कुमार अंबुज की नई कविता : हम में से हर दूसरा आदमी अपराधियों का वोटर है
वक़्त बदल गया है और सारी सुन्दर चीज़ें जैसे असुंदर के स्थापन में लगी हैं. हर तरफ़ सब इतना शांत और सहज है कि असुविधा पैदा करता है. देखते ही देखते श्लीलता अश्लीलता में बदलती चली गई और जैसे यह बदलाव किसी मेटामोर्फेसिस की तरह हुआ और सुबह होते ही अँधेरा छा गया. कुमार अम्बुज नब्बे के उस दशक के बदलावों के सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों की पहचान करने वाले सबसे पहले कवियों में से थे जो आजके सर्वग्रासी समय में परिणत हुआ है. उनकी यह ताज़ा कविता इस समय की उस विडम्बना को कहने की हिम्मत जुटाती है जिसमें पढ़ा-लिखा सुसंस्कृत समाज हत्यारों के वकील और फिर हत्यारे में तब्दील होता जा रहा है. हुसैन की पेंटिंग : अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़ मुझे शक है , हर एक पर शक है ( पवित्र अश्लीलताओं से अश्लील पवित्रताओं तक) मैं कुछ हैरान , कुछ परेशान घर से बाहर निकलता हूँ सब तरफ तेज़ धूप है , तमाम लोग दिखते हैं अपनी आपाधापी में , रोशनी की इस चकाचौंध में पहचानने की कोशिश करता हूँ इनमें कौन हो सकते हैं जिन्होंने निसंकोच चुना है एक एफआईआरशुदा मुजरिम को अपना नुमाइंदा जबकि चारों तरफ ...