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निरंजन श्रोत्रिय की कवितायें

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निरंजन श्रोत्रिय हिंदी कविता में एक सुपरिचित नाम हैं. निजी जीवन की सहज अनुभूतियों को कविता में गहन आवेग के साथ प्रस्तुति की उनकी खासियत को बहुधा लक्षित किया गया है. गुना जैसे छोटे से शहर में रहते हुए उन्होंने कस्बाई जीवन, वहां की सामाजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों तथा विद्रूपताओं और  राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के साथ उसके गहन अंतर्संबंधो की गहन पड़ताल की है और उसे कविता में संभव भी किया है.  आज उनकी कुछ नई-पुरानी कवितायें                 अपनी एक मूर्ति            बनाता हूँ और ढहाता हूँ             आप कहते हैं कि कविता की है।                                                                                               ...

नींव,दीवार,छत थे पिता

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पितृशोक के इस दौर में अग्रज कवि निरंजन श्रोत्रिय ने संवेदना सन्देश के साथ यह कविता भी भेजी थी. आज असुविधा पर यह आप सबके लिए... पिता उन दिनों  पिता उन दिनों पिता जैसे नहीं हुआ करते थे रौब और ख़ौफ से रिक्त पिता बच्चे की तरह निश्चिन्त और खुश रहते हम मस्ती में चढ़ जाते कंधें पर उनके छूते निडरता से मूँछें उनकी उन्हीं की छड़ी से उन्हें पीटने का अभिनय करते चुपके से गुदगुदाकर पिता को खोल देते खिलखिलाहट की टोंटी नहा जाता घर नींव,दीवार,छत थे पिता घर थे पिता ! एक दिन अचानक लौटे पिता घर अजनबी और डरावना चेहरा लिये हम दुबक गये घर के कोनों में छड़ी उठाकर घूरने लगे शून्य में नींव,दीवार और छत डरने लगे घर लौटे पिता से डबडबाने लगा टेबल पर रखा चश्मा उनका चुप्पी उनकी सीलन बन बैठ गई दीवारों में उस दिन शहर और दुनिया में कुछ घटनाएं घटी थीं एक साथ एक नाबालिग लड़की के साथ हुआ बलात्कार दो बेटों ने बूढ़ी माँ के एवज में चुनी जायदाद सोमालिया में पैंतालीस लाख बच्चे भूख से मरने को थे और शकरू मियाँ का नौजवान बेटा घर ख़त छोड़ गया था !           ...