नूर ज़हीर की कहानी "चकरघिन्नी" : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न
आज जब ट्रिपल तलाक़ पर देश भर में बहस चल रही है तो सबसे ज़रूरी पक्ष है उन स्त्रियों का जो इस कुप्रथा का सीधा दंश झेलती हैं. शरीयत की बहसों से आगे यह प्रथा एक स्त्री के जीवन को पुरुष के समक्ष दोयम दर्ज़े का ही नहीं बनाती बल्कि देह और जीवन से उसका अधिकार पूरी तरह छीन लेती है. प्रतिष्ठित कहानीकार नूर ज़हीर की यह कहानी इस दर्द को रेशा-रेशा खोलती है. यहाँ यह कहानी इन्द्रप्रस्थ भारती पत्रिका से साभार. ________________________________ वो दुबकी हुई एक कोने में बैठी थी, लेकिन ज़किया को बराबर यह एहसास हो रहा था की वह कुछ कहना चाह रही है। वैसे महिलाओं का जमघट हो और सभी एक साथ बात न कर रही हों, ऐसा कहाँ संभव है। सभी लगातार कैएं कैएं कर रही थीं और दो तीन बार ज़किया को उन्हें डांट कर, स्कूल के क्लास के बच्चों की तरह एक एक करके बुलवाना पड़ा था। लेकिन जब भी उसपर नज़र जाती वो हलके से मुस्कुरा कर नीचे देखने लगती। उसके दोनों तरफ बैठी औरतें कोहनी मार कर "बोलो न! बोलती क्यों ...