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बसंत जेटली की कहानी

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                                                      बसंत जी की यह कहानी काफी दिनों से मेरे पास थी. इसे पढ़ते हुए मुझे परसाई याद तो आये लेकिन यह भी लगा की उस शैली में लिखना इतना आसान भी नहीं. शायद उस दर्जे की प्रतिबद्धता अर्जित करना भी उतना आसान नहीं. शायद वक़्त भी वैसा नहीं. इस कहानी में जो 'इंकलाबी' चरित्र आये हैं, दरअसल वे और चाहे जो हों कम्युनिस्ट तो नहीं. वे रातोरात दुनिया बदल देने के सपने देखने वाले मध्यवर्गीय चरित्र हैं जो और कुछ भी कर लें दुनिया नहीं बदल सकते...खैर असल मानी तो आपकी प्रतिक्रिया के होंगे .                                                         ...

दुष्यंत क्यों रक्तबीज हो गए हैं? - बसंत जेटली

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पारम्परिक आख्यानों का कविता में प्रवेश और उनसे नए पर कुछ कहने का प्रयास हिंदी में कोई नई चीज़ नहीं है. मिथक हों या इतिहास, उनके मूल में उस काल की सामाजिक-राजनीतिक अवस्थितियों से निर्मित परिवेश और आदर्श रहते ही हैं. ऐसे में कई बार उनमें भटक जाने, उनकी आभा से दृष्टि के चुंधिया जाने और इस प्रभाव में किसी पुरोगामी कुपथ पर भटक जाने के खतरे भी होते हैं.  बसंत जेटली की यह कविता  अपने कथ्य के लिए एक प्राचीन आख्यान का सहारा लेती है. शकुन्तला-दुष्यंत का आख्यान. लेकिन इस अति-प्रसिद्ध आख्यान की अँधेरी कंदराओं में भटकने की जगह वह इसके द्वारा स्थापित सहजबोध को प्रश्नांकित करने का ज़रूरी काम करती है और इस रूप में हमारे समय पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करती है. पार्श्व में चलते अभिनव शाकुंतलम की गूँज से निर्मित इसकी भाषा का प्रवाह कविता में एक विशिष्ट प्रवाह देता है. बसंत जी के प्रति आभार सहित यह कविता ..  शकुन्तला के प्रश्न  विश्वामित्र के तपभंग को प्रेषित अप्सरा माता के गर्भ से अनचाहे जन्मी थी मै | इसमे कसूर न तुम्हारा था न मेरा, यह अलग बात है कि आज तक बूझ नहीं पा...

बसंत जेटली की कविताएँ

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इस बार असुविधा में वरिष्ठ रंगकर्मी बसंत जेटली की कुछ ताज़ा कविताएँ समय की साज़िश के बाद कुछ भी संज्ञा हो सकती है मेरे और उस नगर के संबंधों की जिसकी दीवारें आँखों में घुले सपनों से आ- आकर टकराती हैं, अपने आप को पहचानने से इनकार कर देता हूँ मैं. शहर से बेतरह नफरत हो जाती है | इस सब से अलग मेरा परिवेश हाथों में सूखे कनेर का गुच्छा लिए ढहते दुर्ग की प्राचीर पर धुंए के छल्ले बनाता रहता है | अन्दर कहीं गहरे दबा विद्रोही चेतना का कोई अंश और गहरे पैठ कर सिर्फ चर्चाएँ करता है, किसी अग्निपक्षी के पंख अपनी ही आग से झुलसते रहते हैं | रक्त भीगे हाथों से घोंघे और सीपियाँ बटोरता एक व्यक्ति, मन भर कर अपने आचरण का रस पी लेने के बाद, रंग-बिरंगे गुब्बारे फोड़ता हुआ किसी गहरे गर्त में कूद पड़ता है | घिर आता है चारों ओर बारूद के महीन कणों सा गहरा कुहासा और मैं शब्दों को अर्थ और अर्थों को शब्द देने की प्रक्रिया में भूल जाता हूँ अपना व्याकरण | सारे वर्तमान को कल्पित यज्ञ में होम कर रक्तबीज आशा की राख में नेवलों की तरह लोटने लगते हैं लोग ...