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गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

यह आप पर है

मै लिखना चाहता था शेर
उन्होंने कहा
कविता में बस बना दी जाती है पूँछ
अब यह पाठक पर है
कि शेर समझे या बकरी

मै करना चाहता था प्रतिवाद
उन्होंने कहा
कविता में बस लगा दी जाती है तीन बिंदी
अब यह आलोचक पर है
कि प्रतिवाद समझे या स्वीकार

मै चाहता था ठठाकर हँसना
उन्होंने कहा
कविता में बस खींच देते है सीधी रेखा
अब यह संपादक पर है
की तय कर ले आकार

रोने के साथ नही है ऐसा
रुदन ही है हमारे समय का
समय का सबसे बड़ा सच
जो जितनी जोर से रोये
वह उतना ही प्रतिबद्ध

22 comments:

PN Subramanian ने कहा…

शानदार और पूँछ लगाकर जानदार रचना. आभार.

neeshoo ने कहा…

अशोक जी , बहुत खूब , आपने सबके कलम की बात कह दी ।

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी कविता है।बधाई स्वीकारे।

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया ...

Udan Tashtari ने कहा…

सत्य एवं यथार्थ.

Bahadur Patel ने कहा…

achchha hai par kavita nahin hai.
yah ek prayas hai ise jitana chaho lamba kar sakte ho.
हमारे समय का
समय का
yahan bhi kuchh dikkat hai.
achchha vyng hai.

Shefali Pande ने कहा…

अच्छी है ...बधाई

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आपने तो पूंछ का
जोरदार डंका बजा दिया

जैसे लंका में हनुमान ने तिरंगा फहरा दिया

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

bahadur bhai
tumhari ray mere liye mahatvpoorn hai. par kavita ke ve koun se pratiman hain jinake adhar par kisi rachana ki vastusthiti tay ki jaegi?

vyazna ki had yah hai ki yahi smajh nahi ata rki koun kis ka virodh kar raha hai.

mera virodh ise par hai..

Dr.Bhawna ने कहा…

बहुत सुंदर...

साहिल ने कहा…

achchhi rachna Ashok Bhai.

parantu kya sirf rudan hi ekmatra paimana hai ? Kshobh,Aham-tushti, Swagarvita ka kya ?

neera ने कहा…

खूब कहा! प्रतिबद्ध कर दिया रोने और कविता लिखने के लिए...

sandhyagupta ने कहा…

Aaj ke paridrishya ka satik chitran kiya hai aapne.Bahut khub.

प्रदीप कांत ने कहा…

रोने के साथ नही है ऐसा
रुदन ही है हमारे समय का
समय का सबसे बड़ा सच
जो जितनी जोर से रोये
वह उतना ही प्रतिबद्ध

बहुत बढिया...

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

" me karna chahta thaa alochna
kintu aapki rachna ne mujhse
chhin liya ye adhikaar....."

VAKAI behtreen he janaab aapki kavita...

रवीन्द्र दास ने कहा…

kya hai yah?

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

Pradeep Choubey मुझे को
Ashok Pandey ji

Thanks for your versatile poems received today.Yoy are a different genius from others. Best wishes. Pradeep

Reality Bytes ने कहा…

mein kya kya nahi chahta tha

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

जो जितनी जोर से रोये
वह उतना ही प्रतिबद्ध

सच है
सच तो सच होता है
कोई कर के दिखाए
सच को सच से अलग
मार्क्सवादी का सच
राष्ट्रवादी का सच
ऐसा सच लिखा नहीं जाता
इसे कोई लिखवा देता है
तब लिख देता है कोई नास्तिक
पूरी आस्था से विश्वास से
पूरी आस्तिकता में जीकर


बधाई
सच लिखने पर
इतने सुंदर ढंग से संयोजित करने पर

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

सच है
सच तो सच होता है
कोई कर के दिखाए
सच को सच से अलग
मार्क्सवादी का सच
राष्ट्रवादी का सच
ऐसा सच लिखा नहीं जाता
इसे कोई लिखवा देता है
तब लिख देता है कोई नास्तिक
पूरी आस्था से विश्वास से
पूरी आस्तिकता में जीकर


बधाई
सच लिखने पर
इतने सुंदर ढंग से संयोजित करने पर

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

(सुशील कुमार जी का कहना है कि उन्होंने टिप्पणी दी थी जो मैने हटा दी। पर मुझे वह मिली नहीं ।
यहां फोन पर व्यक्त भावना को दे रहा हूं। विश्वास रखें मेरे लिये आलोचना ज़्यादा महत्वपूर्ण है )

बहादुर पटेल से पूर्ण सहमति। यह कविता नहीं है।
सुशील कुमार

chaturananojha ने कहा…

kavita men kahane kee aadat nahi
kintu kah dun ......
aisi hai aap ki kavita
kahiye nahi sahiye aor sabake sath
rahiye.viradari ke taraf ungali kyon uthate hain!

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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