फ़िरोज़ खान की कविताएँ
फ़िरोज़ कविताएँ लिख तो लम्बे समय से रहे हैं लेकिन अनियमित. या यों कहें कि अपने कवि होने को लेकर वह लिखते समय तो गंभीर होते हैं लेकिन उसके बाद प्रकाशन वगैरह को लेकर एकदम नहीं. परिणाम यह कि युवा कवियों की लिस्ट में आप उनका नाम नहीं पायेंगे. लेकिन उनकी कविताएँ मुझे हमेशा अपने समय में एक बेहद महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप लगती हैं. साम्प्रदायिकता के चहुँओर विस्तार के इस भयानक दौर में वह न केवल अल्पसंख्यक समाज के भय और उसके भीतर की बहसों को बहुत शाईस्तगी से सामने रखते हैं बल्कि एक गंभीर राजनैतिक समझदारी के साथ इसका प्रतिरोध रचते हैं. आज उनका जन्मदिन भी है, शुभकामनाओं सहित कुछ ताज़ा कविताएँ डर की कविताएँ (एक) सपनों में अक्सर पुलिस आती है महीनों से नहीं, नहीं... शायद सालों से घसीट कर ले जा रही होती है पुलिस धकेल देती है एक संकरी कोठरी में और जैसे ही फटकारती है डंडा मैं चीख पड़ता हूँ जाग कर उठते हुए कब से जारी है यह सिलसिला मां के खुरदरे और ठंडे हाथ हथकड़ी से लगते थे उस वक्त माथे पर सर्दियों में भी माथे की नमी से जान गया था कि डर का रंग गीला और गरम होता है जलता हुआ चिपचिपा...