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सीरिया से कविताएँ - मराम अल-मासरी

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सीरिया विश्व मानचित्र पर एक घाव सा है या बेहतर होगा यह कहना कि सीरिया मनुष्यता की देह पर एक घाव सा है. मराम अल-मासरी की कविताएँ उन घावों और खरोंचों को उनकी पूरी तल्खी के साथ अपनी कविताओं में ले आती हैं तो देवेश ने अपने अनुवादों से उन्हें हिन्दी के पाठक तक लाते हुए कहीं किसी असर को कम नहीं होने दिया है.   देवेश के ये अनुवाद दख़ल द्वारा प्रकाशित मराम की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन "मांस , प्रेम और स्वप्न" से लिए गए हैं.   किताब अमेज़न पर उपलब्ध है. यहाँ क्लिक करें मंगाने के लिए  एक अरब माँ का अपने बेटे को पत्र क्योंकि, जो अब और नहीं सह सकते आज़ादी उनके सीने के भीतर हृदय के तारों का विस्फोट है क्योंकि, यह बहादुर नाविकों के लिए मत्स्यकन्याओं का गाया गीत है     क्योंकि आज़ादी सबसे ख़ूबसूरत है देवी है बुद्धिमानों की साहसियों का प्यार है मैं उसके प्रेम में पड़ गयी हूँ क्योंकि स्वर्ग है यह अग्नि का जो भभक उठती है एक हड़ताल से ठीक उसी तरह जैसे कविता शुरू होती है एक शब्द से ठीक उसी तरह जैसे प्रेम दमक उठता है एक चुम्...

मुझे मरने को गौरैया सी मौत चाहिए : देवेश की कविताएँ

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देवेश की ये कविताएँ पहल के ताज़ा अंक में आई हैं. हिंदी के अराजक समकालीन परिवेश में अपनी उम्र के कई  सेलीब्रेटेड कवियों के बरक्स देवेश लगभग बज़िद होकर अपने कवि होने को कविता के बाहर कोई ख़ास महत्त्व नहीं देते. आयोजनों और सूचियों से अनुपस्थिति आलोचकों और आयोजकों की ही नहीं जैसे उनका ख़ुद का चयन है. अपने विषय की तरह उसने अपने लिए भी परिधि ही चुनी है ताकि केंद्र की और अंगुलियाँ उठाने का अधिकार न छिन सके.  विदर्भ के किसानों से लेकर कश्मीर की गलियों तक फैले उसके कविता संसार में मनुष्यता के प्रति एक समझौताहीन प्रतिबद्धता स्पष्ट है तो पंक्तियों के बीच पढ़ते आप संवेदना के उन स्रोतों की तलाश कर सकते हैं जो कवि को लिखने के लिए ज़रूरी ताक़त उपलब्ध कराती हैं.  मै घूम-घूम कर लाशें देखता हूँ  1  कौन-सा होता है वह क्षण जब तुम महसूस करते हो अपना इत्यादि होना? वक़्त के किस पहर तुम्हारे पाँव कांपते हैं किसी आशंका से? किस घड़ी में तुम तय करते हो अपने जीवन का अंत? कब तुम्हारी रीढ़ में उठता है तेज़ दर्द? ठीक उसी क्षण, वक़्त के उसी पहर-उसी घड़ी जन्मता है कुछ मृत्यु जितना भव्य,...

यह किसकी आत्महत्या है- देवेश की कविता

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देवेश कविता लिख तो कई सालों से रहा है लेकिन अपने बेहद चुप्पे स्वभाव के कारण प्रकाश में अब तक नहीं आ सका. आज जब प्रतिबद्धता साहित्य में एक अयोग्यता में तब्दील होती जा रही है तो उसकी कवितायें एक ज़िद की तरह असफलता को अंगीकार करती हुई आती है. उसकी काव्यभाषा हमारे समय के कई दूसरे कवियों की तरह सीधे अस्सी के दशक की परम्परा से जुड़ती है और संवेदना शोषण के प्रतिकार की हिंदी की प्रतिबद्ध परम्परा से. इस कविता में उसने विदर्भ के गाँवों की जो विश्वसनीय और विदारक तस्वीर खींची है वह इस विषय पर लिखी कविताओं के बीच एक साझा करते हुए भी एकदम अलग है. इस मित्र और युवा कवि का स्वागत असुविधा पर. जल्द ही उसकी कुछ और कवितायेँ यहाँ होंगी.  यह किसकी आत्महत्या है (एक) श्मशान का जलता अँधेरा चीखता है बहुत तेज़ शवगंध से फटती है नाक धरती की इन सबसे बेपरवाह डोम , सीटी बजाता , झूमता , चुनता है हड्डियाँ और नदी में डाल देता है.. डोम राजा है शव प्रजा नदी अवसाद में है.. (दो) बहुत दूर से चली आती है बांसुरी की आवाज़ सनकहवा बांसुरी बजाता जा रहा है भीड़ मारती है पत्थर , ...