चंद्रकांता की कवितायें
चंद्रकांता की कवितायें मैंने नेट पर ही इधर-उधर पढ़ी हैं. इस दशक में एक प्रवृति की तरह उभरी स्त्री आन्दोलन की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति वाली कवितायें लिखने वाले स्त्री स्वरों के क्रम में ही चंद्रकांता एक तिक्त और स्पष्ट स्वर हैं. उनके यहाँ जो चीज़ विशेष ध्यानाकर्षित करती है वह है मध्य वर्ग से आगे जाकर सर्वहारा स्त्रियों के बीच उन समस्याओं और विडम्बनाओं को लक्षित करने की क्षमता. हालांकि उनकी संस्कृतनिष्ठता की तरफ झुकी भाषा कई बार इसमें व्यवधान पैदा करती है, लेकिन इनके तेवरों और पक्षधरता को देखते हुए यह उम्मीद की ही जा सकती है कि आने वाले समय में वह गंभीर वैचारिकता के साथ शिल्प और भाषा की दृष्टि से भी और मानीखेज़ कवितायें लिखेंगी. तुम्हारी धरोहर 1 मैं गुड़िया नहीं होना चाहती नहीं खोना चाहती स्वत्व निर्जीव गुड़िया जो ना हंसती है न मुंह खोल पाती है जिसे समाज के चिर-विक्षिप्त मान-दंडों पर कभी मूक...