संदेश

अमित उपमन्यु लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अमित उपमन्यु की ताज़ा कविता

चित्र
अमित की कविताएँ आप पहले भी असुविधा पर पढ़ चुके हैं. लेकिन यह कविता अपनी भाषा और अपने बनक में पिछली कविताओं से काफी अलग है. बल्कि यों कहूँ कि यह आज में ज़्यादा विन्यस्त है. यह सहज भी है कि जिस तरह की घटनाएँ लगातार समाज में चल रही हैं उसमें एक संवेदनशील युवा उद्वेलित हो, ज़रूरी अक्सर यह है कि यह उद्वेलन तात्कालिकता के घेरे से बाहर निकले और एक मानीखेज़ स्टेटमेंट में बदल जाए. अमित की यह कविता ऐसा करने में सफल रही है.  Mary Frank की पेंटिंग यहाँ से साभार  अमित उपमन्यु  सौ सन्नाटों की रात   1. दो लोग एक दूजे से पीठ किए बैठे हैं दो अट्टहास कर रहे हैं जो दो घुप्प अंधेरी रात में कविता-पाठ कर रहे हैं चार लोगों का कहना है बकवास कर रहे हैं चार लोग शोकचक्र को कांधे पर उठाये घूमते हैं चार उसके शोक में ताड़ी पीकर झूमते हैं साहब का फिर आना मुमकिन नहीं   तो   इन आठ को अग्रिम श्रद्धांजलि दे रहे हैं   मुर्दों में मिले ज़िंदों को याद करके सूखी-सूखी हिचकियां ले रहे हैं   साहब रोना भी चाहते थे पर रोना आया नहीं क...

अमित उपमन्यु की दो कविताएँ

चित्र
Nia C की पेंटिंग यहाँ से  अमित की कविताएँ आप असुविधा पर पहले भी पढ़ चुके हैं। भीड़ से दूर रहकर बहुत कम लिखने और कविता से बाहर दूर दूर तक भाषा और विषय की तलाश में भटकने वाले अमित की कविताएं एक सघन प्रेक्षक की कविताएं हैं जिनमें अपने समय से एक बहुत आत्मीय संवाद संभव होता है।  खोये हुए हाथ से डोर छूटते ही गुब्बारे चल देते हैं अपनी यात्रा पर अनंत की ओर... मैं देखता रहता हूँ उनको बढ़ता हुआ मेरी विस्मृति की ओर कुछ शब्द समंदर में बहायी गयी बोतलबंद पहचानों की तरह धीरे-धीरे ज़बानों से दूर चले जाते हैं. आखिरी बचे कुछ सौ लोगों के साथ एक भाषा चुपचाप बैठी घूरती रहती है अपनी कुछ सौ कदम दूर खड़ी मौत को. टी.बी. की डूबती खांसी, कैंसर के बुझते चेहरे भी किसी क्रॉस-वर्ड पहेली की तरह बस एक तारीख की ओर इशारा करते हैं पर कई लोग बस यूँ हीं कहीं चले जाते हैं एकदम और फिर खंज़र की तरह कलेजे में बार-बार उतरते हैं उनकी नेम-प्लेट के कोने उनके फोन-नंबर के सारे विषम अंक और फोटो में उनकी खिलखिलाती आँखें जो बच्चे निकले थे सुबह स्कूल या खेल के मै...

अमित उपमन्यु की कविताएँ

चित्र
आज के आपाधापी वाले युवतर कविता संसार में अमित अपनी तरह का अलमस्त कवि है. संगीत, रंगमंच, खेल, विज्ञान और फ़िल्मों में अपनी गहन रूचि के बीच उसकी कवितायें तमाम स्रोतों से अपने पाथेय ग्रहण करती बहुत तफसील से भीतर और बाहर की दुनिया की यात्रा करती हैं. इन कविताओं को पढ़ते हुए आप देखेंगे कि वह अर्थ नहीं अभिप्राय का कवि है और अभिप्रायों में अव्यक्त को व्यक्त करने की मुश्किल कला उसने बहुत शुरुआत में सीख ली है. न यहाँ प्रेम का कोई कोरा भावुक प्रलाप है और न ही सैद्धांतिक रुक्षता से भरा अतिकथन. कुछ पत्रिकाओं और कई ब्लाग्स में छप चुके अमित की कवितायें असुविधा पर आप पहले भी पढ़ चुके हैं. इस सीरिज के साथ अमित को ढेरों शुभकामनाएं. इस पोस्ट के बाद मैं कुछ और बेहतर युवा कवियों की कविताएँ लगातार पोस्ट करने की कोशिश करूँगा. गति के नियम (एक) मैं साथ घूमती पृथ्वी की सांसों में घुल गया हूं अमित उपमन्यु  पर्वतों की अनंत ऊँचाई... महासागर की नीम गहराई... समगति हो विसर्जित हुआ मेरा वेग उसके व्योम में थम गये हम एक-दूसरे में स्पर्श की महीन ऊष्मा होकर पृथ्वी के गर्भ में एक फूल बोय...

अमित उपमन्यु की ताज़ा कवितायें

चित्र
अमित की कवितायें आप पहले भी असुविधा पर पढ़ चुके हैं. इन दिनों वह मुंबई में है और फिल्म लेखन के क्षेत्र में काम कर रहा है. अपनी शुरूआती कविताओं में उसने जो उम्मीदें जगाई थीं, इन कविताओं को पढ़ते हुए वह उन्हें पूरा करने की दिशा में मेहनत करता दीखता है. इन कविताओं में बुनावट तो सघन हुई ही है, साथ में वह जिस तरह रोज़ ब रोज़ के जीवन से लेकर इतिहास, विज्ञान और तकनीक से अपने बिम्ब लेकर आता है और जिस तरह उन सबको एक मानीखेज़ वाक्य में तब्दील कर देता है, वह एक कवि के रूप में उसकी ताक़त का एहसास कराता है. सिनेमा से प्रत्यक्ष संपर्क ने भी उसकी भाषा और दृष्टि को संपन्न किया है .  पेंटिंग यहाँ से साभार  भ्रम झील की सतह पर बर्फ की पतली सी जमी हुई परत … सतह के नीचे से मुझे घूरती एक धुंधली देह … हम दोनों एक साथ एक ही बिंदु पर सतह को छूते हैं हमारी लालसाओं के ह्रदय सम्पाती हैं सतह के उस एक बिंदु पर जिस पर हमारे अचरज मछली हो तड़प रहे हैं. सतह, जोएक ठोस भ्रम है हम दो कैदी एक-दूजे के भ्रम में पानी पर फेंके गये पत्थर की तरह मैं दो बार खुद से टकराता हूँ तीसर...