कहानी- जंगल
जंगल झिर्रियों से आ रही हवा किसी धारदार हथियार की तरह जख़्मी कर रही थी। गोमती ने साड़ी का पल्लू चेहरे पर लपेट लिया और बाबू को और कस के भींच लिया। रामेसर ने बीड़ी सुलगा ली थी। गोमती का मन किया कि मांग के दो कश लगा ले तो थोड़ी ठंढ कटे। यह सोच कर ही उसके होठों पर एक हल्की सी मुसकराहट तैर गयी … बचपन में दादा बीड़ी सुलगाने के लिये देते तो चूल्हे से सुलगाने के बहाने दो फूंक मार लेती थी और कभी-कभी बूआ के साथ बंडल से दो बीड़ी पार करके नहर उस पार की निहाल पंडिज्जी की बारी में बुढ़वा पीपल के पीछे … पीपल का ख़्याल आते ही जैसे ढेर सारा कड़वा थूक मुंह में भर आया हो … एकदम से पूछा , ‘ केतना घण्टा और लगेगा ’… रामेसर ने बीड़ी का अंतिम कश खींचा और फिर ठूंठ को खिड़की से रगड़ते हुए बोला , ‘ दू बज रहा होगा … सात बजे का टाइम है … सो काहे नहीं जाती ?’…’ नींद नहीं आ रहा है ’… उसने ठंढ का जानबूझकर कोई जिक्र नहीं किया था। ‘ काहें घर का याद आ रहा है का ’ रामेसर ने मफ़लर को और कस के लपेटते हुए पूछा। ‘ नाहीं ’… उसने ऐसे ही चारो तरफ़ नज़रें फिराईं। डब्बा खचाखच भरा हुआ था। खिड़की के पास को दो सीटों में ...