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भगवत ने लोक की आत्मा से हिंदी को समृद्ध किया -विष्णु खरे

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वरिष्ठ कवि भगवत  रावत पर यह श्रद्धांजलि आलेख   विष्णु खरे जी ने भेजा है...इस  अनुमति के साथ कि ' किसी भी ब्लॉग या पत्र-पत्रिका में प्रकाशित किया जा सकता है  ' तो संभव है यह कुछ और जगहों पर प्रकाशित हुआ हो.  13 सितंबर 1939- 25 मई 2012  हिंदी साहित्य जगत बरसों से वाकिफ था कि भगवत रावत गुर्दे की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे.उनका यह लंबा संघर्ष उनकी ऐहिक और सृजनात्मक जिजीविषा का प्रतीक था और कई युवतर,समवयस्क और वरिष्ठ लेखकों को एक सहारा,उम्मीद और प्रेरणा देता था.पिछले दिनों तो ऐसा लगने लगा था कि उन्होंने रोग और मृत्यु दोनों पर विजय प्राप्त कर ली है.लिखना तो उन्होंने कभी बंद नहीं किया,इधर वे लगातार भोपाल की सभाओं,संगोष्ठियों और काव्य-पाठों में किसी न किसी वरिष्ठ हैसियत से भाग ले रहे थे.उनसे अब उनकी तबीयत के बारे में पूछना चिन्तातिरेक लगने लगा था.जो कई पत्र-पत्रिकाओं में और सार्वजनिक आयोजनों में प्रतिष्ठित कवि और एक हड़काऊ किन्तु स्नेहिल बुजुर्ग की तरह सक्रिय हो,उसकी मिजाजपुर्सी एक पाखण्ड ही हो सकती थी.कम से कम मैं निश्चिन्त था कि अभी कुछ वर्षों तक भगवत ...