मयंक सक्सेना की कवितायें
मयंक सक्सेना एक्टिविस्ट हैं. एक्टिविस्ट कवि कहें या बेहतर होगा कि एक्टिविस्ट पत्रकार. यह पत्रकारिता उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है. इतनी कि कविता लिखते समय भी वह उन विवरणों का मोह नहीं छोड़ पाते. इसीलिए अक्सर बहुत ज़्यादा डिटेल्स में चले जाते हैं. इनमें जो चीज़ आकर्षित करती है वह है कवि का सकारात्मक आक्रोश. उसकी उलझनें और उससे टकराने की कोशिश. आज असुविधा पर पढ़िए उनकी कुछ कवितायें अग्नि हमेशा पवित्र ही होती है... चाहें जले वह 47 के बंटवारे में 84 की दिल्ली में गोधरा में नरोडा में गुजरात में मिर्चपुर में हमेशा दैवीय महान सब कुछ शुद्ध कर देने वाली अग्नि हमेशा पवित्र ही होती है... बलात्कार का प्रशिक्षण वो अक्सर बाज़ार से लौटते हुए कहते थे मुझसे क्या लड़की जैसे चलते हो दो झोले उठाने में थक जाते हो तुम जब कभी किसी गाने पर मैं नादान हिला कर कमर लगता था नाचने तब अक्सर कहते थे चारपाई पर खांसते बुज़ुर्ग वो ये क्या लड़कियों सा लगते हो...