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सीरिया से कविताएँ - मराम अल-मासरी

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सीरिया विश्व मानचित्र पर एक घाव सा है या बेहतर होगा यह कहना कि सीरिया मनुष्यता की देह पर एक घाव सा है. मराम अल-मासरी की कविताएँ उन घावों और खरोंचों को उनकी पूरी तल्खी के साथ अपनी कविताओं में ले आती हैं तो देवेश ने अपने अनुवादों से उन्हें हिन्दी के पाठक तक लाते हुए कहीं किसी असर को कम नहीं होने दिया है.   देवेश के ये अनुवाद दख़ल द्वारा प्रकाशित मराम की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन "मांस , प्रेम और स्वप्न" से लिए गए हैं.   किताब अमेज़न पर उपलब्ध है. यहाँ क्लिक करें मंगाने के लिए  एक अरब माँ का अपने बेटे को पत्र क्योंकि, जो अब और नहीं सह सकते आज़ादी उनके सीने के भीतर हृदय के तारों का विस्फोट है क्योंकि, यह बहादुर नाविकों के लिए मत्स्यकन्याओं का गाया गीत है     क्योंकि आज़ादी सबसे ख़ूबसूरत है देवी है बुद्धिमानों की साहसियों का प्यार है मैं उसके प्रेम में पड़ गयी हूँ क्योंकि स्वर्ग है यह अग्नि का जो भभक उठती है एक हड़ताल से ठीक उसी तरह जैसे कविता शुरू होती है एक शब्द से ठीक उसी तरह जैसे प्रेम दमक उठता है एक चुम्...

मराम अल-मासिरी की कविताएं

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असुविधा  के स्त्री कविता माह में इस बार  मराम अल मासिरी की कविताएं । वह   सीरिया की सबसे प्रसिद्ध कवयित्री हैं, फ्रांस में आत्मनिर्वासित । उनकी कविताओं का हिन्दी में पहला संकलन "मांस, प्रेम और स्वप्न" के नाम से जल्द ही दखल प्रकाशन से आ रहा है । अनुवाद मैंने, देवेश ने और मनोज पटेल ने किए हैं । आज सीरिया जब फिर एक बार बमों की जद में है और बच्चों की लाशें बिखेर जाने कौन सा लक्ष्य हासिल करना चाहती हैं ये सत्तायेँ तो मराम की कविताएँ सिर्फ़ भावुक नहीं करतीं बल्कि अपने मुल्क के किसी ऐसे भविष्य की संभावनाओं के खिलाफ लड़ने की ताक़त भी देती हैं।      पेंटिंग सीरिया के ही कलाकार तम्माम अज़्ज़ाम की हैं।     अशोक कुमार पाण्डेय के अनुवाद  (एक) सीरिया के पहाड़ों और मैदानों में और रिफ्यूजी कैम्पों में वह आई निर्वस्त्र. पैर कीचड़ में सने हुए हाथ ठण्ड से फटे हुए लेकिन वह आगे बढ़ती रही. वह चलती रही उसके बच्चे झूल रहे थे उसकी बाहों में जब वह भाग रही थी नीचे गिर गए वे कष्ट से रो पड़ी वह लेकिन आगे बढ़ती रही. उसके ...