ...
इस लिजलिजी अंधेरी दलदल में अमीबा की तरह तैरते विचार
जितनी कोशिश करो पकड़ने की उतने ही होते जाते दूर
और पांव है कि धंसता ही जा रहा है
गहरा - और गहरा- और गहरा
किस दिशा में जा रहा है यह समय रथ?
कौन इसका सारथी?
किस रंग की इसकी ध्वजा?
कुछ नहीं - कुछ भी नहीं दीखता स्पष्ट हम स्वघोषित सेनानियों को
लड़ रहे हैं -
बस लड़ रहे हैं अनवरत नियतिबद्ध या कि शायद विकल्पहीन
‘लड़ रहे हैं कि नहीं बैठ सकते खा़मोश
लड़ रहे हैं कि और कुछ सीखा नहीं
लड़ रहे हैं कि जी नहीं सकते लड़े बिन
लड़ रहे हैं कि मिली है जीत लड़कर ही अभी तक’
प्रश्न तो लेकिन यही है - जीत आखिर कौन सी है?
और ऐसे में बतायें आप ही अब
किस तरह लायें उम्मीद कविता की आखिरी पंक्तियों में?
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मंगलवार, २९ सितम्बर २००९
मेज़र गौतम राजरिशी के लिए
मेजर गौतम राजरिशि बीमार हैं, यह सूचना आज ही मुझे मिली।
वह मेरे उन मित्रों में शामिल हैं जिनसे ब्लाग पर ही मुलाकात हुई। असुविधा के नियमित पाठक गौतम के भीतर एक संवेदनशील और निच्छल मन है जिसकी बानगी उनकी कविताओं और टिप्पणियों में मिलती है।
असुविधा पर कविताओं के अलावा मैने कभी कुछ नहीं लगाया। लेकिन यह पोस्ट सिर्फ़ उन्हें शुभकामनायें देने के लिये। वह शीघ्र स्वस्थ हों तथा दीर्घजीवी हों इस शुभकामना के साथ।
उनके ब्लाग पर तो इक्कीस तारीख की पोस्ट लगी है!
कहीं यह सूचना ग़लत तो नहीं?
काश कि ऐसा ही हो!
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बुधवार, १६ सितम्बर २००९
उधार माँगने वाले लोग
तो पांव न होना ही बेहतर
झुका ही रहता है हमेशा
मांगने वाले का सर
रहिमन वे नर मर चुके …
सब याद था
उन पसरी हुई हथेलियों को
सुन रखे थे उन्होंने भी
अपमान और बरबादियों के तमाम किस्से
संतोष एक पवित्र शब्द था उनके भी शब्दकोष का
लालच से नफ़रत करना ही सीखा था
पूरी हिम्मत से बांध कर रखी थी मुट्ठियां
चुपचाप नज़रें झुकाये गुज़र जाते थे बाज़ार से
आ ही जाये दरवाज़े पर तो कस देते थे सिटकनियां
दूर ही रखा जीभ को स्वाद से
पैरों को पंख से
आंखों को ख़्वाब से
फिर भी
पसर ही गईं हथेलियां एक दिन…
दरवाजों के दरारों से
पता नहीं कब सरक आईं ज़रूरतें
पता नहीं कौन से रोग
जाते ही नहीं जो चूरन और काढों से
पता नहीं कौन सी भूख
मिटती ही नहीं जो मेहनत से
सपनों को तो ख़ैर
हर बार कर दिया परे
पर इनका क्या करें?
जान ही न हो शरीर में
तो कब तक तना रहे सिर ?
भूख के आगे
बिसात ही क्या कहानियों की ?
और पसरीं वे हथेलियां यहां-वहां
मरे वे नर मरने के पहले बार-बार
झुका उनका सिर
और मुंह को लग गई आदत छुपने की
लजाईं उनकी आंखें और इतना लजाईं
कि ढीठ हो गईं
वो मुहावरे अब भी याद हैं उन्हें
हंसते हैं तो कभी सुबकते हैं अकेले में
तो कभी गरियाते हुए मुहावरे की मां को
पसार देते हैं हथेलियों फिर भी
शुक्रवार, ११ सितम्बर २००९
तैयारी एक लम्बी यात्रा की !
