किस्सागोई करती आँखें - प्रदीप कान्त
प्रदीप कान्त इधर की हिंदी ग़ज़ल के एक ज़रूरी युवा चेहरे हैं. उनके यहाँ देसज बिम्बों से बनी एकदम सहज भाषा में बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के बड़ी बात कह देने का जो शऊर है, वह पहली नज़र में ही बड़ी मुश्किल से हासिल किया हुआ और साधा हुआ नज़र आता है. अभी उनकी पहली किताब 'किस्सागोई करती आँखें' बोधि प्रकाशन, जयपुर से छपी तो एक कापी उन्होंने मुझे भी उपलब्ध कराई. उसी किताब से कुछ गजलें. किताब हिंदी में सस्ती किताबों के प्रकाशन के लिए प्रतिबद्ध भाई माया मृग से mayamrig@gmail.com पर मेल कर मंगवाई जा सकती है. एक बरखा में मुस्काई नदिया जी भर आज नहाई नदिया बिटिया हँसी तो खिली फ़ज़ा मरूथल में इठलाई नदिया अपनी ज़ुल्फ़ें खोल , झटक लो क्यूँ इनमें उलझाई नदिया झुलसे पाँव धूप में जब जब पत्थर पर तर आई नदिया तपता सूरज टहले ऊपर मगर कहाँ सुस्ताई नदिया आँख तरेरी पत्थर ने जब ...