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प्रोमिला क़ाज़ी की छह कविताएँ

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प्रोमिला क़ाज़ी से मुलाक़ात सुमन केशरी जी के घर पर आयोजित एक अनौपचारिक कवि गोष्ठी में हुई थी और तभी उनकी कविताएँ पहली बार सुनी थीं. एन्द्रिक प्रेम की उनकी कविताओं का स्वभाव सूफियाना है. भाषा का ठाठ अलग है जहाँ हिंदी, उर्दू अंग्रेजी से शब्द सहज रूप से आते चले जाते हैं. जो दृश्य उभरते हैं इन कविताओं में वे बेहद विश्वसनीय हैं और सहज. प्रेम का जो रंग उनके यहाँ है, वह स्वप्न और यथार्थ के एक अनूठे संयोजन से आया है.  असुविधा पर उनका स्वागत...और कविता मांगने तथा छापने में जो देर हुई है उसके लिए क्षमा मांगने का कोई अर्थ तो है नहीं..फिर भी.  1  वो उसकी फटी एड़ियों को देर तक सहलाता रहा  दिल के ठीक एन जगह पर जो गड्डा था  उसे मोटे ब्रश के स्ट्रोक्स से लाल रंग में भरता गया  वो राख उठाता रहा उसकी बुझी साँसों की  उनसे नन्हें ताजमहल बनाता रहा  अचानक वो रानी हो गयी !  और वो मुस्कुराता  रहा  वो जी गयी ! 2  उसने अपनी फीकी चाय की तली में  उसे समूचा उड़ेल दिया  बिना घोले वो घूँट घूँट पीता रहा...