मुझे मरने को गौरैया सी मौत चाहिए : देवेश की कविताएँ
देवेश की ये कविताएँ पहल के ताज़ा अंक में आई हैं. हिंदी के अराजक समकालीन परिवेश में अपनी उम्र के कई सेलीब्रेटेड कवियों के बरक्स देवेश लगभग बज़िद होकर अपने कवि होने को कविता के बाहर कोई ख़ास महत्त्व नहीं देते. आयोजनों और सूचियों से अनुपस्थिति आलोचकों और आयोजकों की ही नहीं जैसे उनका ख़ुद का चयन है. अपने विषय की तरह उसने अपने लिए भी परिधि ही चुनी है ताकि केंद्र की और अंगुलियाँ उठाने का अधिकार न छिन सके. विदर्भ के किसानों से लेकर कश्मीर की गलियों तक फैले उसके कविता संसार में मनुष्यता के प्रति एक समझौताहीन प्रतिबद्धता स्पष्ट है तो पंक्तियों के बीच पढ़ते आप संवेदना के उन स्रोतों की तलाश कर सकते हैं जो कवि को लिखने के लिए ज़रूरी ताक़त उपलब्ध कराती हैं. मै घूम-घूम कर लाशें देखता हूँ 1 कौन-सा होता है वह क्षण जब तुम महसूस करते हो अपना इत्यादि होना? वक़्त के किस पहर तुम्हारे पाँव कांपते हैं किसी आशंका से? किस घड़ी में तुम तय करते हो अपने जीवन का अंत? कब तुम्हारी रीढ़ में उठता है तेज़ दर्द? ठीक उसी क्षण, वक़्त के उसी पहर-उसी घड़ी जन्मता है कुछ मृत्यु जितना भव्य,...