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शिवमूर्ति के यहाँ कर्ता और कहनहारे का फ़र्क मिट जाता है - विवेक मिश्र

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हमारे समय के बेहद ज़रूरी किस्सागो शिवमूर्ति जी पर लिखा विवेक मिश्र का यह आलेख लमही पत्रिका के शिवमूर्ति अंक में छपा है.  अपनी मँड़ईया के ' शिव ' राजा एक रचना , उसका रचनाकार और उस रचनाकार का जीवनवृत्त बाहर से देखने पर भले ही तीन अलग - अलग बिन्दु प्रतीत होते हों परन्तु जीवन के वृहत्तर आयामों में इन तीनों बिन्दुओं को परखने पर यह एक घेरे में , एक साथ चमकते दिखाई देते हैं। अर्थात एक रचनाकार की रचना , उसका व्यक्तित्व और उसका जीवन - वृत्त बाहर से भले ही अलग - अलग रंग तथा आकार - प्रकार के दिखते हों पर कहीं न कहीं रचनात्मक धरातल पर यह तीनों ही आपस में कुछ इस तरह घुले - मिले होते हैं कि न तो इन्हें बिलगाना ही संभव होता है और न ही एक के बिना दूसरे को समझ पाना। …… और मैं जितनी बार भी किसी मौलिक रचनाकार की रचना को पढ़ने के बाद उसके जीवन और व्यक्तित्व के बारे में जानने की कोशिश करता हूँ तो कभी अंशत : और कभी शतप्रतिशत यह बात सच ही साबित...