पापा, हम हिंदू हैं कि मुसलमान?' : शानी की कहानी युद्ध
आज शानी का जन्मदिन है. शानी यानी सतत असुविधा का लेखक. मेरी पीढ़ी के लोगों का उनसे परिचय शायद दूरदर्शन पर आये धारावाहिक "काला जल" से हुआ हो, मेरा तो उसी से हुआ था. उपन्यास बाद में पढ़ा. कभी परमानंद श्रीवास्तव ने कहा था कि मुस्लिम समाज को जानना हो तो तीन उपन्यास पढ़ डालो क्रम से. मंज़ूर एहतेशाम का " सूखा बरगद", राही मासूम रज़ा का "आधा गाँव" और शानी का "काला जल." कहानियाँ उसके भी बाद मिलीं. "युद्ध" एक ऐसी कहानी है जो पढ़ी तो शायद नब्बे में लेकिन समझ पहले 92 में आई फिर 2002 में और फिर तो जैसे रोज़ दुहराई जाने लगी मेरे आसपास. आसान नहीं होगा इसे पढ़ना. शानी को याद करना भी कहाँ आसान है इस माहौल में? लेकिन ज़रूरी है पढ़ना और ज़रूरी है याद करना शानी को. उनका रचना संसार विस्तृत है लेकिन अब तो उनकी रचनावली शिल्पायन ने छाप दी है तो 011-22326078 पर फोन करके मंगवाई जा सकती है. फिलहाल उनकी कहानी पढ़िए और चाहें तो लोठार लुत्से का उन पर लिखा लेख यहाँ पढ़ सकते हैं. उनकी कुछ और कहानियाँ यहाँ पढ़ी जा सकती हैं. ---------------------------------------...