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अनुराधा सिंह की कविताएँ

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पिछले कुछ सालों में हिंदी कविता संसार में स्त्रियों की जो नई खेप आई है वह न केवल अपने अधिकारों और वंचना को लेकर सावधान और व्यग्र है बल्कि अपनी अभिव्यक्ति के लिए लगातार नई भाषा और नए शिल्प की तलाश में है. ऊपरी तौर पर दिखने वाला साम्य भीतरी तहों तक उतरने पर विविधता के तमाम पते मिलते हैं. अनुराधा सिंह ने कम समय में इस परिदृश्य में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है. मुख्यधारा की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित हो रही उनकी कविताएँ उम्मीद जगाती हैं. उनके यहाँ देश ,  दुनिया के साथ भीतर की दुनिया की यात्रा भी है और इन सब यात्राओं को दर्ज़ करते हुए उनकी स्त्री दृष्टि लगातार और शार्प होती जा रही है. ये कविताएँ उन्होंने काफ़ी पहले मुझे भेजी थीं ,  लेकिन अब अपने कुख्यात हो चले आलस्य के चलते जो विलम्ब हुआ उसके लिए माफ़ी के साथ इन्हें अब प्रकाशित कर रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ उनका सहयोग नियमित मिलता रहेगा. तिरिया   वह सेमल जैसी नर्म आवाज़ में कहता है नाम बताओ किसने कहा........यह आवाज़ उसके खुरदुरे भीतर बाहर पर सूट नहीं करती........नाम जान कर ऐसे चिल्लाओगे कि मेरे क...