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राशिद अली की एक गजल बंगाल में 'लेफ्ट' की हार को समर्पित

कहीं रतजगों के वो बेनवा कहीं ज़ब्ते गम का हिसाब है वो जो ख्वाब था किसी और का किसी और का ही वो ख्वाब है वो जो लाम था किसी दौर का वो जो काफ था किसी और का वो न लफ्ज़ में ही सिमट सका न ही जेरे शेरे सहाब है जिन्हें नाज़ था किसी माह पे जिन्हें शर्फ़ था किसी ताब पे किसी शब् गज़ीदा सहर तले वो तो कुहना मशकी अताब है क्या गिरिफ्ताज़न था वो फलसफा क्या तबीब था वो मरीज़े नौ किसी बादा चश का नसीब था या की मुफलिसी का निसाब है वो करीब थे कई और दिन, कई और दिन वो रकीब थे क्या नकाहतों का ये इश्क था या कनाअतों का शबाब है किस बदमज़ा से मक़ाम पे कहीं छोड़ आया था वो चारागर चलो हाय कुछ तो सही हुआ जो ग़लत हुआ वो सवाब है ये जम्हूर है या या तिलिस्म है जो फंसा है धंस के फंसा रहे कहीं खाके मुर्दा गिरास है कहीं तिशनगी का सेराब है मुश्किल शब्दों के हिन्दी-अंग्रेजी मानी ज़ब्ते गम -- Not expressing the pain (दर्द को प्रकट न करना) लाम-- an alphabet of Urdu, it can also mean la of laal. (उर्दू वर्णमाला का...