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मौसम निरंकुश तानाशाह है हमारे लिए - रुपाली सिन्हा

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जाड़े का मौसम हमारे वांग्मय में सुखमय मौसम की तरह आता है. जीवेत शरदः शतम्! सुविधासंपन्न लोगों के लिए आनंद का अवसर. उत्तर प्रदेश के सचिव कहते हैं कि 'ठण्ड से कोई नहीं मरता'. सच भी है कि जिन्हें सरकारें मनुष्य मानती हैं वह वर्ग ठण्ड से मर ही नहीं सकता. मरते वे हैं जिन्हें वह मनुष्य मानती ही नहीं. जिन्हें बोझ समझा जाता है. जो अवांछित हैं. आख़िर देश भर से विस्थापित हो महानगरों में दो रोटी कमाने आये लोग हों या मुजफ्फरपुर के राहत शिविरों में रह रहे लोग, इन्हें जनता की परिभाषा में कब शामिल करती हैं सरकारें. फिर उनके मरने की फ़िक्र भी क्यों हो किसी को?  लेकिन कवि की फ़िक्र की परिधि सरकारों की परिधियों सी तो नहीं हो सकती... रुपाली सिन्हा की यह कविता उन परिधियों का विस्तार करती है. उस दुनिया को देखने और उसका किस्सा कहने की कोशिश जो हर मुख्यधारा से विस्थापित है. और यह कहते हुए पाश से बेहतर कौन सा कन्धा हो सकता था सिर टिकाने को?  मुजफ्फरपुर के राहत शिविर से दक्कन हेराल्ड में छपा एक फोटो  मौसम की    मार ----------------------- पाश! मौसम की   मार सबस...

रुपाली सिन्हा की कवितायें

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रूपाली सिन्हा   से मेरा परिचय कालेज के दिनों का है. हमने एक छात्र संगठन में काम किया है , न जाने कितनी बहसें की हैं , लडाइयां लड़ी हैं और इस डेढ़ दशक से भी लम्बे दौर में शहर दर शहर भटकते हुए भी दोस्त रहे हैं. रूपाली की कवितायेँ एकदम शुरूआती दौर से ही सुनी हैं. गोरखपुर स्कूल के अन्य कवि मित्रों की तरह ही उनका जोर लिखने पर कम और छपवाने पर बिलकुल नहीं रहा है , तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. मुझे कई वर्षों की लड़ाइयों के बाद अचानक जब कुछ दिनों पहले ये कवितायेँ मिलीं तो सुखद आश्चर्य हुआ रूपाली अपने मूल स्वभाव से एक्टिविस्ट हैं. कालेज के दिनों से लेकर अब तक वह लगातार संगठनों से जुडी रही हैं और संघर्षों की भागीदार रही हैं. विचार उसके लिए किताबों में पढने और लिखने वाली चीज नहीं, बल्कि बतौर भगत सिंह - तौर-ए-ज़िन्दगी हैं, तो ज़ाहिर है कि एक कशमकश, एक द्वंद्व लगातार उन्हें मथता रहता है. एक औरत होने के नाते ये सवाल कई-कई स्तर पर और गहराते जाते हैं. ये कवितायें पढ़ते हुए आप उसी कशमकश से गुजरेंगे. तुमने कहा  तुमने कहा - विश्वास   मैंने सिर्फ तुम पर विश्वास  किया ...