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प्रेम लहरी : मिथक, इतिहास और किस्सागोई

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प्रेमलहरी मुग़ल शहज़ादी और एक कवि के प्रेम का आख्यान है. आप इसे असफल प्रेम का आख्यान भी कह सकते हैं लेकिन प्रेम तो अपने होने में ही सफल हो जाता है. एक स्पर्श में, एक चुम्बन में, एक भाव में... उसकी असफलता और सफलता के पैमाने किसी खेल की जीत-हार से कैसे हो सकते हैं? त्रिलोक जी ने उस कथा को इतिहास और लोक स्मृति के सहारे जीवित कर एक बार और "सफल" कर दिया है. पढ़िए उसी से एक हिस्सा  नीर-भरी दुःख की बदरी अल्हड़ लौंगी ने जब जवानी की दहलीज़ पर पैर रखा तो उसके कदम भोग-विलास की महकती दुनिया की ओर मुड़ने के  बजाय कल्पना और भावुकता के स्वछन्द आकाश की ओर बढ़ चले। वेदना के पंखों ने उसमें उड़ान की तरंग भरी और  लौंगी उड़ चली बेलौस शायरी के खुले आसमान में। राजसी दंभ की दुनिया से नीचे उतर लौंगी ने मामूली लोगों के सुख-दुःख और सरोकारों को अपनी कविता का विषय बनाया। उन्हें और चटकार बनाने के लिए उसने कुदरत के कारनामों को अपनी कविता में रूपक की तरह प्रयोग किया। जानवरों की जिंदगी की मिसाल देकर उनमे    मानवीय भावनाओं का रंग भरा। वह अक्सर गाती गुनगुनाती रहती। आमो...