संदेश

कुलदीप कुमार लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुलदीप कुमार की कविताएँ

चित्र
कुलदीप कुमार एक इतिहास मर्मज्ञ पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं और संगीत में उनकी गहरी रुचि से ख़ासतौर पर अंग्रेज़ी अख़बारों के पाठक बख़ूबी परिचित हैं. लेकिन यह कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने शुरुआत एक कवि के रूप में की थी और सत्तर के दशक में प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई थीं. लम्बे अंतराल के बाद 'नया ज्ञानोदय' के ताज़ा अंक में आई इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि इस वक्फे में उन्होंने शायद छपना छोड़ा था लिखना नहीं. किताबें छपवाने के मामले में बेहद आलसी कुलदीप अगर अपना आलस्य त्यागते तो हमें राजनीति और संगीत पर कुछ बेहतर किताबें ही नहीं बल्कि कविताओं का भी एक शानदार संकलन पढने को मिलता. इस आग्रह के साथ नया ज्ञानोदय से ये कविताएँ साभार प्रस्तुत हैं.    शोकसभा   उस पूरे कमरे में   शोक ही शोक फैला था   लगता था फर्श पर आंसुओं की बाढ़   अभी-अभी आकर गयी है   सभी शोक प्रकट कर रहे   थे   जो गया   उसके लिए नहीं   जो रह गया   उसके लिए   जाना   वह जो चला गया ...

स्मृति - दूधनाथ सिंह

चित्र
कुलदीप कुमार दूधनाथ सिंह से पहला परिचय तब हुआ जब किशोरावस्था के उत्तरार्ध में मैंने उनकी रचनाएं पढ़नी शुरू कीं। आज भी एक कविता पंक्ति दिमाग में कौंधती रहती है हालांकि याद नहीं कि उनकी किस कविता में थी--- "लिफ्ट के अँधेरे में ब्रेन हैमरेज हो रहे हैं”। तारीफ करने में कंजूस उपेन्द्रनाथ अश्क उन्हें उनकी पीढ़ी का सर्वाधिक प्रतिभाशाली लेखक यूं ही नहीं मानते थे। 1973-74 में उनसे मुलाक़ात भी हो गयी और मुलाकातों का यह सिलसिला पिछले साल तक चला जब अचानक इलाहाबाद के कॉफ़ी हाउस में वे मिल गए। इन मुलाकातों के बीच लंबा अंतराल होने के बावजूद उनकी गर्मजोशी, आत्मीयता और स्नेह में कोई कमी नहीं आयी। उनके बारे में अनेक लोगों की अनेक किस्म की राय होगी, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा आम जन के पक्ष में खड़े लेखक के रूप में पाया---जीवन में भी और लेखन में भी। यह अकारण ही नहीं है कि इलाहाबाद में उनकी अंतिम यात्रा में समाज के विभिन्न तबकों से जुड़े हजारों लोगों ने भाग लिया।  दूधनाथ सिंह ने विभिन्न तेवरों के साथ बहुत-सी कवितायेँ लिखीं---लोहिया से इंदिरा गाँधी तक की यात्रा कर चुके प्रसिद्द साहित्यकार...