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अरुण श्री की ताज़ा कविताएँ

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अरुण युवतर पीढ़ी के मेरे प्रिय कवियों में से हैं. भाषा के भीतर और बाहर उनकी बेचैनी और लोकजीवन में गहरे धँसा भावबोध मुझे आश्वस्त ही नहीं करता बल्कि एक पाठक के रूप में आवश्यक ऊर्जा भी देता है. ये कविताएँ काफी पहले उन्होंने मुझे भेजी थीं लेकिन व्यस्तताओं के बीच पोस्ट अब कर पा रहा हूँ.  सारे उत्सव स्थगित मैं प्रेम में हूँ कि मछली है कोई नदी के बाहर और जिन्दा है । तुम साथ हो मेरे कि मैं साथ के स्वप्न में हूँ । बारिश की कोई बूँद नहीं टपकी हमारे ओठों पर आधी आधी । किसी दूब ने हमारे पाँव नहीं चूमे साथ साथ । मेरी आँखों में पड़ी रेत कभी तो न किरकिराई आँखें तुम्हारी । हम निकले ही नहीं घरों से अपने-अपने , और लिखते रहे - किसी साझा गंतव्य के लिए कितनी ही कविताएँ । तुमने गुनगुनाया मेरा नाम अक्सर लेकिन पुकारा नहीं कभी । प्रेम हमारा कहानी भर लेकिन कहानियों से अलग है कितना ! एक अकेला पहाड़ मैं नुकीले शिखर वाला, कितना अकथ ! कितनी कहानियाँ बाँचती तुम - किसी आसमान से उतरी नदी जैसे ! जैसे पेड़ भर जीवन उग आया हो किसी पथरीली कहानी में । लेकिन - मेरी छाती ...

अरुण श्री की कविताओं पर राहुल देव

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मेरा अभीष्ट देवत्व नहीं है ! आ ज जबकि कविता बहुतायत में रची जा रही है ऐसे में कविता के कुछ प्रतिनिधि युवा स्वरों को चिन्हित करना बेहद कठिन काम है | वैसे भी निरंतर विकासशील प्रवृत्तियों पर बात करना अपेक्षाकृत जोखिमपूर्ण रहता है | फिर भी कविता के युगीन स्वरुप के निर्धारण के लिए कदम उठाये जाने चाहिए, ऐसे छिटपुट प्रयास हमें कभी-कभार दिखाई भी पड़ते हैं | संचारक्रांति और सोशलमीडिया के बढ़ते वर्चस्व से इधर कविता के लिखने-पढ़ने, छपने-छपाने में तेज़ी आई है जिसने कविता की गुणवत्ता को भी पर्याप्त रूप से प्रभावित किया है | ज्यादातर कवियों के लिए कविता लिखना अब भी एक शगल है | सोशल मीडिया पर हर तीसरा आदमी अपने को कवि मानता है | सार्थक लेखन करने वाले समर्पित साहित्यकार कम ही हैं | ऐसे दौर में कुछ ऐसे भी नाम हैं जिन्होंने निरंतर अच्छे लेखन से ध्यानाकर्षित किया है | अरुण श्री मेरे लिए उन्हीं नामों में से एक हैं | इससे पहले अरुण पत्र-पत्रिकाओं, ब्लोग्स आदि में प्रकाशित होते रहें हैं | चार संयुक्त काव्य संकलनों में उनकी सहभागिता रही है | साल 2015 के प्रारंभ में आया कविता संग्रह ‘मैं देव न ह...