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काव्य-चित्त का परिष्कार और विस्तार: उमेश चौहान का कवि-कर्म

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 कल हमने अपने प्रिय मित्र, सक्रिय कवि और बेहतरीन इंसान उमेश चौहान जी को खो दिया...यह क्षति इतनी निजी है कि उसकी भरपाई असंभव है और इतनी सार्वजनीन कि साहित्य जगत में लम्बे समय तक महसूस की जायेगी. उनके कवि कर्म की पड़ताल करता उनके अभिन्न मित्र और ख्यातिलब्ध आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव का यह आलेख चौहान साहब को श्रद्धांजलि स्वरूप.  जितेन्द्र श्रीवास्तव तीन दशकों से लगातार कविताएं और गीत लिख रहे वरिष्ठ कवि उमेश चौहान के कवि-कर्म का विस्तार अवध से लेकर सुदूर केरल तक है। उन्होंने मलयालम की कविताओं के   हिन्दी में और हिन्दी की कविताओं को ¨ मलयालम में अनूदित कर दोनों भाषाओं के काव्य परिसर को विस्तृत और उदार बनाया है। उमेश चौहान के विषय में यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि उन्होंने एक ऐसे समय में जब हिन्दी आलोचना में गीत विधा को अपेक्षित महत्व प्राप्त नहीं है तब भी बिना किसी हिचक के पहले-पहले वर्ष 2001 में अपना गीत संग्रह ‘ गाठँ में बाँध लूँ थोड़ी चाँदनी ’ को ही प्रकाशित कराया । कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अपनी रचनाशीलता के प्रति गहरे विश्वास का सूचक है। एक कवि गी...