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रोकैया सखावत होसेन के बहाने स्त्रीवाद पर एक नोट

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रति सक्सेना   रोकैया सखावत होसेन एक समाजसुधारक के रूप में हमारे जेहन में हैं , लेकिन उनके उपन्यासों को पढ़ने का मौका मुझे अभी ही मिला। इतने दिनों क्यों नहीं ... मैं सफाई नहीं देना चाहती कि मैं कि बहुत सालों से मैंने उपन्यासों , कहानियों को हाथ लगाना बन्द कर दिया था। , इस वक्त मैं खुश हूँ कि   मुझे यह रोकैया बेगम का उपन्यास पढ़ने को मिला। रोकैया बेगम के 1905 में छपा उपन्यास Sultana's Dream, बिना पढ़े भी अपनी कहानी बता देता है। रोकैया बेगम की स्त्रीवादी छवि बिना पढ़े ही यह समझ दे देती है कि सुल्ताना का सपना स्त्री के अधिकार के समबन्ध में होगा। मजे की बात है कि यह उपन्यास अंग्रेजी में लिखा गया था , जबकि बेगम अधिकतर बंगला में लिखती थी। यह उपन्यास इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि इसमें स्त्री के वर्चस्व को स्वीकारा गया है , बल्कि इसलिए है कि यह घोरवादी कल्पना एक बेहद सहज लकीर के साथ चलती है। सुल्ताना अपने सपने में एक ऐसे राज्य ...