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आशीष त्रिपाठी की तीन कविताएँ

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पेशे से अध्यापक और मिजाज़ से कवि आशीष ने कविता से अधिक नाम आलोचना में कमाया है. लेकिन इस नाम कमाने में बेहतर या बदतर लिखा जाना नहीं शामिल, मुझे तो वे हमेशा मूलतः कवि लगे हैं, यह अलग बात है कि कवि होने के लिए कविता लिखने से इतर जो शर्तें हैं शायद वह उन पर उतना खरे नहीं उतरते.

बड़ी मुश्किल  उनसे तीन ताज़ा कविताएँ मिली हैं, पढ़िए...







कलयुग

यह उस युग की बात है जब भाषा से सौम्यता,उदारता और विनम्रता जैसे शब्दों का लोप हो गया था
सहनशीलता और सहिष्णुता - बस राजनैतिक अनुष्ठानों में बाकी थे
हर आदमी के हाथ में एक पुरातन लोकनायक का धनुष था, जिसकी प्रत्यंचा तनी हुई थी
'भय से उपजती है प्रीत' - समाज का आदर्श वाक्य था
प्रेम पर नैतिक पाबंदियां थीं सहनशीलता कमज़ोरी का लक्षण रौद्र और वीर सबसे प्रमुख रस शृंगार छिछोरेपन का सूचक उदारता दोमुंहेपन का लक्षण मान ली गयी थी
सिर्फ पुरस्कार के लिए कवितायेँ लिखने वाले कवि राजकवि थे फिर भी 'कविता' पर संदेह किया जाता था क्योंकि उसमें भाषा के रूपक और अनेकार्थता के गुणों का उपयोग करने की शक्ति शेष थी

निकोनार पार्रा की कविताएँ - अनुवाद : उज्जवल भट्टाचार्य

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“कविता मुझे हमेशा वेदिका से पादरी की आवाज़ जैसी लगती थी...पंछियों को गाने दो” – निकानोर पार्रा ने कभी कविता के बारे में ये शब्द कहे थे. पार्रा का मानना था कि राजनीतिक व भावनात्मक शैली के बदले कविता में बोलचाल की भाषा, व्यंग्य और विसंगति होनी चाहिए.
पार्रा जब चिली के कविता जगत में उभरे तो नेरुदा वहाँ छाये हुए थे. दोनों में गहरी मित्रता थी, दोनों कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे. लेकिन कविता की शैली के मामले में उनके चयन अलग-अलग थे. पार्रा ने नेरुदा के समानान्तर या विपरीत एक शैली विकसित की, जिसे उन्होंने anti-poem कहा. अपनी धारणा को उन्होंने 1954 में अपने कविता संग्रह  Poemas y Antipoemas में प्रस्तुत किया था.
नेरुदा व पार्रा एक-दूसरे की कविता बेहद पसंद करते थे. नेरुदा ने कविता के मंच पर पार्रा के आने का स्वागत किया था. नेरुदा जब अकादमी के सदस्य बने तो उनके लिये स्वागत भाषण में पार्रा ने कहा था : “नेरुदा के काव्य को नकारने के दो तरीके हो सकते हैं. उन्हें न पढ़ना और कुटिल इरादे के साथ उन्हें पढ़ना. मैंने दोनों कोशिशें की हैं और मैं विफल रहा.”
1937 में ही पार्रा का पहला काव्य संग्रह ‘बिना न…