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कुमार अंबुज की नई कविता : हम में से हर दूसरा आदमी अपराधियों का वोटर है

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वक़्त बदल गया है और सारी सुन्दर चीज़ें जैसे असुंदर के स्थापन में लगी हैं. हर तरफ़ सब इतना शांत और सहज है कि असुविधा पैदा करता है. देखते ही देखते श्लीलता अश्लीलता में बदलती चली गई और जैसे यह बदलाव किसी मेटामोर्फेसिस की तरह हुआ और सुबह होते ही अँधेरा छा गया.  कुमार अम्बुज  नब्बे के उस दशक के बदलावों के सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों की पहचान करने वाले सबसे पहले कवियों में से थे जो आजके सर्वग्रासी समय में परिणत हुआ है. उनकी यह ताज़ा कविता इस समय की उस विडम्बना को कहने की हिम्मत जुटाती है जिसमें पढ़ा-लिखा सुसंस्कृत समाज हत्यारों के वकील और फिर हत्यारे में तब्दील होता जा रहा है.   हुसैन की पेंटिंग : अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़ मुझे शक है , हर एक पर शक है ( पवित्र अश्‍लीलताओं से अश्‍लील पवित्रताओं तक) मैं कुछ हैरान , कुछ परेशान घर से बाहर निकलता हूँ सब तरफ तेज़ धूप है , तमाम लोग दिखते हैं अपनी आपाधापी में , रोशनी की इस चकाचौंध में पहचानने की कोशिश करता हूँ इनमें कौन हो सकते हैं जिन्‍होंने निसंकोच चुना है एक एफआईआरशुदा मुजरिम को अपना नुमाइंदा जबकि चारों तरफ ...

लौट जाती है उधर को भी नजर क्‍या कीजे - कुमार अम्बुज

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एडिनबर्ग वर्ड राइटर्स कांफ्रेंस , त्रिनिदाद में मुख्य वक्ता के तौर पर दिए गए ओलिव सीनियर के ने कहा था , “ राजनीति! व्यग्रता इस पद के संकीर्ण उपयोग से पैदा होती है. हम अक्सर राजनीति को पार्टीगत राजनीति , चुनावी राजनीति , राजनैतिक नेतृत्व और इनसे जुड़े विवादों और टकरावों के रूप में समझाते हैं और इसीलिए बहुत से लोग यह कहते हुए इससे खुद को अलग करते हैं कि ‘ मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं. ... लेकिन राजनीति अपनी बेहद आरम्भिक परिभाषा में ही राज्य चलाने की कला से जुडी है...मैं कहना चाहती हूँ कि देश की वृहत्तर राजनीति पालने से लेकर कब्र तक अपरिहार्य रूप से हमारा सबकुछ निर्धारित करती है. रोटी की क़ीमत या बंदूकों की उपलब्धता राजनीति तय करती है और यह भी कि कोई समृद्ध जीवन जियेगा या फिर किसी रिफ्यूजी कैम्प में सड़ेगा...वृहत्तर राजनीति उस दुनिया को जिसमें हम पैदा होते हैं और हमारे दैनंदिन पर्यावरण को निर्धारित करती है और उस ‘ राजनीति ’ के लिए रास्ता बनाती है जो जीवन के हर क्षण में हमारे उन व्यक्तिगत निर्णयों में अन्तर्निहित है जिन्हें लेने के लिए हम अचेतन या सचेतन तौर पर लेने के लिए बाध्य होत...

एक भावुक सा राग-शोक - कुमार अंबुज

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उत्तराखंड मे विरोध सरकार का था। हक़ है सरकार का विरोध करने का विपक्ष को। पर मारा गया उस निरीह घोड़े को जिसे मनुष्यों ने सभ्यता के आरंभ मे ही गुलाम बनाया और उसकी सारी त्वरा उसकी चपलता उसका सौंदर्य मनुष्यों की सेवा मे लग गई। मनुष्यों की लड़ाई मे वह शहीद हुआ। मनुष्यों की ईर्ष्या मे उसे जहर दिये गए। और आज एक और बार मनुष्यों की लड़ाई मे वह घायल हुआ। उसका घायल होना जैसे हमारे समय की एक व्यंजना बन कर सामने आ गया है। वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने इस घटना से व्यथित हो यह लेख सा लिखा था अपनी फेसबुक वाल पर....उनसे पूछे बिना कॉपी कर असुविधा के लिए ले लिया है...  एक भावुक सा राग-शोक 0000 वह इतना सुंदर है कि उससे केवल मोह या प्रेम हो सकता है। वह स्वप्न के, कल्पना के किसी भी अश्व से भी अधिक अश्व है। उसके बल, आयुष्य और सौंदर्य की बेहतरी के लिए कोई भी सहज कामना कर सकता है। इसकी तो रंचमात्र आशंका ही नहीं की जा सकती कि कोई उस पर प्रहार करे। उसके जीवन को हानि पहुँचा दे। उसके प्राकृतिक श्रेष्ठ अश्व होने के गौरव, उन्नत मस्तक और उसकी अतुल्य गरिमा को चोट पहुँचाने का ख्याल भी कोई कर सकता है, यह भी ...