इनटू द वाइल्ड : युवा का जनून
सिनेमा एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी समझ मुझे बेहद कम है. कारण कई हो सकते हैं लेकिन यह एक ऐसी चीज है जिसका अफ़सोस मुझे हमेशा रहा है. तमाम दोस्तों ने इस अफसोस से बाहर निकालने की कोशिश की है और इन दिनों कुछ फ़िल्में देख भी रहा हूँ...पर कुछ बात बनती नज़र नहीं आती. शायद यही वज़ह हो कि असुविधा पर अभी तक फिल्मों पर कुछ नहीं आया. अब इन टू द वाइल्ड पर लिखे डा विजय शर्मा के आलेख से यहाँ जो सिलसिला शुरू हुआ है, उम्मीद है उसमें कुछ और कड़ियाँ जुड़ेंगी. कुछ फ़िल्में इतनी सघन संवेदना संप्रेषित करती हैं कि आप उन्हें एक बार में पूरी नहीं देख सकते हैं। अगर सिनेमा हाल में बैठे हैं तो शायद आप आँख बंद कर लेंगे या फ़िर सिर झुका कर कुछ दृश्यों के समाप्त होने का इंतजार करेंगे। अब जबकि घर में बैठ कर फ़िल्म देखने की सुविधा है और रिमोट कंट्रोल आपके अपने हाथ में होता है जब भी ऐसी गहन भावनापूर्ण फ़िल्म देख रहे होते हैं बटन दबा कर फ़िल्म रोक सकते हैं। थोड़ा विराम देकर पुन: देख सकते हैं। ये बातें मैं कुछ फ़िल्म देखते समय हुए अपने अनुभवों के आधार पर लिख रही हूँ। ‘ लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल’,...