सुवा तुम्हारे मेरे किस्से बहुत सुन चुके संत/मुल्क इलाके की कुछ बातें आज करो प्रिय कंत।
जनकवि गिर्दा की किताब पर महेश चन्द्र पुनेठा का समीक्षात्मक आलेख सोये-सोये साकार नहीं होता कोई सपन ,बैठे-बैठे नहीं होता परिवर्तन एक ग्लानि मन में हमेशा के लिए रह गयी है कि गिर्दा के जीते-जी मैं उनकी कविताओं पर नहीं लिख पाया। एक बार इस संदर्भ में नैनीताल प्रवास के दौरान गिर्दा से बात भी हुई थी। मैंने उनसे आग्रह किया कि क्या मुझे उनकी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएं मिल पाएंगी? उन्होंने मंद-मंद मुस्कान के साथ घर पर आने का आमंत्रण दिया। पर व्यस्तता के चलते संभव नहीं हो पाया। उसके बाद भी एक-दो बार नैनीताल जाना हुआ लेकिन चला-चली में ही। उनकी कविताओं पर लिखने की मेरी इच्छा अधूरी रह गयी। उनकी कविताएं कहीं संकलित होती तो यह काम शायद पहले ही हो जाता। इधर ’पहाड़’ संस्था ने गिर्दा की समग्र रचनाओं को दो जिल्दों में प्रकाशित कर यह स्तुत्यनीय कार्य किया है। ’जैंता एक दिन तो आलो’ गिरीश तिवाड़ी ’गिर्दा’ की इधर-उधर बिखरी हिंदी-कुमाउँनी कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह में उनकी अब तक की उपलब्ध प्रकाशित-अप्रकाशित कविताओं को वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल की सशक्त ...