अक्षत सेठ की दो कविताएँ
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मीडिया स्टडीज़ में पीएचडी कर रहे अक्षत उन अर्थों में तो कवि एकदम नहीं हैं, जिन्हें सोशल मीडिया विस्फोट ने परिभाषित किया है. मसलन आप उनकी फेसबुक टाइमलाइन पर अक्सर कविता नहीं पाएँगे, साहित्य भी नहीं के बराबर. लेकिन अपने एक्टिविस्ट जीवन के भीतर उन्होंने उस कवि को लगातार जीवित रखा है जो बाहर ही नहीं भीतर की तलाश में भी विकल रहता है. इन दो कविताओं को पढ़ते हुए आप उनकी कविता की समझ में विन्यस्त जीवन की समझ के साथ-साथ एक बेचैन युवा की मुसलसाल यात्राओं की भी शिनाख्त कर पाएँगे. एक मिनट का मौन और वे कहते हैं ' अब सब उनके सम्मान में एक मिनट का मौन धारण करेंगे ' एक मिनट का मौन न जाने क्यों कई सारी आवाज़ें इस एक मिनट के मौन में ही सुनाई देने लगती हैं जैसे अर्सों से खड़ी थीं प्रतीक्षारत क़तारों में लगी कान दिए कि कोई अदृश्य ढाल दरक जाए और फिर एक के बाद एक अपने हंगामों से भंग करतीं इस क्षण की गंभीरता , पवित्रता कि वे कौन हैं जिनके लिए यह मौन है उनके बोलने पर ऐसी सी होती थी क्या अनुगूँज ? नहीं दर्ज की पर लगता है ऐसी ही ह...