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सेंसरशिप - ईरानी कवि अली-अब्दोलरेज़ा की कविता

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अमीन की पेंटिंग "अ टेल ऑफ़ टू मुस्लिम्स" गूगल से  मेरे अलफ़ाज़ के क़त्ल-ए-आम के दौरान उन्होंने मेरी आख़िरी पंक्ति का सर क़लम कर दिया और लहू    सियाही की मानिंद   पड़ रहा है काग़ज़ पर यहाँ मौत पसरी हुई है काग़ज़ पर और ज़िन्दगी   पत्थरों से बिखेर दी गई है   अधखुली सी खिड़की की तरह एक नई बन्दूक ने निपटा दिया है दुनिया को और मैं  इस गलियारे के दरवाज़े से  आयातित सामानों सा                   इस जीर्ण-शीर्ण कमरे में हूँ प्रवासी की तरह   मैं क़लम की तरह हूँ ज़िन्दगी में माँ जैसे जर्जर काग़ज़ पर खिंची रेखाओं सा बिल्ली के पंजे अब भी मचलते हैं उन बिलों की ओर भागते चूहे को डराने के लिए जिन्हें भर दिया है उन्होंने. स्कूल में पढ़े पाठों की तलाश करते मैं अपनी जिल के लिए अब नहीं रह गया आशिक जैक मैं अपना नया होमवर्क कर रहा हूँ तुम उसे काट देते हो और उस लड़की में जो अचकचायेगी इस कविता के अंत में एक घर बनाते हो घाव की तरह खुले एक दरवाज़े...