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संज्ञा उपाध्याय की कविताएँ

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 लमही के ताज़ा अंक में संज्ञा की कविताएँ देखना मेरे लिए सुखद आश्चर्य सा था.कविताओं की वह गंभीर और सहृदय पाठक है, यह  मैं  जानता था और यह भी कि उसने कभी-कभार जो कविताएँ लिखी हैं, उनके प्रकाशन को लेकर कभी उत्साहित नहीं रही. कहानियाँ उसकी आई हैं, बच्चों के लिए ख़ूब लिखा है और कथन के समय उसके वैचारिक लेखन से हम सब परिचित और प्रभावित रहे हैं.  लेकिन इन कविताओं को पढ़ते यह मान पाना बेहद कठिन है कि ये उसकी आरम्भिक कविताएँ हैं. भाषा की जो सहजता यहाँ है और जिस तरह का मितकथन है, वह आपको रोकता है और कवि के साथ दूर तक ले जाता है. यहाँ निज से सार्वजनीन तक की वह यात्रा है जो एक कविता को व्यापक पाठक वर्ग के लिए अपनी कविता बनाती है, वह इसमें अपने जीवन की छवियाँ देख पाता है. इन्हें पढ़ने के बाद मुझे उससे और कविताओं की उम्मीद रहेगी... भय नहीं घुल-धुल जाने का दिन भर धूप में तपी सूखी सूनी सड़क पर चलते हुए बेखयाली में बारिश और तुम बस यही है ख़याल में .   ठीक इन्ही शब्दों में यही पूरी बात चलते-चलते टाइप करती हूँ एक मैसेज में   भेजती हूँ और ...

बोलेरो क्लास - असहज वक्त की जीवंत कहानियाँ

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इस बार से हम समीक्षा का एक नया कालम शुरू कर रहे हैं. कोशिश होगी कि एक सोमवार को असुविधा पर कविताएँ हों तो दूसरे पर समीक्षा, यानि अब योजना इसे कविता और समीक्षा के ब्लॉग में बदलने की है. तो आप मित्रों से गुजारिश भी कि अगर आप किसी किताब की समीक्षा कर रहे हों तो उसे हमें उपलब्ध कराइए, किसी ने आपकी किताब की समीक्षा की हो तो भी बेहिचक भेजिए. प्रिंट और ब्लॉग को मैंने हमेशा दो अलग माध्यम माना है तो प्रकाशित/अप्रकाशित पर बहुत जोर कभी नहीं रहा. मेरी कोशिश किसी शुचिता या विशिष्टता को बनाए रखने या स्थापित करने की जगह एक नए पाठक वर्ग को हिन्दी की नई-पुरानी ज़रूरी किताबों से परिचित कराने की है. इस क्रम में महत्वपूर्ण रचनाकारों के कृतित्व पर आलोचनात्मक आलेखों का भी स्वागत है. इस कड़ी में सबसे पहले जाने-माने युवा कथाकार प्रभात रंजन के प्रतिलिपि बुक्स से प्रकाशित कहानी संकलन की संज्ञा उपाध्याय द्वारा की गयी समीक्षा.   अब यह किताब आप प्रतिलिपि बुक्स की विशेष योजना के तहत उनसे सीधे मंगा कर पचास प्रतिशत की छूट प्राप्त सकते हैं. यह समीक्षा कथन में प्रकाशित हुई थी और अब उनकी स्वीकृति से यहा...