अरुण श्री की ताज़ा कविताएँ
अरुण युवतर पीढ़ी के मेरे प्रिय कवियों में से हैं. भाषा के भीतर और बाहर उनकी बेचैनी और लोकजीवन में गहरे धँसा भावबोध मुझे आश्वस्त ही नहीं करता बल्कि एक पाठक के रूप में आवश्यक ऊर्जा भी देता है. ये कविताएँ काफी पहले उन्होंने मुझे भेजी थीं लेकिन व्यस्तताओं के बीच पोस्ट अब कर पा रहा हूँ. सारे उत्सव स्थगित मैं प्रेम में हूँ कि मछली है कोई नदी के बाहर और जिन्दा है । तुम साथ हो मेरे कि मैं साथ के स्वप्न में हूँ । बारिश की कोई बूँद नहीं टपकी हमारे ओठों पर आधी आधी । किसी दूब ने हमारे पाँव नहीं चूमे साथ साथ । मेरी आँखों में पड़ी रेत कभी तो न किरकिराई आँखें तुम्हारी । हम निकले ही नहीं घरों से अपने-अपने , और लिखते रहे - किसी साझा गंतव्य के लिए कितनी ही कविताएँ । तुमने गुनगुनाया मेरा नाम अक्सर लेकिन पुकारा नहीं कभी । प्रेम हमारा कहानी भर लेकिन कहानियों से अलग है कितना ! एक अकेला पहाड़ मैं नुकीले शिखर वाला, कितना अकथ ! कितनी कहानियाँ बाँचती तुम - किसी आसमान से उतरी नदी जैसे ! जैसे पेड़ भर जीवन उग आया हो किसी पथरीली कहानी में । लेकिन - मेरी छाती ...