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अरुण श्री की कविताओं पर राहुल देव

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मेरा अभीष्ट देवत्व नहीं है ! आ ज जबकि कविता बहुतायत में रची जा रही है ऐसे में कविता के कुछ प्रतिनिधि युवा स्वरों को चिन्हित करना बेहद कठिन काम है | वैसे भी निरंतर विकासशील प्रवृत्तियों पर बात करना अपेक्षाकृत जोखिमपूर्ण रहता है | फिर भी कविता के युगीन स्वरुप के निर्धारण के लिए कदम उठाये जाने चाहिए, ऐसे छिटपुट प्रयास हमें कभी-कभार दिखाई भी पड़ते हैं | संचारक्रांति और सोशलमीडिया के बढ़ते वर्चस्व से इधर कविता के लिखने-पढ़ने, छपने-छपाने में तेज़ी आई है जिसने कविता की गुणवत्ता को भी पर्याप्त रूप से प्रभावित किया है | ज्यादातर कवियों के लिए कविता लिखना अब भी एक शगल है | सोशल मीडिया पर हर तीसरा आदमी अपने को कवि मानता है | सार्थक लेखन करने वाले समर्पित साहित्यकार कम ही हैं | ऐसे दौर में कुछ ऐसे भी नाम हैं जिन्होंने निरंतर अच्छे लेखन से ध्यानाकर्षित किया है | अरुण श्री मेरे लिए उन्हीं नामों में से एक हैं | इससे पहले अरुण पत्र-पत्रिकाओं, ब्लोग्स आदि में प्रकाशित होते रहें हैं | चार संयुक्त काव्य संकलनों में उनकी सहभागिता रही है | साल 2015 के प्रारंभ में आया कविता संग्रह ‘मैं देव न ह...

पाठक का कोना : आत्मारंजन के नए संकलन पर राहुल देव

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आज से असुविधा पर हम "पाठक का कोना" नाम से एक नया स्तम्भ शुरू कर रहे हैं. इस स्तम्भ में कोई भी पाठक हाल के दिनों में जो कुछ पढ़ रहा है उस पर एक पाठकीय टिप्पणी भेज सकता है जो हम हर शुक्रवार को पोस्ट करने की कोशिश करेंगे. आप सबका स्वागत है... समय से संवाद करती कवितायेँ युवा कवि आत्मा रंजन का सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘पगडण्डीयां गवाह हैं’ इन दिनों मेरे हाथ में है | आत्मा रंजन से मेरा संपर्क फेसबुक के जरिये हुआ था | जहाँ उनसे आत्मीय संवाद के दौर में मैं उनके कविरूप से भली भांति परिचित हुआ | इस कविता संग्रह में कुल 56 कवितायेँ संग्रहीत हैं | संग्रह की शुरुवात ‘कंकड़ छांटती’ शीर्षक कविता से होती है जोकि स्त्री विमर्श पर संतुलित शब्दों में गहरे अर्थबोध को सामने लाती कविता है | जीवन में स्त्री की उपस्थिति पर कवि का दर्शन घनीभूत भाव व सौन्दर्य को व्यक्त करता है | आत्मा रंजन अपनी कविता में अन्यान्य कवियों की तरह स्त्री के दैहिक अथवा स्थूल रूप का चित्रण मात्र नहीं करते न ही पहले से मालूम समस्याओं को घिसे-पिटे शब्दों में प्रस्तुत करते हैं बल्कि वह हमें एक व...