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असुविधा विशेष - लाल्टू की ताज़ा कविताएँ

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लाल्टू हमारे समय के महत्त्वपूर्ण और प्रतिबद्ध कवि हैं. आज "असुविधा विशेष" में उनकी कुछ ताज़ा कविताएँ. तरक्की कितनी तरक्की कर ली। इतनी कि लिखना चाह कर भी रुकता है मन। लैंग्वेज़ इनपुट ठीक है ,   यूनिकोड कैरेक्टर्स हैं ,   प्यार पर्दे पर बरसने को है ,   पर क्या करें उन ज़ालिमों का जो खुद को ज़ुल्मों के तड़पाए मानकर तांडव नाच रहे हैं ; मन कहता है लिखो प्यार और फ़ोन आता है कि चलो इकट्ठे होना है जंग के खिलाफ आवाज़ उठानी है क्या करें कितनी बार कितनी विरोध सभाओं में जाएँ कि जंगखोर धरती की आह सुन लें कहना है खुद से कि हुई है तरक्की प्यार को रोक नहीं सकी है नफ़रत की आग वो   रहता अपनी जंगें लड़ें हम अपनी जंगें लड़ेंगे हुई है तरक्की उनकी अपनी और हमारी अपनी सड़क पर होंगे तो गीत गाएँगे घर दफ्तर में लैंग्वेज़ इनपुट ठीक है ,   यूनिकोड कैरेक्टर्स हैं ,   प्यार पर्दे पर बरसता रहेगा। कावेरी तुम कहाँ ( अब मान लो कि उन तीन सौ में मैं हूँ ऐमस्टर्डम से मेलबोर्न की उड़ान पर बस छः घंटे और कि पहुँच कर आराम करूँ और कल पर्चा प...

कविता में गाँव - लाल्टू

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कल रात फेसबुक पर मैंने बहस के लिए एक स्टेट्स लिखा था - " गाँव पर लिखी कविताओं में एक जो नास्टेल्जिया होती है वह अच्छी लगती ही है लेकिन मैं इसे अक्सर बहुत सेलिब्रेट नहीं कर पाता कि शहर में जो सुविधाएँ आम और स्वाभाविक मानी जाती हैं उनके गाँव में आ जाने पर दुःख मनाया जाय. यह एक तरह की प्रवृति रही है हिंदी कविता में कि शहर जाने के बाद गाँव की स्मृतियों को वैसे ही चूल्हा, लालटेन, ढिबरी के साथ सुरक्षित रखा जाय और उनके अनुपस्थित मिलने पर दुखी  हुआ जाय. लेकिन जिसे छोड़ के हम आगे निकल आये अपनी बेहतरी के लिए वह भी तो अपनी गति से आगे बढ़ेगा न? क्यों वह उसी युग में क़ैद रहे कि हम छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए उन पुराने सुन्दर दिनों को जी सकें एक चेंज की तरह? " इस स्टेट्स को पढ़कर वरिष्ठ कवि लाल्टू जी ने अपनी तीन कविताएँ उपलब्ध कराईं. हम इसे बहस के लिए असुविधा पर रख रहे हैं. अन्य साथियों से भी इस बहस में काव्यात्मक और वैचारिक बहस आमंत्रित करते हैं.  अहा ग्राम्य जीवन भी  ... शाम होते ही उनके साथ उनकी शहरी गन्ध उस कमरे में बन्द हो जाती है   . कभी - कभी अँधेरी रातों मे...

लाल्टू की कवितायें

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लाल्टू हिन्दी कविता की मुख्यधारा से बाहर रहकर आपरेट करने वाले कवि हैं. 'मुख्यधारा' यानि संस्था, अकादमी, पुरस्कार,यात्रा वाले खेलों की रंगभूमि से अकसर अनुपस्थित. मुख्यधारा यानि दिल्ली-पटना-लखनऊ-भोपाल-इलाहाबाद स्थित मल्लक्षेत्र से अक्सर असम्बद्ध. शायद यही वज़ह है कि समकालीन विचारहीन विमर्शकेन्द्रित शोरगुल के कानफाडू माहौल में भी वह प्रतिरोध की कविता लिखने में मशगूल हैं. एक पुराने साबित कर दिए गए शिल्प में पूरी ताक़त के साथ नयी बात कहने को प्रतिबद्ध. उनकी कविता अक्सर खुरदरी नज़र आती है, भीतर तक चोटिल कर देने वाली. इधर बहुत कोमल, बहुत संभल कर, बहुत बचते-बचाते कविता लिखने की जो 'कला' प्रचलित हुई है, उसके बरक्स लाल्टू और ऐसे कुछ 'पुराने' ढब के कवियों को पढ़ना मुझ जैसे पाठक को 'असुविधा' का सुकून देता है.  लाल्टू जी की तस्वीर उनके फेसबुक पेज से, ब्लॉग की सज्जा के लिहाज़ से फ्लिप की गयी. सो 'सिर्फ तस्वीर में ' जो  दायाँ है उसे बायाँ समझा जाय  दिखना आप कहाँ  ज़्यादा  दिखते हैं ? अगर कोई कमरे के  अन्दर  आपको खाता हुआ देख ले तो ? बाहर खाता हु...