मैं जीवित रहूँगी सदा प्रेम करने वालों की यादों में दुःख बनकर
पिछले दिनों की घटनाएं पढ़ते हुए मुझे हिंदी की महत्वपूर्ण कवि सविता सिंह के संकलन 'नींद थी और रात थी' की कुछ कवितायें बार-बार याद आती रहीं. बलात्कार जैसा विषय अभी हाल तक हमारी सार्वजनिक बातचीत ही नहीं साहित्यिक परिवेश से भी बहिष्कृत रहा है, हालांकि वह जीवन से अनुपस्थित कभी नहीं रहा. मानवता के प्रति इस सबसे क्रूर अपराध को गोपन रखना ही सिखाया गया उन्हें भी जो इस भयावह अनुभव से गुज़र जीवन भर घायल बने रहने को अभिशप्त हुईं. अजीब विडम्बना है कि इस पितृसत्तात्मक समाज ने पीड़ित को अपराधी और अपराधी को गर्वोन्मत्त में तब्दील कर दिया. सविता सिंह की 'ख़ून और ख़ामोशी' तथा 'शिल्पी ने कहा' जैसी कवितायें इस वर्जित विषय पर छायी ख़ामोशी को तोड़ती तो हैं ही साथ में प्रतिरोध का एक स्वर भी बुलंद करती हैं. 'क्यों होती हो उदास सुमन' जैसी कविता नैराश्य के गहन अन्धकार में ख़ुशी की राह ही नहीं दिखाती बल्कि 'प्रेम एक बार होता है' या 'प्रेमी या पति द्वारा परित्यक्त महिला के जीवन में ख़ुशी की कोई जगह नहीं' जैसे मिथक को भी ध्वस्त करती है और 'याद रखना नीता...