अमित उपमन्यु की ताज़ा कविता
अमित की कविताएँ आप पहले भी असुविधा पर पढ़ चुके हैं. लेकिन यह कविता अपनी भाषा और अपने बनक में पिछली कविताओं से काफी अलग है. बल्कि यों कहूँ कि यह आज में ज़्यादा विन्यस्त है. यह सहज भी है कि जिस तरह की घटनाएँ लगातार समाज में चल रही हैं उसमें एक संवेदनशील युवा उद्वेलित हो, ज़रूरी अक्सर यह है कि यह उद्वेलन तात्कालिकता के घेरे से बाहर निकले और एक मानीखेज़ स्टेटमेंट में बदल जाए. अमित की यह कविता ऐसा करने में सफल रही है. Mary Frank की पेंटिंग यहाँ से साभार अमित उपमन्यु सौ सन्नाटों की रात 1. दो लोग एक दूजे से पीठ किए बैठे हैं दो अट्टहास कर रहे हैं जो दो घुप्प अंधेरी रात में कविता-पाठ कर रहे हैं चार लोगों का कहना है बकवास कर रहे हैं चार लोग शोकचक्र को कांधे पर उठाये घूमते हैं चार उसके शोक में ताड़ी पीकर झूमते हैं साहब का फिर आना मुमकिन नहीं तो इन आठ को अग्रिम श्रद्धांजलि दे रहे हैं मुर्दों में मिले ज़िंदों को याद करके सूखी-सूखी हिचकियां ले रहे हैं साहब रोना भी चाहते थे पर रोना आया नहीं क...