वो सोयेगा क्यों, जो है सबको जगाता : कविता में गाँधी
इंटरनेट से साभार गाँधी हमारे लोकजीवन में कुछ इस क़दर विन्यस्त हैं कि वह अपने होने से अधिक व्याप्त हैं. वह एक हकीक़त हैं तो एक मिथक भी जिनसे हम जो सीखना चाहते हैं सीख लेते हैं. उन पर हमलों के दौर में आज यहाँ कुछ कविताएँ और कुछ पेंटिंग्स जो उस व्याप्ति के आयामों को चिह्नित करती हैं. लोक से लेकर व्यालोक तक. जन से अभिजन तक. हकीक़त से मिथक तक, इन्हें सुनना बेहतर होगा कुछ बोलने से. जगाओ न बापू को , नींद आ गई है शमीम करहानी जगाओ न बापू को , नींद आ गई है अभी उठके आये हैं , बज़्म-ए-दुआ से वतन के लिये , लौ लगाके ख़ुदा से टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से चली जाती है , राम की धुन , हवा से दुखी आत्मा , शान्ति पा गई है जगाओ न बापू को , नींद आ गई है। ये घेरे है क्यों , रोने वालों की टोली ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली भला कौन मारेग बापू को गोली कोई बाप के ख़ूं से , खेलेगा होली ? अबस , मादर-ए-हिन्द , शरमा गई है जगाओ न बापू को , नींद आ गई है। मोहब्बत के झण्डे को गाड़ा है उसने चमन किसके दिल का , उजाड़ा है उसने ? गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने किसी का भला क्य...