संदेश

आलेख लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लीलाधर मण्डलोई की कविता "अमूर्त" पर सुमन केशरी

चित्र
कविताओं में जीने वालीं सुमन जी ने इधर उन्होंने कोई एक कविता चुनकर उस पर विस्तार से लिखना शुरू किया है जो हिन्दी की आत्मग्रस्ति से समीक्षाग्रस्ति  तक सिमटी दुनिया में अनूठा सा काम है. चाहूँगा इस आपाधापी और कमेन्ट-लाइक की भागदौड़ से आगे ज़रा ठहर कर पढ़ा जाए. लेख के साथ लगे सभी चित्र कवि लीलाधर मण्डलोई जी के कैमरे से ------------------------------ अमूर्त - बेहद की हदों के ख्वाब देखने की लालसा   तथा हद में बेहद को देखने का प्रयास   ( लीलाधर मंडलोई की कविता “ अमूर्त ” को पढ़ते हुए ) अमूर्त जो होता है विसर्जित मैं लाता हूँ स्मृति में कोई बड़ा ख्याल नहीं है भीतर मैं बहुत छोटी चीजों से बनाता हूँ अपनी इक जुदा दुनिया जिस पर निगाह जाना कम हो जाता रहा है मैं देखता हूँ वहाँ और इक पत्ती में अमूर्त के भीतर भी होता है अमूर्त बहोत इक पूरा ‌ ब्रह्मांड विस्मय यह जो अदेखा अद्भुत है आधार है मेरी कला का आधा - अधूरा बिन पहचाना बिखरा आस - पास बिना किसी नाम के उसे ...