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लीलाधर मण्डलोई की कविता "अमूर्त" पर सुमन केशरी

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कविताओं में जीने वालीं सुमन जी ने इधर उन्होंने कोई एक कविता चुनकर उस पर विस्तार से लिखना शुरू किया है जो हिन्दी की आत्मग्रस्ति से समीक्षाग्रस्ति  तक सिमटी दुनिया में अनूठा सा काम है. चाहूँगा इस आपाधापी और कमेन्ट-लाइक की भागदौड़ से आगे ज़रा ठहर कर पढ़ा जाए.

लेख के साथ लगे सभी चित्र कवि लीलाधर मण्डलोई जी के कैमरे से
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अमूर्त- बेहदकीहदोंकेख्वाबदेखनेकीलालसातथाहदमेंबेहदकोदेखनेकाप्रयास (लीलाधरमंडलोईकीकविताअमूर्तकोपढ़तेहुए)



अमूर्त
जोहोताहैविसर्जित मैंलाताहूँस्मृतिमें कोईबड़ाख्यालनहींहैभीतर
मैंबहुतछोटीचीजोंसेबनाताहूँ अपनीइकजुदादुनिया जिसपरनिगाहजाना