अपने-अपने तरीके से
लौटता है कोई रोज़ द़फ़्तर से
पीठ पर लादे अपमानो की गठरी
और पोस्टडेटेड चेक़ों में
क़तरा-क़तरा बिकी सुरक्षा ओढ़कर
सो जाता हैं स्वप्नहीन नींद में ।
कोई लौटता है
प्यार की भरपूर तलाश के बाद
गले में बांधे शर्तों का पत्थर
और डूब जाता है
सात फेरों के दलदल में.
लौटता है
महानगर की अनवरत भागती सडकों से निकल
बरगद की ठहरी सी छाया में
और अगले ही पल सोचने लगता है
लौटने के बारे में।
लौटता है
नई ज़मीन की तलाश मे निकला कवि
उदास हाथों में पुरस्कार संभाले।
एक अधूरी कविता निकलती है
बाज़ार में शब्द तलाशती
और लौट आती है भकुआई सी।
लौट जाते हैं
जंगलों की तलाश में निकले बादल
खेतों की मेढ़ से....
अजीब समय है यह दोस्तों
अनन्त अनचाही यात्राओं में
हर कोई जी रहा हो जैसे विस्थापन
और ऐसे में बेहद ख़तरनाक है लौटना
अगर नहीं है वह
तैयारी एक लम्बी यात्रा की !
गुरुवार, २७ अगस्त २००९
मै अर्जुन नही हूँ
भेद ही नहीं सका कभी
चिडिया की दाहिनी आंख
कारणों की मत पूछिये
अव्वल तो यह
कि जान गया था पहले ही
मिट्टी की चिडिया चाहे जितनी भेद लूं
घूमती मछ्ली पर उठे धनुष से
छीन लिया जायेगा तूणीर
फिर यह कि रुचा ही नहीं
चिडिया जैसी निरीह का शिकार
भले मिट्टी का हो
मै मारना चाहूंगा किसी आदमखोर को
और मेरी नज़र हटती ही नहीं थी
बाईं आंख की कातरता से
मुझे कोई रुचि नहीं थी
दोस्तों से आगे निकल जाने में
भाई तो फिर भाई थे
मै तो सजा कर रख देना चाहता था
उस मिट्टी की चिडिया को पिंजरे में
कि आसमान में देख सकूं एक और परिंदा
मै उसकी आंखों में भर देना चाहता था उमंग
स्वरों में लय, परों में उडान
और ख़ुश हूं अब भी
कि कम से कम मेरी वज़ह से
नहीं देना पडा
किसी एकलव्य को अंगूठा।
बुधवार, १९ अगस्त २००९
वे चुप हैं
गुनगुनी ग़र्मी के भीतर
वे चुप हैं
वे चुप हैं
गिनते हुए पुरस्कारों के मनके
कभी-कभी आदतन बुदबुदाते हैं
एक शहीद कवि की पंक्तियाँ
उस कविता से सोखते हुए आग वे चुप हैं
वे चुप हैं
मन ही मन लगाते आवाज़ की कीमत
संस्थाओं की गुदगुदी गद्दियों में करते केलि
सारी आवाज़ों से बाखबर
वे चुप हैं
वे चुप हैं
कि उन्हें मालूम हैं आवाज़ के ख़तरे
वे चुप हैं कि उन्हें मालूम हैं चुप्पी के हासिल
चुप हैं कि धूप में नहीं पके उनके बाल
अनुभवों की बर्फ़ में ढालते विचारों की शराब
वे चुप हैं
चुप्पी ख़तरा हो तो हो
ज़िन्दा आदमी के लिए
तरक्कीराम के लिए तो मेहर है अल्लाह की
उसके करम से अभिभूत वे चुप हैं

