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कविता की नाकामयाबी - मरने-जीने से आगे

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यह आलेख सबसे पहले अंग्रेजी में कविता समय के ब्लॉग पर पोस्ट हुआ था. तभी मैंने इसका अनुवाद करने का वादा किया था. अनुवाद काफी पहले कर लिया था पर पोस्ट अब कर रहा हूँ... कविता – एक प्रतिरोध स्थली की तरह जेरेमी स्माल  अनुवाद – अशोक कुमार पाण्डेय (मूल पाठ यहाँ से) अगर आप मेरे यह कहने पर कि , लगभग पिछले तीस सालों में छपी कविता की हर किताब पूरी तरह से नाकामयाब रही है , मुझसे बहस करना चाह रहे हैं तो संभावना यही है कि आप देश के उस तबके से हैं जो अपने आप को कवि समझता है। बाकी सबके लिये तो कविता का हाईस्कूल की किताब के बाहर कोई अस्तित्व है ही नहीं। कवि टाक शो में दिखाई नहीं देते , देर रात के दूरदर्शन के कार्यक्रमों में उनका पाठ शामिल नहीं होता और इस बात की संभावना बढ़ती जा रही है कि न्यूयार्क टाइम्स या वाशिंगटन पोस्ट जैसे बड़े और महत्वपूर्ण अख़बारों में उनकी समीक्षायें भी नहीं हों। प्रकाशन उद्योग में यह सब जानते हैं कि ब्लाकबस्टर कविता संग्रह भी असफल संस्मरणों और कहानियों , उपन्यासों से हास्यास्पद रूप से कम बिकते हैं। हर उस नज़रिये से जिससे हम सफलता को नापते हैं – किताब...